हैदराबाद : हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने का प्रस्ताव मेरी दृष्टि में भाषायी गौरव से कहीं बड़ा विषय है। यह प्रश्न इस बात का है कि विश्व की सबसे बड़ी बहुपक्षीय संस्था अपनी कार्यप्रणाली में मानवता के कितने बड़े हिस्से की आवाज़ को सहज स्थान देती है।
विडंबना देखिए: जिस संस्था का घोषित उद्देश्य “हम, संयुक्त राष्ट्र के लोग” की ओर से बोलना है, उसकी आधिकारिक भाषाओं में दुनिया की सबसे अधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा को आज तक स्थान नहीं मिला।
हिंदी केवल भारत की भाषा नहीं रही। मॉरीशस, फ़िजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद-टोबैगो, गयाना से लेकर खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका तक फैले प्रवासी समाज में वह जीवित संपर्क-भाषा है। फ़िल्म, संगीत, मीडिया और अब डिजिटल माध्यमों ने उसे वैश्विक उपस्थिति दी है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि संयुक्त राष्ट्र स्वयं इस सच्चाई को स्वीकार करने लगा है। ‘हिंदी@यूएन’ परियोजना के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र के समाचार हिंदी में उपलब्ध हैं, हिंदी में साप्ताहिक रेडियो कार्यक्रम प्रसारित होता है, और महासचिव के संदेश हिंदी में भी जारी होने लगे हैं। जब व्यवहार में हिंदी की उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है, तब उसे औपचारिक मान्यता से वंचित रखना तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता।
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अध्यक्ष महोदय, इस प्रस्ताव के विरुद्ध प्रायः दो आपत्तियाँ उठाई जाती हैं।
पहली आपत्ति व्यय की है। नई आधिकारिक भाषा जोड़ने से अनुवाद, निर्वचन और दस्तावेज़ीकरण का खर्च बढ़ता है। यह चिंता वास्तविक है, पर अनुत्तरित नहीं। इतिहास साक्षी है कि अरबी को आधिकारिक भाषा बनाते समय अरब देशों ने आरंभिक व्यय वहन करने का दायित्व स्वीकार किया था। भारत सरकार भी अनेक अवसरों पर इस आर्थिक भार को उठाने की तत्परता प्रकट कर चुकी है। आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में है; यह संकल्प अब और अधिक विश्वसनीय है।
दूसरी आपत्ति यह है कि इससे भारत की अन्य भाषाओं की उपेक्षा होगी। मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि हिंदी की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा किसी भारतीय भाषा की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि समूचे भारतीय भाषा-परिवार के लिए द्वार खोलने वाली उपलब्धि होगी। जिस दिन विश्व-मंच पर एक भारतीय भाषा को समान आसन मिलेगा, उस दिन यह स्वीकार्यता भी स्थापित होगी कि अंग्रेज़ी के बिना भी गंभीर अंतरराष्ट्रीय विमर्श संभव है। इसका लाभ तमिल, बांग्ला, मराठी, तेलुगु, सभी को मिलेगा।
एक और पहलू है, जिसे मैं इस विशेष रूप से रेखांकित करना चाहूँगा। परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भारत ने विश्वस्तरीय उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। जब हमारे वैज्ञानिक और राजनयिक इन उपलब्धियों को अपनी भाषा में विश्व के सामने रख सकेंगे, तब ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में हिंदी की क्षमता पर उठने वाले संदेह स्वतः निरस्त हो जाएँगे। राजभाषा के रूप में हमारे विभागों में हिंदी का जो वैज्ञानिक और तकनीकी विकास हुआ है, वह इस दावे का ठोस आधार है।
संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान भाषा-व्यवस्था बहुत हद तक बीसवीं सदी के मध्य के शक्ति-संतुलन की उपज है। आज जब ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज़ विश्व-राजनीति में निर्णायक बन रही है, तब बहुपक्षीय संस्थाओं की भाषा-नीति को भी समकालीन यथार्थ के अनुरूप ढलना चाहिए। हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा इसी लोकतांत्रिक सुधार की दिशा में एक स्वाभाविक कदम होगा।
अतः मैं इस प्रस्ताव का पूर्ण समर्थन करता हूँ और अनुशंसा करता हूँ कि भारत सरकार हिंदी-भाषी तथा मित्र देशों के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र महासभा में आवश्यक समर्थन जुटाने का अभियान और तेज़ करे, व्यय-वहन की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करे, तथा ‘हिंदी@यूएन’ जैसी पहलों का विस्तार करे।
