Bonalu-2026: महानगर हैदराबाद में बोनालु का जोश, एक महीने तक जश्न में डूबेंगे श्रद्धालु, जानें परंपरा और लोगों का विश्वास

आषाढ़ माह शुरू हो गया है। इसके साथ ही महानगर हैदराबाद शहर में बोनालु का उल्लास शुरू हो गया है। 16 जुलाई को गोलकोंडा में जगदंबिका माता को पहला बोनम समर्पित किया जाएगा। बोनालु त्योहार के साथ कुछ जगहों पर क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के अनुसार ग्राम देवताओं और कुल देवताओं की पूजा की जाती है। आखिर यह त्योहार क्यों मनाया जाता है? हमारी परंपरा के अनुसार आषाढ़ महीने में देवी माता मायके आती हैं। इसलिए माता को पसंद का भोजन, साड़ी और सारे भेंट किए जाते हैं।

तेलंगाना की संस्कृति

हैदराबाद शहर आषाढ़ महीना आध्यात्मिक शोभा से भर गया है। तेलंगाना की संस्कृति और अस्मिता का प्रतीक बोनालु जातरा को भव्य रूप से मनाने के लिए राज्य सरकार ने सभी इंतजाम किए हैं। लोक कलाओं, शिवसत्तुओं के पूनक, पोतराजुओं के प्रदर्शन के बीच अम्मावार को बोनम समर्पित करने के समारोहों के लिए सब तैयार है। नाम से भले ही क्षेत्रीय त्योहार हो, लेकिन देशभर में जहां भी तेलंगाना के लोग रहते हैं, वहां इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। विदेशों में रहने वाले तेलंगाना के लोग भी अपनी संस्कृति और परंपराओं को भक्ति-श्रद्धा से मनाते हैं।

देवी माता

बोनम क्या होता है

भोजन शब्द का रूपांतर बोनम है। बोनालु त्योहार तेलंगाना में बहुत धूमधाम से मनाया जाने वाला उत्सव है। रायलसीमा के कुछ क्षेत्रों में भी बोनालु मनाए जाते हैं। तेलंगाना में इस त्योहार को ‘आषाढ़ बोनालु त्योहार’ भी कहा जाता है। बोनालु जातरा वाले दिन भक्त सिर पर से स्नान कर नए कपड़े पहनकर मंदिर जाते हैं। वहीं पर चूल्हा बनाकर नए मटके को हल्दी-कुमकुम से सजाकर उस मटके में नए चावल, दूध और गुड़ डालकर प्रसाद तैयार किया जाता है। फिर उस मटके के ऊपर एक और मटका रखकर उसमें दीप जलाते हैं और चारों तरफ नीम के पत्तों से सजाते हैं। उन मटकों को सिर पर रखकर माता देवी के दर्शन के लिए जाते हैं।

पहला बोनम

देवी माता के दर्शन के बाद उस प्रसाद को परिवार के सभी सदस्य मिलकर ग्रहण करते हैं। हालांकि मंदिर में बोनम पकाने की सुविधा न होने पर माता को ‘ओडिबिय्यम’ (नये कपड़े में चावल भरकर) भी समर्पित किया जा सकता है। वहीं, बोनालु के अवसर पर अपनी परेशानियां दूर होने के लिए आभार स्वरूप माता देवी के सामने मुर्गे और बकरे की बलि भी दी जाती है। आषाढ़ महीने की शुरुआत के साथ गोलकोंडा जगदंबिका मंदिर में बोनालु शुरू हो जाते हैं। कहा जाता है कि प्रताप रुद्र के बाद आए मुस्लिम नवाबों ने यहां पूजा करने की अनुमति दी थी। उसी समय से हैदराबाद में गोलकोंडा के सबसे पुराने जगदंबिका माता देवी मंदिर में पहला बोनम चढ़ाना परंपरा बन गई है।

लाल दरवाजा में अनुराधा का रंगम

बोनालु त्योहार की विशेषताएं

इन बोनालु त्योहार उत्सव में पोतराजू के करतब सभी को हैरान कर देते हैं। साथ ही भविष्यवाणी ‘रंगम‘ बताने वाला प्रसंग भी इस त्योहार का महत्वपूर्ण और आकर्षण से भरा हिस्सा होता है। देवी माता के स्वरूप के रूप में मानी जाने वाली महिला इस अवसर पर भविष्यवाणी (रंगम) सुनाती है। उसमें बारिश कैसी होगी? लोग सुख-चैन से रहना हो तो क्या करना चाहिए? जैसे अनेक बातें बताई जाती हैं। इसके अलावा बोनम लेकर मंदिर जाने वाली महिलाओं में देवी माता का वास हो जाता है। ऐसा श्रद्धालु मानते हैं। वे जब पैदल जाती हैं तो कुछ भक्त उनके पैर पानी से धोकर उसे देवी माता को अर्पित किया जाने वाला ‘पदार्थ’ मानते हैं।

सिकंदराबाद महाकाली मंदिर में स्वर्णलता का ‘रंगम’

पंरपरा और विश्वास

बोनम के रूप में लाए गए प्रसाद को एक जगह ढेर लगाकर रखने को ‘वडि’ कहते हैं। मंदिर गए सभी भक्त को गुड़ का पानकम (मीठा पेय) चढ़ाते हैं। उसे ‘साका’ कहते हैं। संतान प्राप्ति के लिए और बच्चों की बीमारियां दूर करने के लिए देवी माता को बांस की खपच्चियों से बनी पालना चढ़ाने को ‘तोट्टेलु’ कहते हैं। त्योहार के बाद देवी माता को मंगल वाद्यों के साथ गलियों में जुलूस निकालकर विदा करने को ‘सागनंपडम’ कहते हैं। (तेलंगाना समाचार संकलन)

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