हैदराबाद : त्रधार साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, हैदराबाद भारत की ओर से 78 वीं मासिक गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन हर्षोल्लास पूर्वक सम्पन्न हुआ। संस्थापिका सरिता सुराणा ने सभी सहभागियों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन किया और कहा कि यह गोष्ठी हम सबके लिए विशेष है। इस गोष्ठी के साथ ही हम अपनी संस्था के गठन के सातवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। आप सबके सहयोग से हमने अपनी साहित्यिक यात्रा के 6 वर्ष सफलतापूर्वक पूर्ण कर लिए हैं। संस्था की वरिष्ठ सदस्या एवं संरक्षक किरन सिंह ने स्वरचित सरस्वती वन्दना प्रस्तुत करके गोष्ठी का शुभारम्भ किया। तत्पश्चात् शहर की वरिष्ठ कवयित्री सुषमा बैद के देहावसान पर दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।


प्रथम सत्र में प्रमुख छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत और प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर परिचर्चा आरम्भ करते हुए अध्यक्ष ने कहा कि सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के सुकुमार कवि हैं। उन्होंने बचपन से ही लिखना शुरू कर दिया था। उनका रचना काल 60 वर्षों का दीर्घकालिक समय रहा है। उन्होंने छायावाद से प्रारम्भ करके प्रगतिवाद तक अपनी रचनाएं लिखी। दर्शन सिंह ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि पंत जी ने कहा था – वियोगी होगा पहला कवि/आह से उपजा होगा गान/निकलकर आँखों से चुपचाप/बही होगी कविता अनजान। उन्होंने कल्पना से लेकर यथार्थ तक सभी तरह की रचनाएं रची। उन्होंने शरद जोशी के प्रमुख व्यंग्य संग्रह ‘जीप पर सवार इल्लियां’ की चर्चा की और कहा कि उन्होंने सभी तरह की सामाजिक विसंगतियों पर लिखा। गजानन पाण्डेय ने कहा कि शरद जोशी उच्च कोटि के व्यंग्यकार थे। उन्होंने मनुष्यता के आचरण पर बल दिया और समाज में व्याप्त असमानताओं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी लेखनी चलाई। प्रथम सत्र बहुत ही सार्थक और सारगर्भित रहा।
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द्वितीय सत्र में वरिष्ठ गीतकार विनीता शर्मा ने – माँ की पाती रचना प्रस्तुत करके सबको भावविभोर कर दिया। वरिष्ठ कवयित्री शोभा देशपांडे ने शरद जोशी की रचना – ‘समस्याओं के घाट पर तौलिया लपेटे खड़े हैं’ का वाचन किया। हैदराबाद से अमिता श्रीवास्तव ने यादों से संबंधित अपनी रचना – चाँद करवट बदल रहा प्रस्तुत की। कोलकाता से सुशीला सुराणा ने मुझे हिस्सों में मत बांटो रचना का पाठ किया तो सिलीगुड़ी से बबीता अग्रवाल कंवल ने अपनी गज़ल – किसी से न जाने कब मुलाकात हो आखिरी बार को तरन्नुम में प्रस्तुत कर समां बांध दिया। आईटी प्रोफेशनल एवं युवा कवयित्री श्रीया धपोला ने दहेज हत्या पर अपनी कविता की चंद पंक्तियां प्रस्तुत की। वरिष्ठ साहित्यकार गजानन पाण्डेय ने अपनी लघुकथा – जिंदगी मुस्कुराई का वाचन किया। बेंगलुरु से एडवोकेट एवं कवयित्री अमृता श्री ने बहुत ही मार्मिक और प्रेरणादायक बोधकथा का पाठ किया। दर्शन सिंह ने पंजाबी मिश्रित हिन्दी भाषा में अपनी रचना प्रस्तुत की। के कुमार प्रसन्ना ने – इंसानियत के दायरे से निकलकर हैवानियत रचना प्रस्तुत की। आर्या झा ने – आँसुओं को छुपाना सीख लिया है जैसी भावपूर्ण रचना प्रस्तुत की। वर्षा शर्मा ने भी अपनी गज़ल का पाठ किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में सरिता सुराणा ने सभी सहभागियों की रचनाओं की सराहना करते हुए कहा कि सभी विधाओं में हमें रचनाएं सुनने को मिली। सभी रचनाकारों की रचनाएं उत्कृष्ट कोटि की थीं, इस हेतु सभी बधाई के पात्र हैं। उन्होंने वर्तमान समय में विश्व में फैली अशांति और युद्ध के ख़तरों के बीच मानवीय मूल्यों और इंसानियत के पतन पर अपनी रचना – विचलित हूं मैं का वाचन किया। उन्होंने संस्था के सामाजिक कार्यों के तहत एक दिन छाछ वितरण कार्यक्रम की जानकारी सभी सदस्यों को दी। आर्या झा के धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी सम्पन्न हुई।
