हैदराबाद: तेलंगाना जागृति प्रमुख कल्वकुंट्ला कविता की पार्टी ‘तेलंगाना रक्षण सेना (टीआरएस)’ की मुश्किलें खत्म नहीं हो रही हैं। उनकी पार्टी को बीआरएस समेत कई व्यक्तियों से बड़ी संख्या में केंद्रीय चुनाव आयोग को आपत्तियां मिली हैं। ‘टीआरएस’ को छोड़कर ‘बीआरएस’ में बदलने वाले उस पार्टी के नेताओं की तरफ से भी कविता की ‘टीआरएस’ नाम पर अड़चनें डाल रहे हैं। टीआरएस नाम पर अब तक केंद्रीय चुनाव आयोग को 600 से ज्यादा आपत्तियां मिल चुकी हैं। पता चला है कि बीआरएस ने केंद्रीय चुनाव आयोग को बताया कि 14 साल के पृथक तेलंगाना राज्य गठन के आंदोलन में ‘टीआरएस’ नाम भावनाओं से जुड़ा हुआ है। जानकारी के मुताबिक बीआरएस नेताओं ने चुनाव आयोग से शिकायत में कहा कि ग्रामीण इलाकों में बीआरएस पार्टी को आज भी टीआरएस के नाम से ही पहचाना जाता है, ऐसे समय में यह नाम किसी और को आवंटित नहीं किया जाना चाहिए।
उधर महाराष्ट्र के सोलापुर के दयानंद महादेव मांड्याल ने कविता की पार्टी के नाम पर आपत्ति जताते हुए केंद्रीय चुनाव आयोग से शिकायत की है। उन्होंने बताया कि कविता की पार्टी के नाम की घोषणा से पहले ही उन्होंने टीआरएस (तेलंगाना राज्य सामाजिक सेना) नाम के लिए आवेदन कर दिया था। इसलिए उन्होंने चुनाव आयोग से अनुरोध किया है कि किसी भी हालत में कविता को टीआरएस नाम न दिया जाए। महादेव चुनाव आयोग से मांग कर रहे हैं कि टीआरएस नाम उन्हें ही दिया जाए। दूसरी तरफ टीआरएस नाम से पहले ही दो नाम दर्ज हो चुके हैं। तेलंगाना राज्य समिति पार्टी ने भी कविता की पार्टी के खिलाफ ईसी से शिकायत की है। इस पृष्ठभूमि में कविता की पार्टी के नाम पर असमंजस बना हुआ है। गौरतलब है कि 25 अप्रैल को कविता ने धूमधाम से पार्टी का आगाज किया था। पहले तेलंगाना राज्य सेना (एसोसिएशन) नाम की घोषणा की थी। उस दिन उन्होंने टीआरएस की घोषणा तो की, लेकिन ‘एसोसिएशन’ भी जुड़ा होने की वजह से ट्रोल हुईं। उसके कुछ दिनों बाद ही उन्होंने पार्टी का नाम बदलकर ‘तेलंगाना रक्षण सेना’ कर दिया। उसी महीने की 30 तारीख को अखबारों में विज्ञापन भी दिए।
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पार्टी के नाम में इतना कन्फ्यूजन क्यों है, इस पर राजनीतिक गलियारों में चर्चा हुई, लेकिन कहा गया कि रणनीति के तहत ही पहले वह नाम घोषित किया गया था। अखबारों में विज्ञापन के बाद केंद्रीय चुनाव आयोग को 600 से ज्यादा शिकायतें मिलीं। हालांकि, टीआरएस खेमे का कहना है कि उन आपत्तियों में से ज्यादातर बीआरएस के नेताओं ने ही चुनाव आयोग तक पहुंचवाई हैं। वे आरोप लगा रहे हैं कि आपत्ति जताने वालों के नाम अलग-अलग होने के बावजूद करीब 90 प्रतिशत शिकायतें एक ही फॉर्मेट में हैं। उनका कहना है कि बीआरएस के नेता जानबूझकर उन्हें वह नाम न मिले। इसके लिए रुकावट डालने की कोशिश कर रहे हैं। वे सवाल कर रहे हैं कि ‘तेलंगाना’ की आत्मा को छोड़कर पार्टी का नाम बीआरएस रखने के बाद भी अब टीआरएस पर आपत्तियां क्यों जता रहे हैं? !
