मई महीना-2026 अर्थात एक ज्वलंत महीना। एक तरफ सूर्य देवता अपने तेज से संसार को मानो जला ही देने का प्रयास कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ सभ्यता की चरम पराकाष्ठा पर पहुँचा भारत महान अपनी तीन बेटियों को तथाकथित दहेज़-प्रताड़ना से बेहतर मृत्यु को गले लगाते हुए देखकर वेदना की पीड़ा में जल रहा है।
हाँ, तथाकथित दहेज़-उत्पीड़न, क्योंकि दहेज़-उत्पीड़न ही इन आधुनिकाओं की मृत्यु का कारण है या नहीं, यह अभी तक सिद्ध नहीं हुआ है। जो सिद्ध नहीं हुआ, उस पर बात करके क्या लाभ? जो सिद्ध हो चुका है, उस पर बात करना अधिक उचित है। तीनों बेटियों के माता-पिता और समस्त मायके वालों का कहना है कि विवाह के समय दहेज़ माँगा गया। माँग पूरी भी की गई और फिर भी बेटियों को प्रताड़ित किया गया तथा अंततः उन्हें मार डाला गया।
यदि ऐसा है, तो तीनों बालिकाओं के विवाह में पहले से ही दहेज़ रूपी राक्षस उपस्थित था और उसकी आवभगत भी की गई। प्रश्न यह है कि दहेज़ रूपी राक्षस को स्वीकार ही क्यों किया गया? बेटियों की मृत्यु के बाद, उन्हें संदिग्ध अवस्था में मृत देखकर पूरे मायके ने मीडिया, शहर और गली-मोहल्लों तक को आंदोलित कर दिया, पर जिस दिन, जिस क्षण आपके घर में दहेज़ की बात हुई, उसी दिन आपने हुंकार क्यों नहीं भरी?
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ध्यान रखने योग्य बात यह भी है कि ये तीनों बेटियाँ पढ़ी-लिखी थीं। दिवंगत आत्माओं को प्रणाम, पर प्रश्न यह भी है कि जब आपके माता-पिता से दहेज़ माँगा गया, तब भी आपने ऐसे पुरुष को अपना पति चुनना उचित क्यों समझा? नोएडा की बेटी का जो वीडियो वायरल है, उसमें उसका चेहरा बनावटी मेकअप से भरा हुआ दिखाई देता है। यह सत्य है कि विवाह के दिन दुल्हन का सजना उसका अधिकार है, पर क्या वह बेटी सचमुच मुस्कुरा सकती है, जिसके माता-पिता की गर्दन दहेज़ के बोझ तले दबी हो?
क्या स्त्रीवाद यह नहीं सिखाता कि दहेज़ का विरोध करने के लिए प्रेम का बलिदान देना भी बेहतर हो सकता है? दहेज़ विवाह में मौजूद था — यह तो सिद्ध हो चुका है। ठीक उसी प्रकार, तकनीक भी लगातार दिवंगत आत्माओं और उनके परिवारों के पास उपलब्ध थी। मृत्यु के बाद व्हाट्सऐप चैट खंगालने से बेहतर होता कि जब प्रताड़िता बार-बार कह रही थी कि उसे सुरक्षा की आवश्यकता है, तब “एक दिन रुक जाओ” कहने के बजाय उसे यह कहा जाता — “रुको, मैं अभी आया।”
ध्यान रहे, इन तीन बेटियों के साथ जयपुर की एक माँ ने भी अपने पुत्र के सामने पति द्वारा अपमानित होने का दर्द न सह पाने के कारण मृत्यु को गले लगा लिया। उस माँ को उतनी मीडिया कवरेज नहीं मिल पा रही है। जब वह सहते-सहते माँ बन गई थी, तो सहते-सहते दादी बनने की उम्र भी आ ही जाती। फिर वह कौन-सी जयपुर सुंदरी थी? दहेज़ के कारण किसी की मृत्यु हुई है या नहीं — इस पर बहस चलती रहेगी।
कानून के अपने दाँव-पेंच हैं। पर साधारण नागरिकों के लिए, जिनके घरों में शादी-ब्याह का मौसम आने वाला है या आ चुका है, यह समझना आवश्यक है कि दोष हम सब की मानसिकता का भी है। हमें दिखावा करना पसंद है — इस सत्य को स्वीकार कीजिए और विवाह के नाम पर दिखावा बंद कीजिए।
मंत्रोच्चार के साथ पारंपरिक तरीके से विवाह सम्पन्न कीजिए। जो भी देना हो, अपने बालक-बालिका, बेटी-जमाई या पुत्र-बहू को धीरे-धीरे दीजिए। सबसे पहले अपनी संतान की मनोदशा और उसके जीवनसाथी की मनोदशा को देखिए-समझिए। मनुष्य जीवन अपने आप में सर्वोच्च उपहार है — पहले उसे बचाने का प्रयास कीजिए।

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी हैदराबाद, संपर्क- 96032 24007
