एक विश्लेषण : कामरेड गणपति लंबे समय तक माओवादी आंदोलन का नेतृत्व किया, सवाल है हासिल क्या किया?

इस चर्चा ने फिर से जोर पकड़ा है कि नक्सलाइट आंदोलन में गणपति के नाम से मशहूर मुप्पाला लक्ष्मण राव अज्ञात जीवन छोड़कर खुले जीवन में आ रहे हैं। हालांकि, गणपति मुख्य जीवनधारा में वापस आएंगे या नहीं। इससे भी बड़ी कुछ बातें हैं जिन पर उनके बारे में चर्चा करने की जरूरत है।

गणपति ने 1990 के दशक की शुरुआत में CPI पीपुल्स वार का नेतृत्व संभाला। 2004 में जब वह पार्टी माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के साथ विलय होकर CPI-माओवादी बनी, तब वे उसके महासचिव चुने गए। करीब छह साल पहले बीमारी, बुढ़ापे वगैरह कारणों से उन्होंने उस जिम्मेदारी से खुद को अलग कर लिया।

इतने लंबे समय तक अज्ञात जीवन बिताना कोई मामूली बात नहीं है। परिवार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामान्य जीवन जैसी तमाम सुविधाओं को छोड़कर दशकों तक आंदोलन में अज्ञात जीवन बिताना निस्संदेह एक बड़ी प्रतिबद्धता है। उस त्याग को सभी को पहचानना चाहिए। सम्मान करना चाहिए।

हालांकि, प्रतिबद्धता अकेले नेतृत्व का पैमाना नहीं है। द्वंद्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद सिर्फ परिमाण को ही नहीं देखता; गुणात्मक परिवर्तन को भी देखता है। नेता कितने साल बड़े पदों पर रहे यह परिमाण है। उस दौरान उन्होंने जिस सिद्धांत को माना, जिस आंदोलन को हाथ में लिया, अंततः जिस समाज में रहे, उसमें नया क्या जोड़ा, यही मुख्य सवाल है। वही गुणात्मक है।

कामरेड कोंडापल्ली सीतारामय्या को हटाकर गणपति के पीपुल्स वार के नेतृत्व में आने वाले 1990 के दशक से लेकर उनके पद से हटने 2020 के दशक तक फैले तीन दशक भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व इतिहास में भी एक विशेष दौर है।

इसी दौर में पूर्वी यूरोप में समाजवादी सरकारें गिर गईं। 1991 में सोवियत संघ बिखर गया। तब तक स्थिर पड़ी विश्व पूंजीवादी व्यवस्था ने अपना वर्चस्व बढ़ाया। भारत में आर्थिक सुधार शुरू हुए। बाजार, निजी निवेश, विश्व व्यापार मिलकर भारतीय अर्थव्यवस्था को बदलना शुरू कर दिया। 1995 में विश्व व्यापार संगठन बना; भारत उसके संस्थापक देशों में से एक बना। पहले आईटी, फिर एआई आकर उत्पादन के तरीके को ही बदल दिया।

इसी काल में भारत के राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में एक और गुणात्मक बदलाव आया। तब तक लेफ्ट ऑफ द सेंटर के रूप में चल रही भारतीय राजनीति राइट ऑफ द सेंटर बन गई। 1990 में आडवाणी की पहली रथयात्रा, 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस ने देश की राजनीति की दिशा बदल दी। संसदीय लोकतंत्र में धार्मिक राजनीतिक ध्रुवीकरण शुरू हुआ। एक तरफ वर्ग राजनीति को बाजार ने चुनौती दी। दूसरी तरफ, सांप्रदायिक राजनीति ने जोर पकड़ा।

भारतीय समाज को हिंदू-मुसलमान के रूप में वर्ग-विभाजित करने का हिंदुत्व सिद्धांत दामोदर सावरकर ने 1920 के दशक में ही आगे रखा था। परिस्थितियां अनुकूल बनते ही संघ परिवार ने 1990 के दशक में धार्मिक विद्वेष की प्रक्रिया को तेज कर दिया। 2020 के दशक में उसने अपने लक्ष्यों को लगभग हासिल कर लिया। भारतीय समाज और सांस्कृतिक, राजनीतिक-आर्थिक क्षेत्रों को हिंदू-मुसलमान के रूप में बांटने में वह सफल रहा। दूसरी ओर, सांप्रदायिक शक्तियों को कॉरपोरेट का समर्थन भी मिलने से कॉरपोरेट कम्युनल डिक्टेटरशिप (CCD) देश में मजबूत हो गई।

संतानोत्पत्ति के लिए स्त्री-पुरुषों के बीच बना विभाजन ही इतिहास में सबसे पहला श्रम विभाजन है, यह सूत्रीकरण कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स ने 1840 के दशक में किया था। मार्क्स की मृत्यु के बाद एंगेल्स ने लिखे ग्रंथ ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में एक महान सूत्रीकरण किया। एक पति-एक पत्नी के आधार पर बने आधुनिक पूंजीवादी परिवार में, पति पूंजीवादी वर्ग का प्रतिनिधि है; पत्नी श्रमिक वर्ग की प्रतिनिधि है, ऐसा साफ तौर पर तय कर पुराने सूत्र को नई जान दी। घोषित किया कि पति-पत्नी के बीच ‘वर्ग-वैमनस्य’ (class antagonism) होता है।

एक जिम्मेदार पद पर रहते हुए तीन दशकों में भारतीय समाज में आए बदलावों को गणपति को गंभीरता से नया वर्ग विश्लेषण करना चाहिए था। कॉरपोरेट सांप्रदायिक निरंकुश व्यवस्था में पूंजीवादी वर्ग समूह कौन है? श्रमिक वर्ग समूह कौन है? वर्ग-वैमनस्य नए सिरे से किन समूहों के बीच बना है? हमें किसका पक्ष लेना चाहिए? जैसे प्राणप्रद ऐतिहासिक सैद्धांतिक चुनौतियों को उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया। यानी अपने समय में उठे दार्शनिक संकट को सुलझाने का प्रयास उन्होंने नहीं किया। इस तरह उन्होंने एक ऐतिहासिक अपराध किया।

मार्क्स ने पूंजीवादी व्यवस्था का विश्लेषण किया तो लेनिन ने साम्राज्यवाद में बदली पूंजीवादी व्यवस्था का विश्लेषण किया। उसी तरह, कृषि प्रधान देश को समाजवादी देश में बदलने का प्रयास माओ ने किया। उसी तरह, अपने समय में भारतीय समाज में बनी कॉरपोरेट सांप्रदायिक निरंकुश व्यवस्था को गणपति ने किस हद तक समझा, उसे बदलने के लिए क्या किया? किस हद तक सफल हुए, ये प्रमुख सवाल हैं। उत्पादन शक्तियां – उत्पादन संबंध जैसे मार्क्सवादी मेथडोलॉजी को नई उत्पादन प्रणाली पर गणपति ने लागू किया हो, इसके निशान तक हमें नहीं दिखते।

“हमें जाति नहीं है, धर्म नहीं है” कहना बहुत आसान है। लेकिन समाज में जाति, धर्म कैसे काम कर रहे हैं, इसका वर्ग विश्लेषण करना होगा। वह इतना आसान नहीं है। भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों की विफलता का मुख्य कारण उनका समाज की वास्तविकता को समझने की शक्ति खो देना ही है। जिसे समाज समझ में नहीं आता, वह उसे बदल भी नहीं सकता। ऐसी सैद्धांतिक दरिद्रता को स्वाभाविक हार झेलनी ही पड़ती है।

मार्क्स को लेनिन ने रूस में लागू किया, न कि उसका अनुसरण किया। लेनिन को माओ ने चीन में लागू किया, न कि अनुसरण किया। माओ का कम्युनिस्ट पार्टियों ने भारत में अनुसरण किया, लागू नहीं किया। यह एक घोर अपराध है। दुनिया 1990 के दशक में गुणात्मक रूप से बदल गई। वह तब के पीपुल्स वार को भी समझ में नहीं आई; कल की माओवादी पार्टी को भी समझ में नहीं आई। माओवादियों को दुकान बंद करनी पड़ी, इसका यह मुख्य कारण है। अब भी कुछ विचारक वर्तमान भारतीय समाज को अर्ध-औपनिवेशिक, अर्ध-सामंती व्यवस्था कहते हैं तो थोड़ी ज्यादा ही हंसी आती है।

कामरेड गणपति ने अपनाई सैन्य रणनीतियों में भी यही संदेह हैं। माओ के नाम पर इतिहास में प्रसिद्ध लॉन्ग मार्च / विजय यात्रा वास्तव में युद्ध के मैदान से पीछे हटना (रिट्रीट) है। पीछे हटते हुए भी उसे जन समर्थन जुटाने की एक राजनीतिक रणनीति में बदलने में माओ सफल रहा। इसके विपरीत गणपति ने पार्टी काडर को विशाल समाज से दूर कर, अपनी सशस्त्र सेना को छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ में तैनात कर पद्मव्यूह में फंसा दिया। संसदीय लोकतंत्र, संविधान का विरोध करते हुए सशस्त्र संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है कहने वाली माओवादी पार्टी ने पहला मोर्चा पूरी तरह छोड़ दिया; दूसरे मोर्चे में दुखद रूप से हार गई।

कामरेड गणपति की प्रतिबद्धता की प्रशंसा की जा सकती है। उनके त्याग को पहचाना जा सकता है। एक सशस्त्र आंदोलन को दशकों तक चलाने की उनकी क्षमता को भी पहचाना जा सकता है। हालांकि सिक्के के दूसरे पहलू को भी देखना चाहिए।

कोंडापल्ली सीतारामय्या को गलतियां न करने वाला राजनीतिक सिद्धांतकार कहना शायद सही नहीं होगा। उन्होंने जो गलतियां कीं, वो उनकी हैं। हालांकि, लगभग राख बन चुका मान लिया गया नक्सलाइट आंदोलन को 1970 के दशक में फीनिक्स पक्षी की तरह फिर से जीवन देकर फलने-फूलने लायक बनाने का श्रेय कोंडापल्ली को ही है, इसमें संदेह नहीं। कोंडापल्ली ने जिस अंगूर के बाग को फलने-फूलने लायक बनाया, उसे जलाकर राख में बदलने का रिकॉर्ड अब गणपति के नाम दर्ज हो गया है। (सोशल मीडिया से साभार)

समाजिक और राजनीतिक विश्लेषक डैनी

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