आज की वर्तमान परिस्थिति में इस बात को समझना बहुत आवश्यक है कि ‘लोकतंत्र’ तब सार्थक होगा जब ‘लोक’ अपने अधिकारों के लिए जागेगा, प्रश्न करेगा और अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करेगा। ध्यान रहें अधिकारों के लिए जागना और देश के प्रधान को या देश को भद्दी गाली देना दो अलग कार्य है। अनुशासन और चेतना दोनों लोकतन्त्र के प्राणतत्व हैं, इनके बिना लोकतंत्र में तंत्र तो रहेगा, चुनाव भी होंगे, सरकारें भी बदलेंगी, लेकिन ‘लोक’ अपने ही लोकतंत्र में अनुपस्थित बना रहेगा।
जैसा कि आज दिखाई दे रहा है उस लोकतंत्र में ‘लोक’ गायब है। यह स्थिति 1947 से ही दिखाई देती है। विडंबना यह है कि इस ओर न तो ‘तंत्र’ का ध्यान जाता है और न ही स्वयं ‘लोक’ का। लोकतंत्र में लोक की भूमिका केवल पाँच वर्ष में एक बार मतदान करने तक सीमित नहीं हो सकती। उसकी वास्तविक भूमिका सत्ता से प्रश्न पूछने, अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने और अपनी आवश्यकताओं की माँग करने में निहित है। कोरोना काल में हमने इसी ‘लोक’ का एक अलग रूप देखा था। स्नान-दान से लेकर खानपान तक, पूजा-पाठ से लेकर सामाजिक व्यवहार तक, प्रत्येक स्तर पर लोक सचेत दिखाई दिया। किंतु यही चेतना चुनाव के समय कहाँ चली जाती है? दशहरा के बाद दीपावली की खरीदारी, फिर छठ, क्रिसमस और नववर्ष की तैयारियों में व्यस्त ‘लोक’ को क्या वास्तव में ‘लोकतन्त्र’ की रक्षा की चिंता है?
दु:खद बात है ‘लोक’ हमेशा से ‘तंत्र लुभावन’ बातों के जाल में फँसता रहा है। यदि 1947 में ‘लोक’ वास्तव में जागरूक नागरिक के रूप में सामने आया होता, तो वह स्वतंत्रता के साथ ही ‘तंत्र’ से अपनी भाषा में शिक्षा माँगता, स्वास्थ्य माँगता, आवास हेतु धरती माँगता और साँस लेने के लिए वृक्षारोपण की माँग करता। वह पूछता कि स्वतंत्रता का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कब पहुँचेगा? किंतु उस समय भी धर्म के नाम पर धरती का विभाजन स्वीकार कर लिया गया था। ‘लोक’ अपने वास्तविक प्रश्नों से भटक गया था।
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आज भी चुनावी राजनीति में मुफ्त बिजली, बिरयानी और अन्य तात्कालिक लाभ पाकर प्रसन्न हो जाने वाला ‘लोक’ अपने दीर्घकालीन हितों के प्रति सजग नहीं है। कल्याणकारी योजनाएँ नागरिकों का अधिकार हैं, लेकिन क्या वे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, भाषा, आवास और पर्यावरण की माँग का विकल्प बन सकती हैं? यहाँ मज़ेदार बात यह है कि ‘लोक’ को चाहिए सब कुछ लेकिन ‘तंत्र’ के साथ जुड़कर ‘तंत्र’ को समझना किसी को अपना कर्तव्य नहीं लगता है। आजकल तीन शब्द हैं- 1. मीडिया 2. इंटरनेट और 3. मिम्स। ‘लोक’ आजकल इन्हीं के द्वारा संचालित होता है।
‘लोक’ को विदेशी बातें बहुत पसंद है लेकिन ‘लोक’ को पता ही नहीं 3 नवंबर 2026 को हुए अमेरिका के मध्यावधि चुनाव इस संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मतदाताओं ने करारा राजनीतिक झटका दिया। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट अर्थात दोनों में बहुमत प्राप्त किया। इस चुनाव में महँगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, ईरान के साथ युद्ध, सरकारी भ्रष्टाचार और राष्ट्रपति की शक्तियों पर नियंत्रण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। विशेष रूप से युद्ध के कारण बढ़ती ईंधन कीमतों और आर्थिक असुरक्षा ने अमेरिकी मतदाताओं को प्रभावित किया। मतदाताओं ने अपने मताधिकार के माध्यम से सत्ता को यह संदेश दिया कि राष्ट्रहित और नागरिक हित किसी भी राजनीतिक नेतृत्व से ऊपर हैं।
यहाँ विचारणीय बात केवल ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की पार्टी की पराजय नहीं, बल्कि अमेरिकी मतदाता की वह राजनीतिक चेतना है जिसने सत्ता को जवाबदेही का अनुभव कराया। उसने यह स्पष्ट किया कि चुनाव किसी नेता की लोकप्रियता का उत्सव मात्र नहीं, बल्कि उसके कार्यों का मूल्यांकन भी है। सत्ता को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करना ही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है। भारतीय ‘लोक’ को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल उत्सव, मतदान और सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं है। राष्ट्रहित और नागरिक हित से सबसे ऊपर हैं।

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी
हैदराबाद
