विश्लेषणात्मक लेख- आत्मनिर्भरता का नया अर्थशास्त्र: व्यक्तिगत मितव्ययिता और राष्ट्र निर्माण का महासंकल्प

[नोट- लेख में व्यक्त विचार स्वयं लेखक के है। इससे संपादक मंडल का सहमत होनो आवश्यक नहीं है।]

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ अंतरराष्ट्रीय सीमाएं और वैश्विक बाजार की अनिश्चितताएं किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता को सीधे प्रभावित करती हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा समय-समय पर की गई अपीलें एक गहरे आर्थिक दर्शन को रेखांकित करती हैं। सोने की खरीदारी में कमी लाने, खाद्य तेल का संयमित उपयोग करने और पेट्रोल-डीजल की बचत के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ जैसे सुझावों को यदि केवल सतही परामर्श माना जाए, तो यह इनके पीछे छिपे व्यापक अर्थशास्त्रीय प्रभाव की अनदेखी होगी। वास्तव में, ये अपीलें भारत के चालू खाता घाटे और व्यापार घाटे को नियंत्रित करने के लिए व्यवहारिक अर्थशास्त्र का एक अनूठा प्रयोग हैं। जब एक राष्ट्र का मुखिया नागरिकों से अपनी जीवनशैली में सूक्ष्म परिवर्तन का आग्रह करता है, तो वह सीधे तौर पर देश की विदेशी मुद्रा संपदा के संरक्षण और घरेलू आत्मनिर्भरता के बीज बो रहा होता है। यह एक ऐसा आह्वान है जो नागरिक के व्यक्तिगत उपभोग को सीधे तौर पर राष्ट्र के वृहद आर्थिक स्वास्थ्य से जोड़ देता है।

भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हमारी आयात निर्भरता रही है, और प्रधानमंत्री के सुझाव इसी दुखती रग पर प्रहार करते हैं। भारतीय समाज में स्वर्ण के प्रति गहरा सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक लगाव रहा है, किंतु अर्थशास्त्र की दृष्टि से यह एक मृत पूंजी है जो देश के उत्पादन चक्र में कोई योगदान नहीं देती। अरबों डॉलर खर्च करके आयात किया गया सोना जब तिजोरियों में बंद हो जाता है, तो वह देश की तरलता को बाधित करता है। इसी प्रकार, खाद्य तेलों और ईंधन के लिए विदेशों पर हमारी निर्भरता न केवल डॉलर का बहिर्वाह करती है, बल्कि भू-राजनीतिक तनावों के समय हमारी खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा को भी जोखिम में डालती है। वर्क फ्रॉम होम जैसी डिजिटल कार्य-संस्कृति को बढ़ावा देना केवल आधुनिकता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह ईंधन की खपत घटाकर विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने और शहरी बुनियादी ढांचे पर बढ़ते बोझ को कम करने की एक दूरगामी रणनीति है। यह नागरिक कर्तव्य बोध का एक नया आयाम है, जहाँ एक व्यक्ति की बचत राष्ट्र की शक्ति बन जाती है।

हालाँकि, एक ओर जहाँ केंद्र सरकार नागरिक भागीदारी के माध्यम से आर्थिक सुदृढ़ीकरण का प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी ओर भारतीय राजनीति में रेवड़ी संस्कृति या मुफ्त की योजनाओं का बढ़ता चलन एक गंभीर चिंता का विषय बनकर उभरा है। विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी लाभ के लिए मुफ्त बिजली, पानी, नकद हस्तांतरण और अन्य लोकलुभावन घोषणाओं की जो होड़ मची है, वह राष्ट्रव्यापी अर्थव्यवस्था के लिए किसी दीमक से कम नहीं है। यह शॉर्टकट की राजनीति राजकोषीय अनुशासन को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है। जब राज्य सरकारें अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा अनुत्पादक सब्सिडी और मुफ्त उपहारों पर खर्च करती हैं, तो उनके पास शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान और बुनियादी ढांचे जैसे निवेश-प्रधान क्षेत्रों के लिए धन का अभाव हो जाता है। यह प्रवृत्ति न केवल भावी पीढ़ियों पर कर्ज का असहनीय बोझ डालती है, बल्कि समाज में कार्य-संस्कृति और उत्पादकता के स्तर को भी गिराती है।

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अर्थव्यवस्था के वास्तविक सुधार हेतु अब समय आ गया है कि उपभोग-आधारित राजनीति के स्थान पर पूंजी निर्माण-आधारित नीति को प्राथमिकता दी जाए। मुफ्त की योजनाओं के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए एक राष्ट्रव्यापी विमर्श और सख्त राजकोषीय मानकों की आवश्यकता है। राज्यों की उधार लेने की सीमा को उनके द्वारा किए गए पूंजीगत व्यय से जोड़ना अनिवार्य होना चाहिए। इसके साथ ही, कृषि क्षेत्र में तिलहन और दलहन के घरेलू उत्पादन को युद्धस्तर पर बढ़ावा देना होगा ताकि खाद्य तेलों के भारी-भरकम आयात बिल को कम किया जा सके। ऊर्जा के क्षेत्र में सौर, हरित हाइड्रोजन और इथेनॉल सम्मिश्रण जैसे विकल्पों को केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जन-आंदोलन बनाना होगा। वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देकर जनता को सोने के भौतिक संग्रह के बजाय डिजिटल स्वर्ण और अन्य वित्तीय साधनों की ओर प्रेरित करना भी अनिवार्य है, ताकि देश की पूंजी देश के विकास कार्यों में निवेशित हो सके।

प्रधानमंत्री की अपीलें और आर्थिक सुधारों की आवश्यकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न केवल सरकारी घोषणाओं से नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सजगता और राजनीतिक दलों के राजकोषीय उत्तरदायित्व से ही साकार होगा। हमें यह समझना होगा कि आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी उत्पादों का बहिष्कार नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक आर्थिक शक्ति को संचित और संवर्धित करना है। यदि हम व्यक्तिगत स्तर पर मितव्ययिता अपनाते हैं और नीतिगत स्तर पर मुफ्तखोरी के प्रलोभन से बचते हुए विकासोन्मुखी निवेश को चुनते हैं, तभी भारत वैश्विक मंच पर एक स्थायी और सशक्त आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर पाएगा। यह समय संकुचित स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में कठोर किंतु आवश्यक आर्थिक निर्णय लेने का है, ताकि आने वाली पीढ़ियां एक समृद्ध और स्वावलंबी भारत की विरासत प्राप्त कर सकें।

अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
संपर्क : 77804 09549

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