कोलकाता/चेन्नई : पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के पहले चरण में आजादी के बाद से सबसे ज्यादा वोटिंग हुई। पश्चिम बंगाल में शाम 7 बजे तक 152 पोलिंग स्टेशनों पर औसत वोटिंग 91.91 प्रतिशत रही। इससे पहले बंगाल में सबसे ज्यादा वोटिंग 2011 में 84.72 प्रतिशत थी। वोटिंग के पहले चरण के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में आजादी के बाद से सबसे ज्यादा वोटिंग दर्ज की गई है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु दोनों ही राज्यों में मतदान में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में ज्यादा है।
पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान के दौरान कई जिलों में 90 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया, जो एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। जिलावार आंकड़ों के मुताबिक दक्षिण दिनाजपुर में सर्वाधिक करीब 94.77, कूचबिहार में 94.40, बीरभूम में 93.61 और जलपाईगुड़ी में 93.01 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। इसके अलावा मालदा में 92.22, मुर्शिदाबाद में 92.88, उत्तर दिनाजपुर में 92.04 और झारग्राम में 91.78 प्रतिशत मतदान हुआ। वहीं, अलीपुरद्वार, बांकुड़ा, पश्चिम मेदिनीपुर और पूर्व मेदिनीपुर जैसे जिलों में भी मतदान प्रतिशत 89 से 91 के बीच रहा। दार्जिलिंग (88.01 प्रतिशत) और कलिम्पोंग (82.93 प्रतिशत) जैसे इलाकों में अपेक्षाकृत कम, लेकिन फिर भी मजबूत मतदान दर्ज किया गया। पश्चिम बंगाल में शाम सात बजे तक 152 पोलिंग स्टेशनों पर वोटर टर्नआउट 91.91 प्रतिशत रहा।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान बड़ी संख्या में नाम काटे जाने को लेकर विवाद के बीच राज्य के 16 जिलों में मतदान से 294 सदस्यीय राज्य विधानसभा के 152 निर्वाचन क्षेत्रों में 167 महिलाओं सहित 1,478 उम्मीदवारों के चुनावी भाग्य का फैसला होगा। भीषण गर्मी और उमस के बावजूद मतदाता सुबह से ही मतदान केंद्रों के बाहर बड़ी संख्या में कतारों में खड़े नजर आए और जैसे-जैसे समय बीतता गया, मतदान की गति तेज होती गई। मतदान केंद्रों के बाहर लंबी कतारें इस बात का संकेत थीं कि मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसे सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच महत्वपूर्ण मुकाबले के रूप में देखा जा रहा है।
निर्वाचन आयोग के अनुसार, सुबह सात बजे मतदान शुरू हुआ। राज्य में शाम पांच बजे तक 89.93 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जिसमें दक्षिण दिनाजपुर जिले में सबसे अधिक 93.12 प्रतिशत मतदान हुआ। विश्लेषकों का कहना है कि मतदान में लोगों की भारी भागीदारी बढ़ी हुई राजनीतिक गोलबंदी और एसआईआर के सांख्यिकीय प्रभाव दोनों को दर्शाती है, जिसके तहत राज्य भर में मतदाता सूची से 91 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए थे। पहले दो घंटे में 3.60 करोड़ मतदाताओं में से 18.76 प्रतिशत ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया और धीरे-धीरे मतदान में तेजी आई। पूर्वाह्न 11 बजे तक 41.11 प्रतिशत और अपराह्न एक बजे तक 62.18 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। तीन बजे तक 78 प्रतिशत मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर चुके थे।
उम्मीदवारों पर हमलों समेत कुछ जिलों में छिटपुट हिंसा की घटनाओं ने बंगाल के चुनावी माहौल में अपेक्षित तनाव पैदा कर दिया। निर्वाचन आयोग ने हिंसा के संबंध में अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी है। बीरभूम जिले के खारिसोल में अंतिम घंटों के दौरान तनाव काफी बढ़ गया, जब मतदाताओं ने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में डाले गए वोट भाजपा के खाते में दर्ज हो रहे हैं। चुनाव अधिकारियों और नाराज मतदाताओं के बीच बहस छिड़ने के बाद स्थिति और बिगड़ गई, जिसके बाद स्थानीय लोगों का एक समूह मतदान केंद्र के बाहर इकट्ठा हो गया और प्रदर्शन करने लगा।
इससे पहले, दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज में बीजेपी उम्मीदवार शुभेंदु सरकार के साथ उस समय हाथापाई की गई जब वह गड़बड़ी की खबरों के बाद एक मतदान केंद्र की ओर जा रहे थे। शुभेंदु सरकार ने दावा किया कि पुलिस की मौजूदगी में उनकी पिटाई की गई और उनके वाहन में तोड़फोड़ की गई। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया कि शुभेंदु सरकार ने एक बूथ के पास अशांति फैलाने की कोशिश की थी जिसके कारण स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया।
इसी क्रम में एक अन्य घटना में आसनसोल दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के रहमत नगर में भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्रा पॉल की कार पर पथराव किया गया जिससे उसकी पिछली खिड़कियों के शीशे टूट गए। मुर्शिदाबाद के नौदा में आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) और तृणमूल के समर्थकों के बीच झड़पें हुईं। वाहनों में तोड़फोड़ और पथराव के बाद भीड़ को तितर-बितर करने के लिए केंद्रीय बलों को लाठीचार्ज करना पड़ा। एजेयूपी प्रमुख हुमायूं कबीर जब एक मतदान केंद्र पर गए तो उन्हें तृणमूल समर्थकों के विरोध का सामना करना पड़ा। कबीर ने बाद में सत्तारूढ़ पार्टी पर डराने-धमकाने और गड़बड़ी का आरोप लगाया जबकि तृणमूल ने इन आरोपों को खारिज करते हुए हिंसा की निंदा की।
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दूसरी ओर तमिलनाडु में विधानसभा की सभी 234 सीटों पर मतदान के साथ ही इस बार का चुनाव कई मायनों में अलग नजर आया। पिछले चुनाव के मुकाबले वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है और सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि राज्य की पारंपरिक दो-दलीय राजनीति द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) के बीच अब एक नया खिलाड़ी मजबूती से उभरा है। यह नया चेहरा हैं अभिनेता से नेता बने विजय, जिनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।
विजय ने इस चुनाव में अपनी रणनीति साफ रखी उन्होंने सीधे सत्ताधारी डीएमके पर निशाना साधा और यह तक दावा किया कि असली मुकाबला डीएमके और उनकी पार्टी के बीच है। वहीं एआईएडीएमके को अपेक्षाकृत कमजोर बताकर उस पर हमले सीमित रखे। इस आक्रामक पोजिशनिंग से उन्होंने खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित करने की कोशिश की।

हालांकि टीवीके अभी नई पार्टी है, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर इसे मजबूत बनाने की कोशिश साफ दिखती है। पार्टी में पूर्व नौकरशाहों, शिक्षाविदों और पूर्व विधायकों को शामिल किया गया है। विजय ने खास तौर पर युवाओं को केंद्र में रखकर अपनी राजनीतिक रणनीति तैयार की है, जो राज्य के बदलते मतदाता प्रोफाइल को ध्यान में रखती है। टीवीके की नींव विजय के फैन बेस संगठन विजय मक्कल इयाक्कम पर टिकी है। इसी संगठन ने स्थानीय निकाय चुनावों में 169 सीटों पर चुनाव लड़कर 115 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस प्रदर्शन ने यह संकेत दिया कि विजय की लोकप्रियता सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे वोट में भी बदला जा सकता है।
तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी सितारों का प्रभाव नया नहीं है। एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर), जे. जयललिता और एम. करुणानिधि जैसे दिग्गजों ने सिनेमा से राजनीति में सफल बदलाव का उदाहरण पेश किया। लेकिन हर अभिनेता को यह सफलता नहीं मिली। कमल हासन की मक्कल नीधि मय्यम पार्टी 2021 के चुनाव में खास असर नहीं छोड़ पाई और वे खुद भी चुनाव हार गए थे। दरअसल, तमिलनाडु की राजनीति 1967 से लगातार द्रविड़ दलों के प्रभाव में रही है, जहां राष्ट्रीय दल जैसे भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सहयोगी भूमिका में ही नजर आते हैं। इस बार भाजपा एआईएडीएमके के साथ और कांग्रेस डीएमके के गठबंधन में चुनाव मैदान में हैं।
राज्य का सामाजिक समीकरण भी चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाता है। बहुसंख्यक हिंदू आबादी के भीतर पिछड़ी, अत्यंत पिछड़ी और दलित जातियों का बड़ा हिस्सा है, जो राजनीतिक दलों की रणनीति का केंद्र रहता है। विजय खुद वेल्लालर समुदाय से आते हैं, जो राज्य का प्रभावशाली कृषक वर्ग माना जाता है। इस बार तमिलनाडु के मतदाताओं के सामने दो से अधिक विकल्प हैं। ऐसे में पारंपरिक वोटिंग पैटर्न में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अब नजर इस बात पर है कि क्या विजय की टीवीके राज्य की राजनीति में स्थायी जगह बना पाती है या यह चुनौती सिर्फ चुनावी शोर तक सीमित रह जाती है। (एजेंसियां)
