हैदराबाद: जेलों में बंद कैदियों को सिर्फ सजा काट रहे अपराधी के तौर पर न देखकर, उन्हें मानसिक रूप से बदलकर उत्तम नागरिक के रूप में तैयार करने के लिए तेलंगाना जेल और करेक्शनल सर्विसेज विभाग द्वारा शुरू किए गए अद्भुत, अनोखे कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च पहचान मिली है। राज्य की कई जेलों में नशे की लत के शिकार कैदियों के लिए विशेष रूप से शुरू किए गए निवृत्ति डी-एडिक्शन केंद्रों की स्थापना, संचालन के लिए तेलंगाना जेल विभाग ने प्रतिष्ठित स्कॉच अवार्ड 2026 जीता है। नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में हाल ही में आयोजित 109वें स्कॉच समिट इंडिया इकोनॉमिक फोरम में इस पुरस्कार का समारोह भव्य रूप से हुआ।
कैदियों में नशीले पदार्थों पर निर्भरता की खतरनाक समस्या को सुलझाने के लिए तेलंगाना जेल विभाग द्वारा अपनाई गई अनोखी, पुनर्वास आधारित नीति (कस्टडी विथ केयर ट्रांसफॉर्मिंग लाइव्स) को पहचानते हुए ज्यूरी ने यह पुरस्कार दिया। स्कॉच लॉ ऑफिसेज के संस्थापक रोहन कोचर, स्कॉच ग्रुप के चेयरमैन समीर कोचर के हाथों तेलंगाना जेल, करेक्शनल सर्विसेज की डायरेक्टर जनरल डॉक्टर सौम्या मिश्रा ने यह प्रतिष्ठित अवार्ड स्वीकार किया। इस मौके पर डीजी डॉक्टर सौम्या मिश्रा ने कहा कि कैदियों के पुनर्वास के लिए जेल विभाग के अधिकारी, कर्मचारी जिस समर्पण से काम कर रहे हैं, उसके लिए यह अवार्ड एक बड़ी पहचान है, ऐसा हर्ष व्यक्त किया।
तेलंगाना सरकार के तय किए गए ड्रग फ्री तेलंगाना लक्ष्य के मुताबिक जेल विभाग की डीजी डॉक्टर सौम्या मिश्रा के नेतृत्व में यह निवृत्ति डी-एडिक्शन कार्यक्रम शुरू हुआ। भारत सरकार के सामाजिक न्याय, अधिकारिता मंत्रालय के तहत नेशनल एक्शन प्लान फॉर ड्रग डिमांड रिडक्शन, नशा मुक्त भारत अभियान के सहयोग से यह लागू हो रहा है। ड्रग्स केसों में या अन्य अपराधों में गिरफ्तार होकर जेल आने वालों में ड्रग्स की लत के शिकार लोगों को पहचान कर उन्हें वैज्ञानिक तरीके से डी-एडिक्शन इलाज, साइकोलॉजिकल काउंसलिंग, व्यवहार बदलाव पर ट्रेनिंग दी जा रही है। फिलहाल ये डी-एडिक्शन केंद्र चर्लापल्ली सेंट्रल प्रिजन, हैदराबाद सेंट्रल प्रिजन, संगारेड्डी, निजामाबाद सेंट्रल प्रिजन के साथ-साथ हैदराबाद की स्पेशल वुमेन प्रिजन में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।
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राज्यभर में अब तक 4,200 कैदियों की नशीले पदार्थों के सेवन पर स्क्रीनिंग की गई। इसमें ड्रग्स प्रभावित पाए गए 2,126 कैदियों की विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देशों के मुताबिक स्क्रीनिंग कर, काउंसलिंग इलाज की मदद दी गई। सजा पूरी कर जेल से रिहा हुए 300 कैदियों का बाहर जाने के बाद भी फॉलो-अप कर, वे दोबारा नशे की चपेट में न आएं, इसके लिए जरूरी सहायक सेवाएं अधिकारियों ने दीं। इस इलाज का असर किस स्तर पर है, इसका उदाहरण यह है कि एक कैदी ने अपना डी-एडिक्शन इलाज जेल में पूरा खत्म करने के लिए अपनी जमानत तक टालने का फैसला किया, यह इस कार्यक्रम की सफलता का प्रमाण है।
रिहा होने के बाद कई कैदी उच्च शिक्षा जारी रखने के लिए, हुनर विकसित करने के लिए जेल विभाग के अधिकारियों का मार्गदर्शन मांग रहे हैं, यह विशेष बात है। वेल्लोर में APCA द्वारा किए गए प्रभाव अध्ययन में भी निवृत्ति कार्यक्रम की क्षमता साबित हुई। इसके अलावा न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में हुई इंटरनेशनल रिसर्च इन करेक्शन्स कॉन्फ्रेंस में ये नतीजे दिखाए गए, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी तेलंगाना जेल विभाग को विशेष पहचान मिली। इस कार्यक्रम में जेल विभाग के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल एम. संपत भी शामिल हुए।
