हिंदी साहित्य में निबंध विधा का लेखन अत्यल्प हो रहा है। प्रवीण प्रणव का ललित निबंध ‘कुछ राब्ता है तुमसे’ इस मायने में अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्होंने हिंदी, उर्दू तथा भोजपुरी के अट्ठारह कवियों तथा कथाकारों के जीवन को केंद्र में रखते हुए आलोचनात्मक परिचय दिया है। हिंदी साहित्य में निबंध केवल विचारों की प्रस्तुति नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि, संवेदना और चिंतन का प्रतिबिंब होता है। आधुनिक हिंदी निबंधकारों ने व्यक्तिगत अनुभूतियों और सामाजिक यथार्थ को ललित तथा वैचारिक रूप में अभिव्यक्त किया है। इस परंपरा में प्रवीण प्रणव की निबंध रचना “कुछ राब्ता है तुमसे” विशेष उल्लेखनीय है। शीर्षक में प्रयुक्त ‘राब्ता’ शब्द केवल संपर्क या संबंध का द्योतक नहीं, बल्कि गहरे आत्मीय जुड़ाव की ओर संकेतित है। यह जुड़ाव स्मृतियों, अनुभवों, भावनाओं और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश आदि सभी स्तरों पर अभिव्यक्त किया गया है।
हिंदी साहित्य के समकालीन परिदृश्य में स्मृति-लेखन, संस्मरण और साहित्यकारों पर केंद्रित कृतियाँ पाठकों को न केवल रचनाकारों के जीवन से जोड़ती हैं, बल्कि उनके कृतित्व की गहराई को समझने का अवसर भी देती हैं। पुस्तक मात्र रचनाकारों की जानकारी का संग्रह नहीं, बल्कि एक भावनात्मक सेतु भी है, जो पाठक और साहित्यकारों के बीच “राब्ता” स्थापित करता है।

इस पुस्तक पर विभिन्न साहित्यिक और मीडिया जगत की प्रतिष्ठित हस्तियों ने अपनी प्रतिक्रियाएँ दी हैं। ABP न्यूज़ के संपादक संत प्रसाद राय के अनुसार, यह पुस्तक साहित्यकारों के जीवन की धूप को पाठकों तक पहुँचाने वाली किरणों की तरह है। आँध्रप्रदेश विजयवाड़ा के आई.पी.एस. विश्वजीत ‘सपन’ इसे प्रेरक और रोचक बताते हुए हिंदी साहित्य में रुचि रखने वालों के लिए “अनुपम उपहार” मानते हैं। ‘आज तक’ की एंकर चित्रा त्रिपाठी की दृष्टि में यह कृति साहित्यकारों को “कलम के कोहिनूर” की तरह एक माला में पिरोने का कार्य करती है। ABP न्यूज़ की एंकर रोमाना ईसार खान कहती हैं कि प्रवीण प्रणव की लेखनी इतनी सहज है कि पाठक स्वयं को साहित्यकारों से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। न्यूज़ 18 इंडिया के सीनियर एडिटर अमन चोपड़ा इसे हिंदी साहित्य के पुरोधाओं की जीवन गाथाओं का सजीव दस्तावेज मानते हैं। कुल मिला कर पुस्तक ने आलोचकों और पाठकों दोनों में गहरी पैठ बनाई है और इसे साहित्यिक-सांस्कृतिक धरोहर की तरह देखा जा सकता है।
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पुस्तक का वस्तु-विन्यास अत्यंत सुसंगठित है। प्रत्येक साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रवीण प्रणव ने न केवल तथ्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है, बल्कि उसमें आत्मीय संवेदनाएँ भी जोड़ी हैं। लेखकों की रचनाओं को पढ़ने के दौरान पाठकों में लेखकीय सफ़र के प्रति जिज्ञासा सहज होती है। निबंध के कुछ अध्याय पर चर्चा करते हुए पाठक की जिज्ञासा को उद्दीप्त करने की कोशिश करुँगी। चंद्रधर शर्मा गुलेरी के कवि व्यक्तित्व से किंचित कम परिचित पाठक समाज को उनके काव्य गुणों से परिचित कराया गया है। ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित ‘सोऽहम्’ कविता की ये पंक्तियाँ तद्युगीन परिवेश पर करारा व्यंग्य करती हैं-
‘हमें जाति की जरा न चाह,
नहीं देश की भी परवाह।
हो जावे सब भले तबाह,
हम जावेंगे अपनी राह।’ (‘कुछ राब्ता है तुमसे’, पृष्ठ-20)
उनके लेखन में सहजता, प्रवाह और आत्मीयता है। कहीं भी दुरूहता नहीं दिखती। गुलेरी की सोच अपने समय से बहुत आगे की थी, उनके राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि से संबंधित विचारों का जब पाठक को पता चलता है, तो वे आश्चर्य से भर उठते हैं। लेखक गुलेरी की रचनाओं को ढूँढ-ढूँढ कर प्रस्तुत करते हैं। बहुत कम लिखकर बहुत अधिक प्रसिद्ध हुए गुलेरी के व्यंग्य के उदाहरण इन पंक्तियों में दृष्टव्य है- जहाँ बारातियों के भोजन के समय गाँव की औरतें गाली नहीं गाती हैं, तो पात्र के पूछने पर उसे गाँव का वृद्ध कहता है-
‘हाँ साहब, तरक्की हो रही है। पहले गालियों में कहा जाता था फलाने की फलानी के साथ, अमुक की अमुक के साथ। लोग-लुगाई सुनते थे, हँसते थे। अब घर-घर वे ही बातें सच्ची हो रही हैं।’ (पृष्ठ-27)
‘अधरतिया की आवाज: भिखारी ठाकुर’ को शायद भोजपुरी समाज भी इतने अच्छे से न जानता होगा। लेखक के द्वारा भिखारी ठाकुर के संदर्भ में बड़ी पड़ताल के साथ जानकारी साझा की गई है। पेशे से नाई रहे भिखारी ठाकुर के मन में रामलीला और संतों के प्रवचन का इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि उन्होंने ‘बिदेसिया’ जैसे प्रसिद्ध नाटक का प्रणयन करते हुए तद्युगीन सामाजिक सोच को प्रभावी प्रस्तुति दी है। वे अधिक पढ़े-लिखे न थे, किंतु जन सामान्य की भाषा में विवाहेतर संबंध तथा संबंधों की मिठास को इस नाटक में प्रस्तुत किया है। ‘गबरघिचोर’ नाटक में तो इससे भी 10 कदम आगे का विषय प्रस्तुत किया गया है। बेरोजगार युवक गलीज का अपनी नवव्याहता पत्नी को छोड़कर शहर जाना और उसकी पत्नी का गाँव के ही युवक से अवैध संबंध के फलस्वरूप गबरघिचोर का जन्म होना, गलीज और गड़बड़ी के द्वंद में पंचायत बैठना तथा गबरघिचोर पर उसकी माँ का अधिकार माना जाना आदि आज के खुले समाज के सामने प्रश्न चिन्ह खड़ा करते हैं। लेखक ने भिखारी ठाकुर के विविध लेखककीय आयाम को टटोलते हुए उनके विशाल व्यक्तित्व को प्रस्तुत किया है। वे लिखते हैं-
‘अधरतिया की आवाज आज और मजबूती के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है, बस आवश्यकता है कि हम अपने धरोहर को संभाले रहे, और भिखारी ठाकुर की सभी कृतियां इस धरोहर की अमूल्य निधि है।’ (पृष्ठ-42)
‘किसको आती है मसीहाई किसे आवाज दूँ: जोश मलीहाबादी’ में लेखक ने मलिहाबादी के जीवन के उन पहलुओं पर प्रकाश डाला है जब वे अपने नज़्म लिखने के कारण हैदराबाद के निजाम के द्वारा शहर से निष्कासित कर दिए गए थे। अपने बगावती लेखन और शायरियों के लिए प्रसिद्ध जोश को ‘शायर-ए- इंकलाब’ कहा जाने लगा। जोश के अक्खड़ स्वभाव को उनके कलम में देखा जा सकता है। जोश की पंडित नेहरू से मित्रता थी। मौलाना आजाद से मिलने गए जोश जब काफी देर बाद भी उनसे न मिल पाए तो- ‘नामुनासिब है खून खौलाना/ फिर किसी और वक्त मौलाना’ लिखकर कागज का टुकड़ा आजाद को भेज कर वहाँ से निकल गए। अपनी बेगम से डरने वाले किंतु माशूका से बेइंतहा मोहब्बत करने वाले, जोश के बहुआयामी व्यक्तित्व को लेखक ने बड़े ही चुटीले अंदाज में प्रस्तुत किया है। वे लिखते हैं-
‘एक जमींदार, एक बगावती तेवर का शायर, एक ऐसा शख्स जिसके तालुकात प्रधानमंत्री से थे, फिर भी जोश ने अपनी जिंदगी में क्या नहीं देखा।’ (पृष्ठ-56)
‘देश प्रेम के रंग में रंगी मर्दानी: सुभद्रा कुमारी चौहान’ निबंध में सुभद्रा के समर्पण को लेखक ने बड़ी तन्मयता पूर्वक व्यक्त किया है। उनकी प्रेम, बिरह, वात्सल्य तथा राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत रचनाओं को सोदाहरण प्रस्तुत किया है। सुभद्रा अपने देशप्रेम पूर्ण कविताओं के लिए इतनी प्रसिद्ध थी, कि सुभाषचंद्र बोस उन्हें उनकी कविताओ के माध्यम से पहले ही जानते थे। जब वे अपने पति से मिलने जेल गई, तो वहाँ सुभाष चंद्र बोस से भी मिलने पहुँची। सुभद्रा के सादगीपूर्ण जीवन का उदाहरण देते हुए वे लिखते हैं-
‘एक बार गाँधी जी से मुलाकात में गाँधी जी ने उनसे पूछा कि क्या उनका विवाह हो गया है ? सुभद्रा जी ने उन्हें अपने पति लक्ष्मण जी से मिलवाया। गाँधी जी ने सुभद्रा को बड़े प्यार से डांटते हुए कहा, ‘तुम्हारे माथे पर सिंदूर क्यों नहीं है और तुमने चूड़ियां क्यों नहीं पहनी? जाओ, कल किनारे वाली साड़ी पहन कर आना।’ (पृष्ठ-65)
सुभद्रा का व्यक्तित्व इतना उदात्त था कि वे मुर्गियों की प्राण रक्षा में अपनी गाड़ी को दुर्घटनाग्रस्त करवा बैठी, जिसके कारण उनकी मृत्यु हुई। लेखक ने उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के सूक्ष्मतम आयाम को उदाहरण सहित प्रस्तुत किए हैं।
‘आपकी याद आती रही रात भर: मख़दूम मुहिउद्दीन’ में मख़दूम के विद्रोही, देशभक्त, रूमानी व्यक्तित्व का चित्रण किया गया है मख़दूम के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। लेकिन लेखक की शोधपरक दृष्टि ने उनसे जुड़ी सूक्ष्मतम जानकारी प्राप्त करते हुए पाठक तक पहुँचाई है। उनकी शायरी में विद्रोह, देशभक्ति, रोमानियत तथा अकेलेपन को बड़ी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। मख़दूम अपने से भी अधिक दूसरों की तारीफ किया करते थे। साहित्यिक गलियारे में अपनी जिंदादिली के लिए जाने जाते थे।
छायावादी कवयित्री महादेवी के साहित्यिक रूप धारण की कड़ियों को लेखक ने बड़ी रोचकता के साथ प्रस्तुत किया है। ‘धार्मिक माँ और धर्म परायण पंडित जी से काव्य भाषा सीखने हुए भी महादेवी का अपना दर्शन भी विकसित हो रहा था।’ (पृष्ठ-97)
आरंभ में महादेवी का रुझान बौद्ध भिक्षुणी बनने की ओर था, लेकिन गाँधी जी की प्रेरणा से आजीवन समाज सेवा कार्यों से जुड़ी रहीं। उत्तर प्रदेश के विधान परिषद के सदस्य के रूप में जब महादेवी बोलती थीं, तो सुनने वाले भी मुग्ध होकर सुनते थे। वे भारतीय मूल्यहीन शिक्षा प्रणाली से सदैव विक्षुब्ध रहती थीं। लेखक ने महादेवी के माध्यम से भारतीय मातृ सत्तात्मक परंपरा को उद्धृत करते हुए भारतीय सामाजिक व्यवस्था की समानता का उल्लेख किया है।
एक अत्यंत साधारण परिवार में जन्मे फैज़ अहमद फैज़ ने ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ से जुड़कर उर्दू साहित्यिक मासिक ‘अदब-ए-लतीफ’ का संपादन किया। लंदन के ऑक्सफोर्ड से उन्होंने एचडी की पढ़ाई की। फैज़ के विस्तृत वैवाहिक पृष्ठभूमि को लेखक ने प्रस्तुत करते हुए पाठक को आश्चर्य मिश्रित हर्ष की अनुभूति कराई है। फैज़ अपनी साहित्यिक सक्रियता में एशियाई और अफ्रीकी साहित्यकार संगठन से जुड़े थे, उनकी गोष्ठियों में भाग लेते थे। फैज़ हमेशा कमजोर का साथ देने की वकालत करते थे।
‘प्रतिबद्ध हूँ, संबद्ध हूँ, आबद्ध हूँ: नागार्जुन’ शीर्षक में ठक्कन उर्फ़ नागार्जुन बाबा हिंदी, संस्कृत, मैथिली, पालि, सिंहली तथा अंग्रेजी आदि भाषा साहित्य के मर्मज्ञ थे। बौद्ध तथा साम्यवाद आदि राह अपनाते हुए हिंदी साहित्य के यायावर रहे ठक्कन बाबा के लेखकीय सफ़र को निबंधकार प्रवीण ने बड़े मनोयोग से चित्रित किया है। लेखक ने गोपाल सिंह नेपाली, कैफ़ी आज़मी, रेणु, साहिर लुधियानवी, गोपाल दास नीरज, दुष्यंत, केदारनाथ सिंह, धूमिल, अदम गोंडवी, परवीन शाकिर प्रभृति कलमकारों पर जो कुछ लिख दिया वह हिंदी निबंध के साहित्य भंडार की अमूल्य निधि के रूप में सदा के लिए संरक्षित किया जा सकेगा।
लेखक द्वारा साहित्यकारों को “धूप की किरण”, “कोहिनूर”, और “जीवन की रोशनी” जैसे रूपकों से उपमित किया गया है। इस निबंध संग्रह का हर अध्याय केवल परिचयात्मक न होकर साहित्यकारों के जीवन-संघर्ष और रचनात्मकता की झलक देता है। लेखक ने किसी साहित्यकार को महिमामंडित करने के बजाय उनके वास्तविक जीवन-संघर्ष और साहित्यिक योगदान को सामने रखा है।
हिंदी निबंध साहित्य में “कुछ राब्ता है तुमसे” को ललित निबंध और संस्मरण-परक लेखन की परंपरा में देखा जा सकता है। जहाँ रामचंद्र शुक्ल, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी या अज्ञेय जैसे लेखकों ने निबंध साहित्य को गंभीर वैचारिकता दी, वहीं प्रवीण प्रणव ने उसे भावनात्मक आत्मीयता और सहज कथात्मकता प्रदान की है। यह कृति एक ओर साहित्यकारों की जीवनी को प्रस्तुत करती है, तो दूसरी ओर पाठक को उनकी रचनाओं के मूल स्वर से परिचित कराती है। इस दृष्टि से यह पुस्तक निबंध और संस्मरण परंपरा के बीच की कड़ी सिद्ध होती है।
आज का पाठक केवल साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ना ही नहीं चाहता, बल्कि उनके व्यक्तित्व, संघर्ष और मानवीय पक्ष को भी जानना चाहता है। डिजिटल युग में जहाँ सूचनाओं का अंबार लगा हुआ है, वहाँ इस तरह की पुस्तकें संदर्भ सामग्री के साथ-साथ पाठक को संवेदनात्मक जुड़ाव भी देती हैं।
प्रवीण प्रणव की कृति नई पीढ़ी को यह संदेश देती है कि साहित्यकार केवल शब्दों के सर्जक नहीं होते, बल्कि अपने समय और समाज के दर्पण भी होते हैं। इसलिए यह पुस्तक न केवल साहित्यिक महत्व रखती है, बल्कि सांस्कृतिक अध्ययन और अकादमिक शोध के लिए ज्ञानभूमि भी प्रदान करती है।
“कुछ राब्ता है तुमसे” हिंदी साहित्य के उन साहित्यकारों से संवाद स्थापित करने का प्रयास है, जिन्होंने अपने समय और समाज को शब्द दिए। प्रवीण प्रणव ने जिन अठारह साहित्यकारों के जीवन और कृतित्व को प्रस्तुत किया है, वे सभी हिंदी साहित्य की विविध धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस निबंध का मूल उद्देश्य मानवीय संबंधों और जीवन के आत्मीय जुड़ाव की अनिवार्यता को रेखांकित करना है। व्यक्तिगत स्तर पर, यह निबंध आत्मीय भावनाओं का दस्तावेज़ है। सामाजिक स्तर पर, यह आधुनिक युग में बिखरते रिश्तों और टूटते मानवीय संवाद को जीवित रखती है। जबकि साहित्यिक स्तर पर, यह हिंदी ललित निबंध की परंपरा में भाव और विचार की नवीन संभावनाओं की ओर इंगित करता है।
इस निबंध को आत्मीय संवाद शैली में ‘तुम’ संबोधन के माध्यम से सीधे संवाद स्थापित करते हुए प्रस्तुत किया गया हैं। विषय-विन्यास क्रमशः व्यक्तिगत अनुभूति से सामाजिक यथार्थ की ओर बढ़ता है। निबंध की भाषा सरल, प्रवाहमयी और भावनात्मक है। शैली संवादात्मक है, जिससे पाठक प्रत्यक्ष सहभागी बन जाता है। कई अंश काव्यात्मक हैं, जिनमें लय और संगीत का स्पर्श है। निबंध में स्मृति को “समय की तहों में दबे सिक्के” तथा संबंधों को “जीवन की ऊर्जा का अदृश्य धागा” कहकर प्रतीकात्मक स्वरूप प्रदान किया गया है।
हिंदी निबंध साहित्य में दो प्रवृत्तियाँ प्रमुख रही हैं- वैचारिक और ललित। हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय और नंददुलारे वाजपेयी ने निबंध को गहन चिंतन का माध्यम बनाया, वहीं महादेवी वर्मा, प्रभाकर माचवे और हरिशंकर परसाई ने इसे भावात्मक व सामाजिक आलोचना का माध्यम माना। प्रवीण प्रणव का “कुछ राब्ता है तुमसे” इन दोनों प्रवृत्तियों के समन्वय का उदाहरण है। इसमें भावात्मक लालित्य भी है और सामाजिक चेतना भी। इसलिए यह रचना हिंदी ललित निबंध की आधुनिक कड़ी के रूप में देखी जा सकती है।
आज का समाज तकनीकी क्रांति, उपभोक्तावादी दृष्टि और आत्मकेंद्रित जीवनशैली से ग्रस्त है। पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ते लगातार शिथिल हो रहे हैं। ऐसे समय में “कुछ राब्ता है तुमसे” पाठक का ध्यान जीवन के सौंदर्य और संतुलन को मानवीय जुड़ाव की ओर खींचता है। लेखक आधुनिक युग की विडंबना पर प्रकाश डालते हुए संकेत करते हैं कि यदि यह ‘राब्ता’ टूट गया तो मनुष्य केवल मशीन बनकर रह जाएगा। इस दृष्टि से यह निबंध समकालीन जीवन की गंभीर आलोचना भी है। निबंध आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। पाठक अपने जीवन के भूले-बिसरे राब्तों की ओर लौटता है और सोचने लगता है कि किस तरह तकनीक और व्यस्तता ने उसके भावनात्मक रिश्तों को प्रभावित किया है। यह प्रभाव केवल भावुक कर देने वाला नहीं, बल्कि चेतनापरक है।
इस प्रकार, “कुछ राब्ता है तुमसे” हिंदी साहित्य की परंपरा को जीवित रखने और नई पीढ़ी को उससे जोड़ने वाली एक मूल्यवान कृति है, जो आलोचना और प्रशंसा दोनों दृष्टियों से साहित्यिक उपलब्धि कही जा सकती है। समीक्षात्मक दृष्टि से यह निबंध हिंदी ललित निबंध परंपरा को समृद्ध करता है तथा समकालीन जीवन के लिए एक मूल्यवान संदेश प्रस्तुत करता है। इसे आधुनिक हिंदी निबंध साहित्य की सशक्त उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है।

