हिंदी भाषा सेवियों एवं प्रेमियों को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। हिंदी के प्रचार-प्रसार और विकास के लिए भारत सरकार निरंतर प्रयासरत है। साथियों, जरा सोचिए! जब हम हिंदी में कोई लेख लिखते हैं, किसी कठिन शब्द का अर्थ खोजते हैं या अंग्रेजी सामग्री का हिंदी में अनुवाद करते हैं, तो क्या हर बार शब्दकोश के पन्ने पलटने पड़ते हैं? आज डिजिटल तकनीक ने इस कार्य को सरल बना दिया है।
हमारे मोबाइल और कंप्यूटर में उपलब्ध विभिन्न टूल्स एवं एप्स हिंदी के अध्ययन, लेखन, अनुवाद और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हिंदी शब्द ‘सिंधु’ (विशाल ऑनलाइन शब्दकोश) इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय तथा केंद्रीय हिंदी निदेशालय एवं वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, शिक्षा मंत्रालय के संयुक्त प्रयासों से विकसित हिंदी बृहत् शब्दकोश है। इसमें सात लाख से अधिक शब्द संकलित हैं। सामान्य शब्दों के साथ पर्यायवाची, विलोम, मुहावरे तथा विज्ञान – प्रौद्योगिकी के पारिभाषिक शब्द भी इसमें समाहित हैं।

अब आप सोचिए, इतना विशाल डिजिटल शब्द-भंडार विद्यार्थियों, लेखकों, अनुवादकों और सरकारी कर्मचारियों के लिए कितना उपयोगी होगा! इसकी विशेषता केवल शब्दों की संख्या नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों की शब्दावली और भारतीय भाषाओं के बीच शब्द-संपदा का सेतु बनना भी है। हिंदी का विकास केवल नए शब्द गढ़ने से नहीं, बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करने और उनके अर्थ समझने से भी होता है। यही भाषायी आदान-प्रदान हमारी एकता को मजबूत करता है।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय हिंदी के विकास, प्रचार-प्रसार और मानकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। हिंदी की वर्तनी, शब्दकोश निर्माण, हिंदी शिक्षण तथा भाषा संबंधी सामग्री के विकास में इसके प्रयास उल्लेखनीय हैं। डिजिटल युग में मानक शब्दावली और शुद्ध भाषा का महत्व और बढ़ जाता है। इसी प्रकार, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर विज्ञान और अन्य विषयों के लिए हिंदी पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण एवं विकास का कार्य करता है। इससे हिंदी ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की भाषा के रूप में सशक्त बन रही है।
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अब बात करते हैं कंठस्थ की। इसका नाम बदलकर अब भारती-बहुभाषा सारथी कर दिया गया है। इसका उद्देश्य हिंदी और भारत की 15 भाषाओं के बीच सेतु का काम करके क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देना है। सरकारी कार्यालयों में अनुवाद कार्य करने वाले साथी जानते हैं कि एक ही प्रकार के दस्तावेजों का बार-बार अनुवाद करने में समय लगता है। भारती जैसे अनुवाद-सहायक टूल्स पूर्व अनूदित के उपयोग में सहायता करते हैं। इससे अनुवाद कार्य में गति और शब्दावली में एकरूपता आती है। इसी प्रकार, लीला हिंदी शिक्षण प्रणाली के माध्यम से हिंदी प्रबोध, प्रवीण और प्राज्ञ जैसे प्रशिक्षण स्तरों पर हिंदी सीखने की सुविधा उपलब्ध है। इससे गैर-हिंदी भाषी कर्मचारियों और हिंदी सीखने के इच्छुक लोगों को लाभ मिलता है।
वर्तमान में सोशल मीडिया, यूट्यूब, ब्लॉग और डिजिटल पत्रिकाएँ हिंदी के प्रचार-प्रसार के प्रभावी माध्यम बन चुके हैं। हालांकि, तकनीक तभी सार्थक होगी, जब हम उसका उपयोग करेंगे। हमें हिंदी में मौलिक सामग्री तैयार करनी होगी, डिजिटल शब्दकोशों का लाभ उठाना होगा और नई पीढ़ी को हिंदी के तकनीकी संसाधनों से जोड़ना होगा। हमें यह समझना होगा कि हिंदी का भविष्य केवल उसकी साहित्यिक परंपरा में नहीं, बल्कि उसके वैज्ञानिक, तकनीकी और डिजिटल विकास में भी निहित है।
वर्तमान में हिंदी का प्रचार-प्रसार केवल पुस्तकों और समाचार- पत्रों तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया, यूट्यूब, ब्लॉग, पॉडकास्ट और डिजिटल पत्रिकाओं ने हिंदी को नए पाठकों और दर्शकों तक पहुँचाया है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि तकनीक केवल एक साधन है। उसका प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब हम उसका उपयोग करेंगे। हमें हिंदी में मौलिक सामग्री लिखनी होगी, डिजिटल शब्दकोशों का उपयोग करना होगा, तकनीकी विषयों को हिंदी में समझाने का प्रयास करना होगा और नई पीढ़ी को हिंदी के डिजिटल संसाधनों से जोड़ना होगा।
भारत सरकार के हिंदी शब्द सिंधु, भारती, लीला हिंदी शिक्षण प्रणाली तथा केंद्रीय हिंदी निदेशालय और वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग जैसे संस्थानों के प्रयास हिंदी को आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप सशक्त बना रहे हैं। भारत सरकार के इन प्रयासों को सफल बनाने में हम सभी की भागीदारी आवश्यक है। आइए, हम सब मिलकर हिंदी को ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और जनसंचार की प्रभावी भाषा बनाएँ। क्योंकि, हिंदी का विकास तभी सार्थक होगा, जब वह हमारे विचारों की भाषा होने के साथ-साथ हमारे ज्ञान और तकनीकी कार्यों की भाषा भी बनेगी। जय हिंद! जय हिंदी!!

डॉ. बी. बालाजी,
प्रबंधक (हिंदी अनुभाग एवं निगम संचार),
मिधानि, हैदराबाद

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