हैदराबाद : कादम्बिनी क्लब हैदराबाद के तत्वावधान में संगोष्ठी सत्र संयोजन अवधेश कुमार सिन्हा (नई दिल्ली) की अध्यक्षता में क्लब की 408 वीं मासिक गोष्टी का सफल आयोजन हुआ। प्रेस विज्ञप्ति में मीना मुथा (कार्यकारी अध्यक्ष) एवं प्रवीण प्रणव (महामंत्री) ने संयुक्त रूप से बताया कि प्रथम सत्र का आरंभ सस्मिता नायक द्वारा सरस्वती वंदना की प्रस्तुति से हुआ। उपस्थित साहित्यकारों का शब्द कुसुमों से स्वागत करते हुए मीना मुथा ने क्लब की संक्षिप्त में जानकारी दी। कहा कि यह साहित्यिक संस्था 33वें वर्ष में अपनी निरंतर गतिविधियों के साथ अग्रसर है और युवा पीढ़ी को जोड़ते हुए संस्थापक स्व डॉ अहिल्या मिश्र के स्वप्न को साकार करने में प्रयत्नशील है। बिहार के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार एवं कवि चंदन सिंह अपने काव्य संसार पर बात करेंगे।
शिल्पी भटनागर ने मुख्य वक्ता चंदन सिंह का परिचय देते हुए कहा कि आपका जन्म बांका जिला बिहार में हुआ। आपने कई विदेशी साहित्यकारों कवियों की रचनाओं का हिंदी अनुवाद किया है। पं. जसराज जी के साथ आपने हार्मोनियम पर उनकी संगत की थी। प्रवीण प्रणव ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि आप विगत कुछ समय से हैदराबाद में स्थायी हो चुके हैं और अब कादम्बिनी परिवार के सदस्य भी आप रहेंगे। चंदन जी विलक्षण और विरल भाव के कवि हैं। आपकी रचना शांत और विषय केंद्रित होती हैं। आज हम उनसे ही उनकी रचना प्रक्रिया के बारे में जानेंगे।
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मुख्य वक्ता चंदन सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिन्दी कविता की परंपरा बहुत समृद्ध रही है। मैं अकिंचन एक कवि हूँ। जीवन के मार्मिक प्रसंगों को छूना और उन्हें दूसरों के जीवन में शामिल करना मेरा प्रयास है। कवि का संसार कोई अलग नहीं होता। संगीत में अपनी रुचि की वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि बचपन से ही बड़े-बड़े संगीतकारों के साथ उठना बैठना हुआ। संगीत सुनते सुनते सेन्स खुद ब खुद डेवलप हो गया। एक्सपोजर मिलता है तो आप उस ओर खिंच जाते हैं। चंदनजी ने ‘बसना’, ‘पानी गिरने की आवाज’, ‘काला हांडी’, ‘भुट्टा’ आदि कविताएँ उन्होंने सुनाई। ‘इंद्रधनुष’ कविता के माध्यम से रंगों के बारे में वैधानिक चेतावनी को अनसुना कर रंग कैसे ट्रान्सफॉर्म होते हैं इसका भी जिक्र चंदन जी ने किया। ‘चारुकेशी’ कविता गंभीर बिमारी से उत्पन्न पीडा का चित्र अंकित करता है। सुनीता लुल्ला, विनोद गिरी अनोखा, सुषमा त्रिपाठी, मधु भटनागर, आर्या झा, किरण कुमारी, डॉ आशा मुक्ता मिश्र ने भी अपने विचार रखें एवं साहित्य से संबंधित उनकी शंकाओं का समाधान मुख्य वक्ता ने किया।
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अध्यक्षीय टिप्पणी में अवधेश कुमार सिन्हा ने कहा कि चंदन जी ने विभिन्न तेवरों की कविताएँ सुनाईं। आप अब कादम्बिनी परिवार के इस साहित्यिक पटल पर अवश्य याद किए जाएंगे। आपकी सहभागिता सदैव मार्गदर्शक बनी रहेगी। अगली बार संगीत से जुड़ी हुई रचना की हमें प्रतीक्षा रहेगी। मैं अरुण कमल और प्रवीण प्रणव को साधुवाद देता हूँ कि चंदन जी को इस कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया। प्रवीण प्रणव ने सत्र का संचालन किया और धन्यवाद ज्ञापित किया। संगोष्ठी सत्र से पूर्व वरिष्ठ रचनाकार, प्रबुद्ध साहित्यकार, स्वर्गीय रत्नकला मिश्र के दुःखद निधन पर दो मिनट का मौन रखकर क्लब की ओर से श्रद्धांजलि दी गई। वे हैदराबाद के उन रचनाकारों में थीं, जिन्होंने सृजन के साथ साथ कई साहित्यिक संस्थाओं को संचालित भी किया था।
मीना मुथा के संचालन और डॉ सुरभि दत्त की अध्यक्षता में आयोजित काव्य गोष्ठी में गजानन पांडे, तृप्ती मिश्रा, धीरेंद्र कुमार झा, सुषमा त्रिपाठी, आर्या झा, इंदु सिंह, सुरज कुमारी, डॉ रक्षा मेहता, विनोदगिरी अनोखा, दर्शन सिंह, डॉ प्रतिमा सिंह, सुनीता लुल्ला, रचना चतुर्वेदी, निशी कुमारी, तरुणा, अंशु श्री सक्सेना, चंद्रप्रकाश दायमा, हर्षलता दुधोडिया, डॉ आशा मिश्र ‘मुक्ता’, वर्षा शर्मा, उषा शर्मा, प्रवीण प्रणव, मीना मुथा आदि ने काव्यपाठ किया। डॉ सुरभि दत्त ने अध्यक्षीय काव्यपाठ किया और टिप्पणी में कहा कि लगभग 21 कवियों ने रचनाएँ सुनाईं। सभी एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियाँ रहीं। विभिन्न विषयों पर केंद्रित रचनाएं सुनते सुनते मैं भावविभोर हो गयी हूँ। सभी को साधुवाद। इस अवसर पर के. राजन्ना, अलका चौधरी, डॉ स्वाति गुप्ता, शेखर त्रिपाठी, रेखा अग्रवाल की उपस्थिति रही। प्रवीण प्रणव एवं डॉ आशा मिश्र ने तकनीकी सहयोग दिया। आर्या झा ने द्वितीय सत्र का धन्यवाद ज्ञापित किया।
