मुंशी प्रेमचंद की जयंती हर साल 31 जुलाई को मनाई जाती है। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गांव में हुआ था। उन्हें हिंदी और उर्दू साहित्य का ‘कथा सम्राट’ और ‘उपन्यास सम्राट’ कहा भी जाता है।
प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े भाई साहब’ केवल दो भाइयों के पारस्परिक संबंधों की कथा नहीं है, बल्कि भारतीय शिक्षा-व्यवस्था, अनुशासन, नेतृत्व, उत्तरदायित्व तथा नैतिक मूल्यों का एक सशक्त दस्तावेज़ है। यह कहानी विद्यार्थी जीवन के उन आदर्शों को स्थापित करती है, जिनकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है जितनी प्रेमचंद के समय में थी।
विद्यार्थियों के आदर्श चरित्र-निर्माण
वर्तमान समय में जब विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति अनेक चुनौतियों और संभावनाओं के बीच खड़ी है, तब यह कहानी विद्यार्थियों के आदर्श चरित्र-निर्माण और उत्तरदायी नेतृत्व की दिशा में महत्त्वपूर्ण संकेत प्रदान करती है। भारतीय समाज में विद्यार्थी केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने वाला व्यक्ति नहीं माना गया, बल्कि उसे भविष्य का जागरूक नागरिक, संवेदनशील नेता तथा राष्ट्र-निर्माता समझा गया है।
लोकतंत्र की प्रयोगशाला
इसी प्रकार छात्र राजनीति को भी लोकतंत्र की प्रयोगशाला कहा जाता है, जहाँ से भविष्य के सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व का निर्माण होता है। किंतु जब राजनीति शिक्षा पर हावी होने लगती है, तब उसका मूल उद्देश्य धूमिल हो जाता है। ऐसे समय में प्रेमचंद की ‘बड़े भाई साहब’ विद्यार्थी जीवन के वास्तविक आदर्शों को पुनः स्थापित करने का कार्य करती है।
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कर्तव्यनिष्ठा होना चाहिए
कहानी में बड़े भाई साहब के विचार भारतीय शिक्षा-दर्शन के मूल सिद्धांतों को अभिव्यक्त करते हैं। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना नहीं, बल्कि ज्ञान के साथ चरित्र का विकास करना है। वे निरंतर अध्ययन, अनुशासन, परिश्रम और आत्मसंयम को सफलता का आधार मानते हैं। उनके विचारों में यह स्पष्ट है कि विद्यार्थी को विनम्र, उत्तरदायी तथा कर्तव्यनिष्ठा होना चाहिए। यही वे मूल्य हैं जो भारतीय शिक्षा-दर्शन की आत्मा माने जाते हैं। भारतीय चिंतकों और शिक्षाविदों ने भी शिक्षा के इन्हीं उद्देश्यों पर बल दिया है।
‘बड़े भाई साहब’
स्वामी विवेकानंद ने चरित्र-निर्माण को शिक्षा का सर्वोच्च लक्ष्य माना। महात्मा गांधी ने अपनी ‘नई तालीम’ में श्रम, नैतिकता और आत्मनिर्भरता को शिक्षा का आधार बताया। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने शिक्षा को लोकतंत्र और मानवीय मूल्यों की आधारशिला माना। उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद ने अपनी कहानी में इन महापुरुषों का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं किया, किंतु उनके शिक्षा-दर्शन के मूल तत्वों को अत्यंत सहज और प्रभावशाली ढंग से कथा के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। इस दृष्टि से ‘बड़े भाई साहब’ भारतीय शिक्षा-दर्शन का साहित्यिक रूपांतरण प्रतीत होती है।
छात्र आंदोलन
आज जब देश के अनेक विश्वविद्यालय छात्र आंदोलनों, वैचारिक मतभेदों, हिंसात्मक विरोध, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति, पुलिस कार्रवाई तथा अनेक विवादों के कारण चर्चा में रहते हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या विरोध और अराजकता एक ही बात हैं? लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और विरोध प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, किंतु उसका स्वरूप शांतिपूर्ण, तर्कपूर्ण और उत्तरदायी होना चाहिए। हिंसा, घृणा, वैमनस्य अथवा सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने वाली गतिविधियाँ लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं कही जा सकतीं।
अराजकता, हठधर्मिता अथवा हिंसात्मक व्यवहार को स्वीकार नहीं
इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए ‘बड़े भाई साहब’ कहानी अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है। कहानी में दोनों भाइयों के विचार, स्वभाव और अध्ययन-पद्धति भिन्न हैं। छोटे भाई के मन में शिक्षा और परीक्षा-व्यवस्था को लेकर अनेक प्रश्न हैं, जबकि बड़े भाई अपने अनुभवों के आधार पर अनुशासन और परिश्रम का महत्त्व समझाते हैं। दोनों के बीच मतभेद अवश्य हैं, किंतु वे संवाद, आत्मचिंतन और पारस्परिक सम्मान का मार्ग नहीं छोड़ते। वे किसी भी स्थिति में अराजकता, हठधर्मिता अथवा हिंसात्मक व्यवहार को स्वीकार नहीं करते।
आचरण से दूसरों को प्रेरित करना
यह संदेश आज की छात्र राजनीति के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है कि अधिकारों की माँग के साथ-साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी उतना ही आवश्यक है। प्रेमचंद की कहानी इन सभी मूल्यों को व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है। यह विद्यार्थियों को सिखाती है कि अनुशासन बनाए रखना, समय का सदुपयोग करना, संवाद और विवेक के माध्यम से समस्याओं का समाधान खोजना तथा दूसरों के अनुभवों का सम्मान करना एक आदर्श विद्यार्थी की पहचान है। यही गुण आगे चलकर उत्तरदायी नेतृत्व का निर्माण करते हैं। नेतृत्व का अर्थ केवल पद प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने आचरण से दूसरों को प्रेरित करना भी है।
वर्तमान समय में छात्र राजनीति को केवल चुनाव, नारेबाजी या संगठनात्मक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे शिक्षा की गुणवत्ता, पर्यावरण संरक्षण, डिजिटल साक्षरता, लैंगिक समानता, सामाजिक सेवा, शोध एवं नवाचार, संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण तथा राष्ट्रीय एकता जैसे विषयों को अपने कार्यक्रमों में प्रमुखता देनी चाहिए। जब छात्र संगठन इन रचनात्मक कार्यों से जुड़ेंगे, तभी विश्वविद्यालय ज्ञान, नेतृत्व और सामाजिक परिवर्तन के वास्तविक केंद्र बन सकेंगे।
प्रासंगिक और प्रेरणादायक
अंततः कहा जा सकता है कि प्रेमचंद की ‘बड़े भाई साहब’ केवल एक पारिवारिक कहानी नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा-दर्शन और आदर्श छात्र जीवन का जीवंत दस्तावेज़ है। यह कहानी आज की युवा पीढ़ी को यह संदेश देती है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र, विवेक, अनुशासन, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का विकास करना है। यदि छात्र राजनीति इन मूल्यों को आत्मसात कर ले, तो वह केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम न रहकर राष्ट्र-निर्माण की सशक्त शक्ति बन सकती है। इस प्रकार प्रेमचंद का शिक्षा-दर्शन आज के विश्वविद्यालयों और विद्यार्थियों के लिए उतना ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक है, जितना उनके समय में था।

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी (96032 24007)
हैदराबाद
