पुस्तक समीक्षा : ग़ज़ल प्रेम और संगीत के लिए लिए अनवरत तपस्या का जीवंत दस्तावेज़ है- ‘उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन’

ग़ज़ल के कहन की विविधता से भला कौन अनजान होगा। यह तो कोमल मन को सहजता से छूकर ज़ेहन में उतरने में दक्ष होती हैं और उस पर मखमली मुलायमियत लिए श्री हरिहरन जी की रूहानी आवाज़ हो तो कमाल होना तो बनता ही है।

हम बात कर रहे हैं सर्व भाषा ट्रस्ट से प्रकाशित कहकशां फाउंडेशन के अध्यक्ष आनन्द कक्कड़ द्वारा लिखित साहित्य आज तक के मंच पर स्वयं हरिहरन के हाथों विमोचित पुस्तक ‘उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन’ की। उनके पचास वर्षों के अद्भुत योगदान को इस पुस्तक के ग्यारह अध्याय के अन्तर्गत समाहित किया गया है जो ग़ज़ल के विभिन्न घरानों से गुज़रते हुए हरिहरन घराने पर आकर रुकती है, जिसमें हरिहरन के आरंभिक जीवन व उनके ग़ज़ल के प्रति अतिरिक्त रुझान के राज़ खोलती है और ताज्जुब की बात तो यह है कि आज इन ऊँचाइयों पर पहुँच कर भी वे विद्यार्थी समान सतत प्रयत्नशील रहते हैं शायद यही उनकी सफलता का राज़ भी है और वह बड़ी ही सादगी से इसका श्रेय अपने तीनों गुरुओं, माँ श्रीमती अलामेलु, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान साहब एवं रूहानी गुरु जनाब मेंहदी हसन साहब को देते नहीं थकते हैं जो उन्हें और भी अनूठा बनाती है।

जिस तरह से उन्होंने अपने गीतों व ग़ज़लों के माध्यम से संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया है उन्हें सांस्कृतिक राजदूत कहना पूर्णतया न्यायोचित है। जहाँ एक ओर पूरे विश्व में क्षेत्रवाद की लहर चरम पर है वहीं वह दिलों को जोड़ने की बात करते हैं। इतना ही नहीं उनके गायन की तकनीकी विविधता ने हमेशा से जेनरेशन गैप को भी कम किया है। शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी ज़ुबान पर “काय झाला” न चढ़ा हो।

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एक ओर मेंहदी हसन साहब की तर्ज़ पर बेमिसाल ग़ज़ल गायिकी तो दूसरी ओर कोलोनियल कजिंस,जैज़ और उर्दू ब्लूज और इस तरह से हर वर्ग हर क्षेत्र के लोगों को एक छत के नीचे लाने में सक्षम है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ हरिहरन ही कर सकते हैं। यहाँ तक कि स्वयं की गायन शैली में निरंतर बदलाव करते हुए जिस प्रकार पिछले पाँच दशकों से सतत क्रियाशील हैं वह एक पद्मश्री नहीं बल्कि अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित होने योग्य हैं!

इस किताब की उपयोगिता की बात करें तो जावेद अख़्तर साहब ने कहा है कि ‘इस किताब की जो सबसे बड़ी अहमियत है, वह यह है कि आनन्द कक्कड़ ने इसमें हरिहरन की उन बातों को समेट कर बताया है जो 50 सालों से बिखरी हुई थीं।’ आगे यह भी कहा कि उन्हें यक़ीन है कि इसे पढ़ते हुए पाठकों को हरिहरन का असली योगदान समझ में आएगा। उनकी बात से सौ फ़ीसदी ताल्लुक़ रखते हुए मुझे भी यह लगता है कि यह किताब करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगी और परिस्थितियों को अपनी मेहनत के बल पर बदलने वाले हरिहरन एक सच्चे आदर्श के रूप में उभर कर सामने आएँगे।

सरोद सम्राट अमजद अली खान ने हरिहरन की संगीत सेवा को देखते हुए जिन तीन उपाधियों से नवाज़ा उनमें एक उस्ताद हरिहरन था तो उनके कहे का अमल करते हुए पुस्तक का नाम, “उस्ताद -ए-ग़ज़ल हरिहरन” रखा गया। हरिहरन साहब की एकदम साफ़ तलफ़्फ़ुज़ उर्दू ज़बान पर उन्होंने यह भी कहा कि “एक दक्षिण भारतीय होते हुए कोई ग़ज़ल गाए और उर्दू से डील करे यह अपने आप में बहुत बड़ा करिश्मा है, खुदा की देन है और एक बड़ी कामयाबी है।”

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इसके विभिन्न अध्यायों में हरिहरन साहब के गुरु, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान साहब के कुशल प्रशिक्षण, उनकी सलाहियत पर उर्दू ज़बान सीखने इत्यादि की जानकारी मिलती है। हरिहरन साहब के निरंतर रियाज़ एवं ग़ज़लों के कंपोज़िशन पर अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप विश्वस्तरीय सफलताओं का ज़िक्र बेहद सुखद प्रतीत होता है। आगे लेखक एक श्रोता के तौर पर जब उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन के साथ संवाद कर उनके जीवन के अनुभवों को कलमबद्ध करते हैं तो उनसे गुज़रते हुए पाठकों की जिज्ञासा शांत होती है।

पुस्तक में हरिहरन के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों एवं उपलब्धियों का उल्लेख किया गया है तथा गायिकी के सफ़र के प्रतिनिधि साथियों का उनके प्रति उद्गार भी प्रस्तुत किया है जो हरिहरन के सम्पूर्ण व्यक्तित्व व कृतित्व के रेशे-रेशे से परिचित कराते हैं। अध्याय ‘रूबरू’ के दौरान रचयिता के प्रश्न यूँ प्रतीत होते हैं जैसे लंका पार करने के पूर्व हनुमान जी को उनकी शक्तियां याद दिलाई गईं हों जो इस बात का द्योतक है कि कुछ और बेहतरीन ग़ज़ल अल्बम अवश्यंभावी हैं और वे भी हमेशा की तरह कुछ नये प्रयोगों के साथ प्रस्तुत होंगी।

पुस्तक की एक विशेषता यह भी है कि इसे आज की पीढ़ी को मद्देनज़र रखते हुए लिखा गया है ताकि वह ग़ज़ल की गहराइयों में उतर सकें उन्हें महसूस कर सकें और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतार सकें। किताब शुरुआत से लेकर आख़िर तक बेहद रुचिकर बन पड़ी है जिसे पढ़ते हुए जाने-अनजाने हरिहरन के मधुर स्वर में गाई ग़ज़लें ज़ेहन में उतर आती हैं जो किताब पढ़ने की प्रक्रिया को सुर देती महसूस होती हैं और आख़िरी अध्याय में पचास सुपरहिट ग़ज़लों से गुज़रना बोनस साबित होता है।

अंत में यह किताब न केवल पठनीय है बल्कि संग्रहणीय भी है। मैं तो यह कहूँगी कि यह पुस्तक एक अनोखी अभिव्यक्ति है जो एक लीजेंड को एक प्रशंसक की ओर से भेंट किया गया फूलों का गुलदस्ता है जिसकी ख़ुशबू कभी कम न होगी। आखिर में ‘उस्ताद-ए-ग़ज़ल-हरिहरन’ पुस्तक हरिहरन जी के ग़ज़ल प्रेम और संगीत के लिए लिए अनवरत तपस्या का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ है जो आज के श्रोताओं को आपका समग्र परिचय है। मौलिक ग़ज़ल कंपोजर और गायक के रूप में हरिहरन के लिए उन्हीं की ग़ज़ल का एक मतला समर्पित है:-

वो सर फिरी हवा थी सँभलना पड़ा मुझे
मैं आखिरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे।

पुस्तक का नाम : उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन
लेखक का नाम : आनन्द कक्कड़
प्रकाशक : सर्व भाषा ट्रस्ट
प्रकाशन वर्ष : 2026
कुल पृष्ठ 288
मूल्य 599/-

समीक्षक : आर्या झा
लेखिका, आलोचक एवं कवयित्री
Mobile number – 9398836296

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