हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष : परंपरा को नई ऊर्जा दे रहे हैं प्रो. ऋषभ देव शर्मा के संपादकीय

[नोट- हिंदी पत्रकारिता दिवस हर साल 30 मई को मनाया जाता है। यह दिन हिंदी भाषा में पहले समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन की याद में मनाया जाता है। इसका प्रकाशन 30 मई 1826 को कलकत्ता (अब कोलकाता) से हुई थी।]

30 मई को मनाया जाने वाला हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि हिंदी भाषा, जनचेतना और वैचारिक अभिव्यक्ति की उस परंपरा का स्मरण है जिसने समाज को दिशा दी। ऐसे अवसर पर प्रो. ऋषभ देव शर्मा जैसे संपादकीय चिंतकों का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय बन जाता है। डेली हिंदी मिलाप में प्रकाशित प्रस्तुत दोनों संपादकीय — “हम दो, हमारे दो नहीं ‘दिल मांगे मोर’” तथा “कूटनीति, ‘मेलोडी’ और घरेलू सियासत” — यह प्रमाणित करते हैं कि वे केवल समाचार नहीं लिखते, बल्कि समकालीन समाज, राजनीति और मानवीय मनोविज्ञान की गहरी व्याख्या भी करते हैं।

प्रो. ऋषभ देव शर्मा

पहले संपादकीय में जनसंख्या, राजनीति और सामाजिक मनोवृत्ति जैसे जटिल विषय को व्यंग्यात्मक किंतु गंभीर शैली में प्रस्तुत किया गया है। “छोटा परिवार, सुखी परिवार” से “तीसरा बच्चा लाइए, नकद ईनाम पाइए” तक की यात्रा को लेखक ने केवल सरकारी नीति परिवर्तन के रूप में नहीं देखा, बल्कि बदलती राजनीतिक आवश्यकताओं और सामाजिक विडंबनाओं के रूप में विश्लेषित किया है। लेख में हास्य, व्यंग्य और तथ्य का संतुलित प्रयोग दिखाई देता है। यह संपादकीय पाठक को सोचने पर विवश करता है कि जनसंख्या केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि राजनीति, अर्थव्यवस्था और भविष्य की सामाजिक संरचना से जुड़ा प्रश्न है।

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दूसरे संपादकीय “कूटनीति, ‘मेलोडी’ और घरेलू सियासत” में प्रो. शर्मा ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मानवीय संवेदना और लोकतांत्रिक विमर्श के साथ जोड़कर देखा है। प्रधानमंत्री की इटली यात्रा के संदर्भ में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि आधुनिक कूटनीति केवल समझौतों और औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उसमें व्यक्तित्व, संवाद शैली और सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साथ ही उन्होंने घरेलू राजनीति और विपक्षी आलोचनाओं का संतुलित उल्लेख करते हुए लोकतांत्रिक दृष्टिकोण बनाए रखा है। यह संतुलन एक परिपक्व संपादक की पहचान है।

प्रो. ऋषभ देव शर्मा की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे कठिन राजनीतिक या सामाजिक विषयों को भी सहज, रोचक और जनभाषा में प्रस्तुत करते हैं। उनकी भाषा में विद्वत्ता है, पर बोझिलता नहीं; व्यंग्य है, पर कटुता नहीं; और विचार हैं, पर पक्षपात नहीं। यही गुण एक अच्छे पत्रकार और संपादक को विशिष्ट बनाते हैं।

हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर यह कहना उचित होगा कि प्रो. ऋषभ देव शर्मा जैसे लेखक हिंदी संपादकीय परंपरा को नई ऊर्जा दे रहे हैं। वे पत्रकारिता को केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के बौद्धिक और नैतिक संवाद का मंच बनाते हैं। उनकी लेखनी समसामयिक मुद्दों पर जागरूकता पैदा करने के साथ-साथ पाठकों में चिंतन की संस्कृति भी विकसित करती है। यही हिंदी पत्रकारिता की वास्तविक शक्ति और उद्देश्य है।

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी
हैदराबाद
संपर्क : 96032 24007

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