आर्य समाज जगत में ऐसा कौन सा व्यक्ति/पाठक होगा जो प्रोफेसर राजेन्द्र जिज्ञासु जी को न जानता हो और उनकी लिखी पुस्तकों को न पढ़ा हो। लगभग चार सौ पुस्तकों के लेखक, अनुवादक व संपादक राजेन्द्र जिज्ञासु जी का जन्म 28 मई 1931 को एक छोटे से ग्राम – मालोमहे, जिला – सियालकोट, पश्चिमी पंजाब में हुआ। आपके पिता जीवनमल ग्राम के प्रथम आर्यसमाजी थे। देश, धर्म और सेवा के संस्कार, विचार आपने पिताजी से प्राप्त किया। पंडित लेखराम जी के जीवन व बलिदान से प्रभावित होकर एक सिद्धहस्त लेखक व गवेषक बनने की ललक उनके मन में जागी।
आप पिछले 75 वर्षों से अधिक निरन्तर धर्म रक्षा के लिए एवं आर्यों के बलिदानियों, हुतात्माओं, त्यागी व तपस्वियों का इतिहास लिखा है। उसे लिखकर आर्यों के गौरवशाली इतिहास की रक्षा की है। आप आर्य समाज की प्रगति व उत्थान के लिए दिन रात लगे रहते हैं। इस उम्र में भी एक साथ कई परियोजनाओं पर कार्यरत रहते हैं। ईश्वर की असीम कृपा से जीवन के 95 वर्ष में आपकी स्मरण शक्ति बहुत अच्छी है और स्वास्थ्य भी अच्छा है। आप प्रतिदिन लगातार 8 से 10 घंटे तक लेखन कार्य में व्यस्त रहते है। आप लेखनी के साथ दिनचर्या में स्वाध्याय, प्राणायाम एवं सूक्ष्म व्यायाम होता है। आपका भोजन बिल्कुल सात्विक एवं सीमित होता है। जिज्ञासु जी के पास अपना विशाल निजी पुस्तकालय है। कई प्राचीन काल के ग्रंथ, पत्र – पत्रिकाएं, पेपर कटिंग आदि का विशाल संग्रह इनको अपनी लेखनी में बहुत ही स्पष्ट और निर्भीक होकर लिखने में मदद करते हैं और प्रमाणिकता भी बढ़ जाती है।
मुझे और मेरे परिवार को सौभाग्य प्राप्त हुआ कि पंडित प्रियदत्त शास्त्री जी के द्वारा आदेश मिलने पर आदरणीय राजेन्द्र जिज्ञासु जी को मन्नानूर में जहां आर्य समाज के युवा नेता पंडित नरेंद्र जी को निजाम शासन ने जेल में रखा था, उस स्थान को देखकर आना है। हैदराबाद से मन्नानूर लगभग 160 किमी दूरी पर है और लगभग चार घंटे प्रवास में लगते है। राजेंद्र जिज्ञासु जी की सेवार्थ हैदराबाद से मन्नानूर जाने आने का और उनके द्वारा साक्ष संग्रह, बारीकी से हर कोने में देखने, समझने का अवसर मिला। साथ ही एक प्रसिद्ध इतिहासकार के संग हमें यात्रा में बहुत कुछ सीखने, समझने, चर्चा व संवाद करने में बहुत प्रसन्नता हुई। आपकी ही कृपा से मुझे इतिहास के प्रति रुचि/लालसा/जागरूकता बढ़ी और समाज के उत्थान हो या पतन में इतिहास की महत्वपूर्ण भूमिका का ज्ञान हुआ।
हमें इस यात्रा का यह लाभ हुआ कि परिजन और पिताजी के शुभचिंतकों ने सुझाव दिया कि क्रांतिवीर पंडित गंगाराम वानप्रस्थी जी की जीवनी पर किताब लिखी जाए। सुझाव में दम था। हालांकि समझ में नहीं आया कि यह कार्य कैसे और किसके हाथों से किया जाये। इस सोच में कुछ समय बीत गया। एक बार पंडित प्रियदत्त शास्त्री जी ने सुझाव दिया कि आर्य जगत में एक जुझारू इतिहासकार राजेन्द्र जिज्ञासु जी हैं जो इस कार्य को कर सकते हैं। जिज्ञासु जी को फोन करके हमारे निर्णय की सूचना दी गई। तब जिज्ञासु जी अन्य लेखन कार्य में व्यस्त थे। फिर भी तुरंत स्वीकृति प्रदान करके हमारा सम्मान किया और सामग्री भेजने का सुझाव दिया। हमने सामग्री सौंप दी।
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सामग्री को देखकर भावुक हो गये और कहने लगे कि आपने मुझे जीवन की सांझ में देश व समाज हित में जलने वाले एक क्रांतिकारी की खोज पूर्ण प्रेरणाप्रद जीवनी लिखने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने आगे कहा- “अगर मैं ‘जीवन संग्राम क्रांतिवीर पंडित गंगाराम वानप्रस्थी’ नहीं लिखता तो मुझे और आर्य समाज को कलंक लग जाता।” यह सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हुए। जिज्ञासु जी यह भी बताया कि कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि सर्वव्यापक और सर्वज्ञ परमात्मा ने परोपकारी मुझे बलिदानी महापुरुषों की जीवनी लिखने के लिये ही जन्म दिया है। मैं विश्व नियंता सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ प्रभु से निरंतर यही प्रार्थना किया करता हूं कि जीवन के अन्तिम श्वास तक यह लेखनी चलती रहे।
गौरतलब है कि जिज्ञासु जी हैदराबाद स्टेट में ही नहीं, बल्कि भारत वर्ष में कोई आर्य सम्मेलन हो तो तेज तर्रार वक्ता के रूप में इन्हें आमंत्रित किया जाता था। आर्य समाज के सेवक और आर्य समाज के इतिहास पर बोलने के लिए प्रसिद्धि प्राप्त की हैं। उनकी युवावस्था में जब सोलापुर (महाराष्ट्र) कॉलेज में कार्यरत थे तब से ही वे अपने प्रभावशाली भाषणों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते थे। आप कई पत्र पत्रिकाओं में भी लेख निरंतर भेजते रहते हैं। आपके लेखमाला “तड़प झड़प” परोपकारी में वर्षों तक आते रहे हैं। आर्यसमाज के बड़े-बड़े धुरंधर नेताओं, महापुरुषों व संन्यासियों के साथ आपका बहुत ही मधुर संबंध रहा है। इनमें- पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय, स्वामी सत्य प्रकाश, स्वामी स्वतंत्रता नंद, महात्मा नारायण स्वामी, स्वामी सर्वानंद, ओमप्रकाश त्यागी, हरिश्चंद्र गुरुजी (स्वामी श्रद्धानंद), शेषराव वाघमारे, आचार्य धर्मवीर, पंडित नरेंद्र, डॉ विजयवीर विद्यालंकार, आचार्य उमाकान्त उपाध्याय, पंडित गंगाराम वानप्रस्थी आदि शामिल हैं।
मैं प्रभु से प्रार्थना है कि आपको स्वस्थ रखें और लेखन की शक्ति दे और अपने विचारों का प्रकाश जन-जन तक पहुंचाते रहे। आर्य जगत आपको इस महान कार्य के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद करता है।
लेखक : भक्त राम
अध्यक्ष स्वतंत्रता सेनानी पंडित गंगाराम स्मारक मंच
संपर्क : 83328 81215
