रवींद्र जयंती पर विशेष : शांतिनिकेतन-भारतीय ज्ञान परंपरा में बंगाल की भूमिका

प्रस्तावना-

साल 2020 भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण समय रहा है, क्योंकि 2020 में तीसरी बार भारत में ‘नई शिक्षा नीति’ को लागू किया गया। ‘नई शिक्षा नीति:2020’ में विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए कई प्रकार के प्रावधान है। एक विशेष प्रावधान जो वर्तमान समय में शिक्षाविदों, विद्यार्थियों, विश्वविद्यालयों आदि का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही है। वह है- ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’। ‘नई शिक्षा नीति:2020’ के अंतर्गत ‘प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा’ को विशेष महत्व प्रदान किया गया है।

‘नई शिक्षा नीति:2020’ कहती है-

शिक्षा के सभी स्तरों पर भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता को तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया जाए।
भारतीय परंपरा के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास हो।
सभी भारतीय संस्कृति और परंपराओं को समझने और उनको सम्मान देने की बात भारतीय ज्ञान परंपरा के द्वारा प्रतिस्थापित हो।
भारतीय ज्ञान परंपरा के द्वारा शिक्षा प्रणाली का पुनर्गठन हो तथा एक नवीन परिवर्तनकारी यात्रा की शुरुआत हो।
विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन और अध्यापन को लेकर विद्यार्थियों को प्रेरित करें।
भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन से नयी पीढ़ी के विद्यार्थियों में भारतीयता की सटीक जानकारी संप्रेषित हो तथा उन्हें भारतीय होने पर गर्वबोध हो।

भारतीय ज्ञान परंपरा का संक्षिप्त इतिहास- ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ जिसका अंग्रेजी ‘Indian Knowledge System’ है। यह भारत की अपनी प्राचीन शिक्षा प्रणाली है। इस शिक्षा का संबंध आज की तथाकथित प्रमाणपत्र वितरित करनेवाली शिक्षा व्यवस्था से पूर्णतया भिन्न है, रोज़गार के होड़ में धकेल देनेवाली शिक्षा व्यवस्था से पूर्णतया भिन्न है। इस शिक्षा का संबंध मनुष्य के सर्वांगीण विकास के साथ है। भारतीय ज्ञान परंपरा संकीर्ण कक्षागत पढ़ाई, पाठ्यपुस्तकों की पढ़ाई से संबंधित, नहीं थी। उस शिक्षा का संबंध भारतीय संस्कृति, दर्शन, अध्यात्म, प्रोद्योगिकी आदि सभी के साथ था। गुरु-शिष्य परंपरा और गुरुकुल पद्धति भारतीय ज्ञान परंपरा के शसक्त वाहक थे। भारत के पास पुस्तकों की भरमार थी, भारत के पास तक्षशिला, विक्रमशीला, नालंदा जैसे विश्वविद्यालय थे। इन विश्वविद्यालयों में आनेवाले विद्यार्थियों को प्रारंभिक दिनों से ही गुरु यह मूलमंत्र देते थे कि ‘ज्ञानार्थ प्रवेश,सेवार्थ प्रस्थान’

अर्थात, ज्ञान प्राप्त करके केवल स्वयं को विकसित करना सही अर्थों में शिक्षित होना नहीं होता है। इसके विपरीत अपनी शिक्षा के द्वारा अपने साथ-साथ दूसरों के जीवन को विकसित करना ही सुशिक्षित व्यक्ति का कर्तव्य होता है। प्राचीनकाल से ही भारतीय शिक्षा प्रणाली में मानवीय मूल्यों एवं विशिष्ट वैज्ञानिक परंपराओं को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया। आचार्य यास्क ने निरुक्त में लिखा है, ‘नह्येषु प्रत्यक्षमस्तिअनुषेरतपसयो वा’।

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अर्थात्, ऋषि या तपस्वी हुए बिना मंत्रों के उचित ज्ञान को जानना संभव नहीं है। ठीक उसी प्रकार से जैसे पूर्व को जानने के लिए पूर्व की ओर ही चलना पड़ता है। उसी प्रकार से आर्ष प्रणीत सिद्धांतों व सूत्रों को समझने के लिए उनका चिंतन-मनन करना आवश्यक है। कहने का अर्थ यह है कि विद्या केवल पढ़ लेने, समझ लेने तक सीमित प्रक्रिया नहीं है। इसके विपरीत, चिंतन-मनन करते रहने की आवश्यकता होती है। महाउपनिषद के सिद्धांत के अनुसार, ‘अयं निज: परोवेति गणना लघु चेतषाम् उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्’।

भारत संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानता है। इसी कारण से भारत ने अपनी ज्ञान परंपरा का प्रचार मानवकल्याण हेतु सदियों से किया है। इसी कारण से विश्व के लिए ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ कोई नवीन शब्द नहीं है। दुखद बात यह है कि भारतवासी जाने-अनजाने ऋग्वेद की उक्ति, ‘संगच्छद्धवं संवद्धवं सं वो मनांसि जानताम् देवाभागं यथा पूर्वे, सजनानां उपासते’।

अर्थात, ‘साथ चलने, एक स्वर में बोलने और एक दूसरे के मन को जाननेवाला समाज ही अपने युग को बेहतर बनाने के सामर्थ्य को प्राप्त कर सकता है और ऐसे युग में जीनेवाले स्वयं के लिए बेहतर वर्तमान और आनेवाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य की संकल्पना करनेवाले होते हैं’। की मूलभावना को भूलते चले जा रहे हैं। इसी कारण से आज की शिक्षा प्रणाली परीक्षा परिणाम उन्मुख तथा यांत्रिक बन चुकी है। इसी कारण से फिर से प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण अवधारणाओं को वर्तमान युग शिक्षा प्रणाली के रूप में जोड़ने की बहुत आवश्यकता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा बंगाल की भूमिका- भारतीय ज्ञान परंपरा की अवधारणा प्राचीन है। इस परंपरा को विकसित करने में बंगाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बंगाल ने साहित्य, कला, दर्शन, विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों को विकसित करने कोई कसर नहीं छोड़ी है। रवीन्द्रनाथ टैगोर, जगदीशचंद्र बोस, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, प्रफुल्लचंद्र राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर आदि जैसे अनगिनत नाम मिलेंगे जिन्होंने प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को अपने-अपने ढंग से विकसित करने का प्रयास किया। नवजागरण काल का समय रहा हो या फिर स्वदेशी आंदोलन का समय बंगाल ने अपने सुदृढ़ और सुस्पष्ट नेतृत्व के द्वारा न केवल भारत बल्कि संपूर्ण विश्व को प्रभावित किया है। ‘नई शिक्षा नीति:2020’ के अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित पठन-पाठन के जिन शैलियों और तकनीकों की चर्चा की जा रही है उन्हें रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बहुत पहले ही प्रयोग में ला लिया था।

शांतिनिकेतन और भारतीय ज्ञान परंपरा के सह संबंध को रेखांकित करना आवश्यक है-

भारतीय ज्ञान परंपरा और शांतिनिकेतन- रवीन्द्रनाथ टैगोर का नाम आते ही सबसे पहले ‘गीतांजली’ की याद आती है। उनकी कविताओं की याद आती है। हाँ, वे कवि थे लेकिन बिना किसी प्रदर्शन के वे बहुत बड़े शिक्षाविद भी थे। बचपन में बालक रवि का एमएन पढ़ाई में नहीं लगता था क्योंकि उनका मन स्कूल के बंद दरवाजों के भीतर ऊब जाता था। किताब की लिखी-लिखाई बातों को रटते रहना उन्हें पसंद नहीं आता था। ऐसा नहीं था कि उन्हें ज्ञानार्जन में रुचि नहीं थी, वे प्रायोगिक शैली में ज्ञानार्जन करने में रुचि रखते थे। वैसे तो उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को लेकर कभी कोई आधिकारीक मंतव्य व्यक्त नहीं किया था लेकिन कहीं-कहीं उनके लेखों-पत्रों के द्वारा शिक्षा से संबंधित उनके विचार जानने का अवसर मिल जाता है। जैसे टैगोर ने अपनी पुस्तक ‘Personality’ में शिक्षा से संबंधित विचार व्यक्त करते हुए लिखा है, ‘सर्वोत्तम शिक्षा वही है जो संपूर्ण सृष्टि से हमारे जीवन का सामंजस्य स्थापित करती है’।

(The highest education is that which makes in our life harmony with all existence’.) यहाँ रेखांकित करनेवाला शब्द ‘संपूर्ण सृष्टि’ है। एक व्यक्ति तभी पूर्ण बन पाता है जब संसार की सभी चर-अचर, जड़-चेतन, सजीव-निर्जीव वस्तुओं के साथ वह एकाकार स्थापित कर पाता है। टैगोर ने शिक्षा के संबंध में प्राचीन भारतीय मत ‘सा विद्या विमुक्तये’ को ही सर्वश्रेष्ठ आधार माना है। क्योंकि यही विद्या मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान देकर उसे जीवन और मरण से मुक्ति प्रदान करती है। टैगोर ने शिक्षा के प्राचीन आदर्श को व्यापक स्वरूप प्रदान करते हुए लिखा है, ‘शिक्षा न केवल आवागमन से वरन आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और मानसिक दासता से भी मनुष्य को मुक्ति प्रदान करती है। अत: मनुष्य को शिक्षा द्वारा उस ज्ञान का संग्रहण करना चाहिए जो उसके पूर्वजों द्वारा संचित किया जा चुका है, यही सच्ची शिक्षा है’।

सन् 1901 में गुरुदेव द्वारा स्थापित ‘शांतिनिकेतन’ केवल एक स्थान नहीं है। इसके विपरीत शांतिनिकेतन भारतीय ज्ञान परंपरा और अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान परंपरा के बीच में सेतु स्थापित करनेवाला उत्कृष्ट ‘मॉडेल’ है। सन् 1921 में शांतिनिकेतन का विस्तार हुआ और यह ‘विश्वभारती विश्वविद्यालय’ बन गया। ध्यान देनेवाली बात यह है कि भारत सन् 1947 में स्वाधीन हुआ उससे पहले ही भारत के पास एक और विश्वविद्यालय स्थापित हो चुका था जो प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को अपना आधारस्तंभ मानता था।

शांतिनिकेतन कैसे भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ जुड़ा हुआ है इसे निम्न बिंदुओं के द्वारा सरलता के साथ समझा जा सकता है-

गुरुकुल व्यवस्था- प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस व्यवस्था में गुरुकुल को सर्वोपरि महत्व प्रदान किया गया था। गुरुदेव ने शांतिनिकेतन के प्रारंभिक दिनों से ही गुरुकुल व्यवस्था को अपना लिया था। ताकि, विद्यार्थी शिक्षक के साथ घनिष्ठ संबंध बना सके, विद्यार्थी शिक्षक के साथ स्वतंत्र रूप में वार्तालाप कर सके, विद्यार्थी आत्माभिव्यक्ति की ओर अग्रसित हो सके और केवल किताबी ज्ञान से बाहर आकर अपने अनुभवों के द्वारा ज्ञान को संपूर्णतया हृदयांगम कर सके।

विद्यार्थियों के समग्र विकास पर ज़ोर- प्रत्येक विद्यार्थी अपने आप में एक अलग व्यक्ति होता है। इसी कारण से सभी विद्यार्थियों की रुचि सभी विषयों पर एक समान नहीं हो सकती है। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा केवल कुछेक विषयों तक सीमित नहीं था। विद्यार्थी सभी प्रकार के विषयों को जानने-सीखने के लिए स्वतंत्र हुआ करते थे। शांतिनिकेतन में गुरुदेव ने ऐसी ही शिक्षा प्रणाली को अपनाया था। संगीत, रंगमच, साहित्य, कला आदि से लेकर लाठी खेला, हस्तकरघा, पशुपालन, आध्यात्मिक विकास आदि सभी कुछ शांतिनिकेतन के पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग है। शांतिनिकेतन परिसर में अवस्थित ध्यान केंद्र, कलाभवन, उत्तरायण परिसर आदि विद्यार्थियों का समग्र विकास किस प्रकार से मुक्त प्राकृतिक सौंदर्य के भीतर रहकर किया जा सकता है। यह मार्गदर्शन आज भी भारत के साथ-साथ संपूर्ण विश्व को दे रहा है।

ग्रामीण पुनरुद्धार, पर्यावरण सुरक्षा और रोज़गार प्रासंगिक शिक्षा प्रणाली- भारतीय ज्ञान परंपरा में कर्म को हमेशा ही महत्व प्रदान किया गया है। आश्रम व्यवस्था में जीवन यात्रा को जो 4 भागों में बाँटा गया है- ब्रम्ह्चर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। यह मनुष्य को व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों प्रकार से कर्मासक्त करने के लिए ही इस प्रकार से बाँटा गया है। शिक्षा रोज़गार के साथ जुड़े यह आवश्यक है। शिक्षा का उद्देश्य लोककल्याण तो अवश्य ही होना चाहिए। ‘नई शिक्षा नीति:2020’ में इन विषयों पर ज़ोर अब फिर से दिया जा रहा है। लेकिन ये विषय नए नहीं है। ये विषय भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ पहले से ही जुड़े हुए है। प्रकृति का कण-कण भारत में पूजनीय है, भारत गाँवों का देश है, रोज़गार के अनेक साधन ग्रामीण भारत में उपलब्ध है। मानवता, पर्यावरण तथा रोज़गार तीनों एक साथ शांतिनिकेतन में त्रिवेणी की धारा समान बहती है। पलाश के फूल झड़ते हैं, उनसे आभूषण बनते है, सोनारझुड़ी हाट (बाजार) में वे आभूषण बिकते हैं। ऐसा अद्भुत संगम विश्व में शायद ही कहीं और दिखाई पड़ती हो। यह गुरुदेव की दूरदर्शिता का प्रमाण है। यह तो केवल एक उदाहरण है ऐसे अनगिनत उदाहरण शांतिनिकेतन के चारों तरफ फैले हुए दिखाई पड़ते हैं।

सांस्कृतिक अभिसरण, अंतरराष्ट्रीयता तथा परंपराओं का मिलन- प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनि अपने शिष्यों के साथ ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए, मानवकल्याण के लिए पदयात्रा किया करते थे। ‘नई शिक्षा नीति:2020’ के अंतर्गत इसे ‘Field Trip’ कहा जा रहा है और विद्यार्थियों के बौद्धिक, तार्किक, आध्यात्मिक विकास के लिए ऐसे ‘Field Trip’ को बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शांतिनिकेतन के प्रवेश द्वार को गुरुदेव ने प्रारम्भिक दिनों से ही सभी प्रकार के विद्यार्थियों के लिए खोल दिया था। यहाँ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों का मिलन किसी न किसी उत्सव, संगोष्ठी, कार्यशाला आदि के माध्यम से स्वाभाविक तौर पर ही होता है। वसंतोत्सव, माघ मेला आदि तो कुछेक उदाहरण है। गुरुदेव की दूरदर्शिता के कारण से, उनकी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति श्रद्धा के कारण से ही शांतिनिकेतन यूनेस्को के ‘विश्व धरोहर स्थल’ के रूप में नामित हो सका।

नि:संदेह गुरुदेव की सोच दूरदर्शी थी। ‘नई शिक्षा नीति:2020’ जिन विषयों पर अब फिर से सोच रही है वे विषय शांतिनिकेतन की शिक्षा प्रणाली, वहाँ की जीवनशैली का अभिन्न अंग है।

डॉ सुपर्णा मुखर्जी
हैदराबाद

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