डॉयरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस बने महेश भागवत का ऐसा है व्यक्तित्व और संघर्ष

बहुत से लोग सरकारी प्रशासन में कॅरियर बनाने का सपना देखते हैं। हालांकि, हर कोई उस सपने को इतने पक्के इरादे से पूरा नहीं कर पाते। लेकिन, पाथर्डी (अहिल्यानगर ज़िला-पूर्व नाम अहमदनगर, महाराष्ट्र) एक छोटे से गांव का एक नौजवान, जो हमेशा सूखा पड़ा रहता था, ने यह सपना देखा और उसे साकार करने के लिए कड़ी मेहनत की। यह नौजवान कोई और नहीं, वह है- महेश भागवत, जो हाल ही में तेलंगाना के ‘डॉयरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस’ बने हैं।

कई कैंपेन में हिस्सा लिया

भागवत 1995 बैच के आईपीसी अधिकारी हैं। उन्होंने पाथर्डी गांव में 10वीं तक की पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई पुणे में की। अपनी सेवा काल में अब तक उन्होंने नक्सलियों के खिलाफ कई कैंपेन में हिस्सा लिया है। उन्होंने व्हाइट कॉलर क्राइम को कंट्रोल में लाना, ऑर्गनाइज़्ड ड्रग डीलरों के खिलाफ एक्शन लेना, ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर रोक लगाना, पीड़ितों को सेक्स ट्रैफिकिंग के जाल में फंसने से रोकना, राज्य, देश और विदेश में ट्रैफिकर्स पर केस चलाना जैसे कैंपेन को सफलतापूर्वक किया है। प्रशासन में हिस्सा लेकर लोगों के विकास के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने ‘यूपीएससी’ की परीक्षा दी। उन्होंने अपना काम इस यकीन के साथ शुरू किया कि समाज की कुछ समस्याओं को जड़ से खत्म किया जाये। उन्होंने दो हज़ार से ज़्यादा महिलाओं और लड़कियों को ऑर्गनाइज़्ड ह्यूमन ट्रैफिकिंग के नेटवर्क से बचाया है। कार्यकारी मजिस्ट्रेट की मदद से उन्होंने दो सौ कोठे बंद करवाए हैं। उन्होंने ईंट भट्टों और दूसरी जगहों पर काम करने वाले सात हज़ार से ज़्यादा बाल मज़दूरों और कैज़ुअल मज़दूरों को बचाया है। ओडिशा राज्य में बाल मज़दूरों के लिए उन्होंने जो स्कूल शुरू किया, उससे एक हज़ार छात्रों को फ़ायदा हुआ है।

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किताबों में योगदान

भागवत ने केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा पब्लिश की गई ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर आठ किताबों में अपना योगदान दिया है। उनकी किताब ‘सिनर्जी बिटवीन स्टेकहोल्डर्स’ दिल्ली की ‘इंदिरा गांधी नेशनल यूनिवर्सिटी’ के करिकुलम में शामिल है। उन्होंने ऑस्ट्रिया के वियना में ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस, यूनाइटेड स्टेट्स में ‘इंडियाज़ फाइट अगेंस्ट टेररिज्म’ पर सिंपोजियम और ‘ह्यूमन ट्रैफिकिंग एंड कम्युनिटी पुलिसिंग’ में हिस्सा लिया है। अगर हम भागवत को मिले मेडल्स की लिस्ट देखें, तो भी हम उनके अब तक के कॅरियर के स्कोप का अंदाज़ा लगा सकते हैं। उन्हें प्रेसिडेंट गैलेंट्री मेडल (2004), प्रेसिडेंट पुलिस मेरिटोरियस सर्विस मेडल (2011), प्रेसिडेंट पुलिस स्पेशल सर्विस मेडल (2022), मणिपुर पुलिस स्पेशल ड्यूटी मेडल, आंध्र प्रदेश पुलिस इंटरनल सिक्योरिटी मेडल और यूनियन होम मिनिस्टर कमेंडेशन से सम्मानित किया जा चुका है।

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प्रतियोगी परीक्षा ‘मैराथन रेस’ होती है

वे प्रतियोगी परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों से कहते हैं, “प्रतियोगी परीक्षा एक तरह की ‘मैराथन रेस’ की तरह होती है। आम तौर पर आपको इस परीक्षा के लिए तीन से चार साल तक पढ़ाई करनी पड़ती है। आप में इतना सब्र होना चाहिए।” पिछले दस सालों में हुए प्रतियोगी परीक्षा में, उनसे गाइड हुए 2,300 ऑफिसर नेशनल सर्विस में शामिल हुए हैं। वे कहते हैं कि आप ये परीक्षा क्यों देना चाहते हैं, आप प्रशासन में कॅरियर क्यों बनाना चाहते हैं, इसके पीछे आपका रोल साफ होना चाहिए। बहुत से ऐसे भी हैं जो पैसे, शोहरत, पावर के लालच में इस परीक्षा की तरफ आते हैं। हालांकि, वे हमेशा यह मंत्र दोहराते हैं कि इस परीक्षा के ‘सर्विस’ शब्द को नहीं भूलना चाहिए।

भागवत जोर देकर कहते है

भागवत जोर देकर कहते है, “प्रशासनिक सेवा देश की सेवा करने और समाज में बड़े पैमाने पर अच्छे बदलाव लाने का एक बड़ा ज़रिया है। समाज भी अधिकारियों की तरफ बड़ी उम्मीद से देखता है। हम जिस कुर्सी पर बैठे हैं, जिस पद पर काम कर रहे हैं, उसके साथ हमें न्याय करना चाहिए। हमें ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचना चाहिए और सामाजिक जागरूकता बनाए रखते हुए उनकी मदद करनी चाहिए। आपका काम आपकी पहचान बननी चाहिए। आपको इसके लिए काम करना चाहिए।” (सकाळ से साभार)

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