विशेष लेख : विश्व पृथ्वी दिवस और भारतीय दर्शन

आज विश्व पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल) है। पाश्चात्य जगत जिसे वह विश्व पृथ्वी दिवस के रूप में मना रहा है। वह “पृथ्वी तत्व” भारतीय दर्शन में पंचमहाभूतों में एक और स्थूलता तत्व है जो सृष्टि के लिए अनिवार्य अवयव है। स्वाभाविक है यदि सृष्टि, संतुलित सृष्टि चाहिए तो इसकी सुरक्षा और संरक्षा की ओर संवेदनशील मानव की दृष्टि जानी ही चाहिए। आज विज्ञान जगत और भारतीय दर्शन दोनों ही प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व का संदेश देते हैं। विज्ञान जहां पृथ्वी को जड़ पदार्थ मानकर अपना चिंतन पश्चात करता है, वहीं भारतीय चिंतन में पृथ्वी को मात्र संसाधन नहीं, चेतन संवेदनशील सत्ता, भाषण प्रधान मातृ सत्ता, पालक, पोषक (भूमि माता) और पृथ्वीवासी को अपना सुह्रद भ्राता रूप, ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के रूप में जनता पहचानता है। यह दार्शनिक दृष्टि पृथ्वी को शोषण के बजाय प्राकृतिक संसाधनों के सम्मानजनक सदुपयोग, त्यागपूर्ण भोग और उसके भरपूर संरक्षण पर जोर देता है।

भारतीय दर्शन में पृथ्वी तत्व:

मुण्डक और कैवल्य दोनों ही उपनिषदों में यह मंत्र आया है- “एतस्माज्जायते प्राणो मन: सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिराप: पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥” अर्थात् इस एकं अद्वितीयम से ही प्राण (जीवन शक्ति), मन, सभी इंद्रियां, आकाश, वायु, तेज (अग्नि), जल और संपूर्ण विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी उत्पन्न होती है। किससे उत्पन्न हुए? “प्राण” तत्त्व से। यही प्राण “हिरण्यगर्भ” है। यही प्रजापति है। दार्शनिक शब्दावली में यही “महत्त्व” है और पौराणिक शब्दावली में यही सृष्टि कर्ता “ब्रह्मा” है। यही सगुण ईश्वर भी है। निर्गुण तत्त्व का सगुण बन जाना उसकी अपनी अंतः शक्ति की क्रिया और उसका प्रस्फुटन है। ब्रह्मा के साथ ब्रह्माणी, शिव के साथ उमा और विष्णु के साथ लक्ष्मी, ईश्वर के साथ माया ही शक्ति है। यह शक्ति त्रिगुणात्मिका है- सत्व, राजस और तमस। इन्हीं गुणों की प्रधानता से व्यक्तित्व सात्विक, राजसिक या तामसिक प्रवृत्ति का हो जाया करता है।

इसी माया या प्रकृति से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, पंच तन्मात्राएं, पंच महाभूत, पंच ज्ञानेंद्रियां, पंच कर्मेंद्रियों की उत्पत्ति हुई और सृष्टि सृजन हुआ, जगत और जागतिक पदार्थ अस्तित्वमान हुए। इस संबंध में भी अनेक मत, मतांतर हैं किंतु यहां वह हमारा अभीष्ट नहीं हैं। हमारा आशय केवल पंचमहाभूतों का क्रम और उसके पूर्व तथा पश्चात पक्षों के बारे में एक छोटी किंतु महत्वपूर्ण जानकारी से हैं। ये पंचमहाभूत क्रमशः सूक्ष्मतम से स्थूलतम के क्रम में आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी हैं। अर्थात् पृथ्वी या भूमि तत्त्व इन महाभूतों में स्थूलतम है। प्रस्तुत काव्य संग्रह में स्थूलतम “भूमि” से सूक्ष्मतम “आकाश” की ओर गति और चिन्तन प्रस्तुत किया गया है। यहां बिना तन्मात्रा का उल्लेख किए मंचमहाभूतों पर चर्चा अधूरी ही रह जाएगी। इन पंचमहाभूत के अपने अपने पांच मूल अंतः तत्व हैं जिसे तन्मात्रा कहा जाता है। प्रत्येक महाभूत की अपनी अपनी एक अलग तन्मात्रा है जैसे “शब्द” (आकाश की), “स्पर्श* (वायु की), “रूप” (अग्नि की), “रस” (जल की), और “गंध” (पृथ्वी की) तन्मात्रा है।

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ये सभी तन्मात्राएं एक समीकरण के रूप में आपस में गुलिमिली हुई हैं। इसका एक विशेष समीकरण/सूत्र है, सिद्धांत है। इस सिद्धांत का नाम है – “पंजीकरण सिद्धांत”। आकाश तत्त्व में (50 फीसदी शब्द और शेष भाग में चारों तन्मात्राएं बराबर बराबर अनुस्यूत हैं, अर्थात 12.5 फीसदी स्पर्श, 12.5 फीसदी रूप, 12.5 फीसदी रस, 12.5 फीसदी गंध) तन्मात्रा है। इसी प्रकार अग्नि तत्त्व में 50 फीसदी रूप और शेष में 12.5 फीसदी के हिसाब से शेष चार तन्मात्राए है। वायु तत्त्व में 50 फीसदी स्पर्श और शेष में 12.5 फीसदी के हिसाब से अन्य तन्मात्राएं। जल तत्त्व में 50 फीसदी रस और 12.5 फीसदी के हिसाब से शेष उपस्थित है। पृथ्वी में 50 फीसदी गंध और शेष भाग में 12.5 फीसदी की दर से शेष तन्ममस्त्राएं उपस्थित हैं। वेदान्त की भाषा – शब्दावली में इस मिलन क्रिया को “पंचीकरण” सिद्धान्त कहा जाता है। बिना पंचीकृत हुए किसी भी नाम रूपमय आकार, वस्तु का सृजन नहीं हो सकता, का सृजन संभव नहीं है। यह है पृथ्वी का आध्यात्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक महत्व।

पृथ्वी दिवस और भारतीय दर्शन के बीच अंतर्संबंध संबंध:

ऊपर की पंक्तियों में संकेत किया जा चुका है कि भारतीय दर्शन में पृथ्वी को पंच महाभूतों में एक और भावनात्मक रूप में माता मन जाता है। तब यह यह संबंध माता और पुत्र के रूप में दर्शन में विकसित होकर एक भावपूर्ण संबंध “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” के सूत्र रूप में उचित स्थान पता है। पूरा पृथ्वी सूक्त ही पृथ्वी के महिमा गान, विचार, चिंतन के लिए भारतीय मनीषा का सतत आह्वान करती है। भारतीय दर्शन में धरती माता (धरित्री) पूजनीय है। इस भूमि सूक्त के अनुसार, पृथ्वी माता है और हम उसके पुत्र हैं। वसुधैव कुटुंबकम (पूरी पृथ्वी एक परिवार है)। यह दर्शन न केवल मनुष्यों बल्कि प्रकृति, पशु-पक्षियों और वनस्पति को भी एक ही परिवार का हिस्सा मानता है।

पंचतत्व का सिद्धांत:

भारतीय दर्शन के अनुसार, यह शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश (पंचमहाभूत) से बना है, इसलिए प्रकृति की रक्षा करना आत्म-रक्षा के समान है। हमने अभी अभी देखा कि है अपने एस्टेट्स के लिए कैसे प्रकृति पर निर्भर है। अतः भारतीय संस्कृति में नदियों, पेड़ों और पर्वतों को पूजनीय मानकर सदियों से संरक्षण किया गया है।

शोषण नहीं संरक्षण:

भारतीय दार्शनिक चिंतन प्राकृतिक संपदा कर ‘उपयोग’ के बजाय ‘संतुलित उपभोग’ की शिक्षा देता है, जो पृथ्वी दिवस का मुख्य उद्देश्य है। यहां इस विंदु पर विज्ञान और दर्शन दोनों की आपसी समझ बूझ और समन्वय से कार्य करना चाहिए। यही समन्वय ही पृथ्वी दिवस की सार्थकता है। यदि यह समन्वय नहीं है, पृथ्वी के संरक्षण की अपेक्षा दोहन अत्यधिक है, तो निश्चित जानिए या विनाश को दावत देना है। है आत्महंता प्रवृत्ति की ओर अग्रसर हैं।

“पृथ्वी दिवस” मनाने का विचार कब आया?

पृथ्वी की उपयोगिता को समझते हुए इसकी संरक्षण की दृष्टि से जन जागरण हेतु यह दिवस सन 1970 से मनाया जा रहा है। इसका मूल उद्देश्य पर्यावरण जागरूकता और संरक्षण को बढ़ावा देना है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण और वनों की कटाई जैसी समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को जागरूक करना है। विज्ञान जहां इसके उपयोग और भोग की बात करता है, वहीं हमारी सनातन संस्कृति इसके साथ भावनात्मक संबंध और अस्तित्व को जोड़कर गहरी वार्ता करती है। इस प्रकार भारतीय दर्शन विज्ञान से कहीं अधिक गहरी और औचित्यपूर्ण युक्ति से इसे समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है। हमारी संस्कृति न केवल पृथ्वी को बचाने का संदेश देता है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि हम प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि उसका एक अंग हैं। है अपने अस्तित्व के लिए पृथ्वी तत्व पर आश्रित है। इस आश्रय प्रदाता का संरक्षण हमारा परम पुनीत कर्त्तव्य है।

डॉ. जयप्रकाश तिवारी
बलिया/लखनऊ, उत्तर प्रदेश
संपर्क : 94533 91020

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