भारत में अनेक भाषाऍं हैं। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ अहिन्दीभाषी प्रदेशों के चयनित वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकारों को सौहार्द सम्मान के साथ दो लाख पचास हजार रुपए की सम्मान राशि सादर देता है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ ने वर्ष 2020 के लिए हिन्दी विश्वविद्यालय हैदराबाद की हिन्दी विभाग की सेवानिवृत्त रीडर तथा शोध निर्देशक डॉ. सुमनलता रुद्रावझला को तेलुगू भाषी क्षेत्र में हिन्दी भाषा एवं साहित्य के उन्नयन में विशिष्ट योगदान के लिए सौहार्द सम्मान के साथ दो लाख पचास हजार रूपए की सम्मान राशि देकर सम्मानित किया।
हिन्दी तेलुगू तथा अंग्रेजी भाषा की प्रकाण्ड पण्डिता डॉ. सुमनलता पितृपक्ष से कौण्डिन्य गोत्र की हैं। उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ ने उसी वर्ष मुझे भी साहित्य भूषण सम्मान प्रदान किया। जब आदरणीया रुद्रावझला को ज्ञात हुआ कि मैंने कौण्डिन्य पर हिन्दी में महाकाव्य लिखा है तब उन्होंने मुझसे कौण्डिन्य महाकाव्य को लेकर उसका तेलुगू में अनुवाद करके प्रकाशित कराया। इस प्रकार उन्होंने अपने पितृपक्ष के गोत्र पुरुष को सारस्वत श्रद्धांजलि दी।

सुमलता ने हिन्दी महाकाव्य कौण्डिन्य के तेलुगू अनुवाद को अपने अग्रज श्री रामकृष्ण राव रुद्रावझला को समर्पित किया, जिन्होंने अनुजा डॉ. सुमनलता को बचपन से ही पुस्तकें पढ़ने की आदत डाली थी। श्री रामकृष्ण राव रुद्रावझला का 91 वर्ष की आयु में 31अगस्त 2026 को निधन हो गया। आप हिन्दी, तेलुगू तथा अंग्रेजी भाषाओं के प्रवीण लेखक थे और वरिष्ठ संगीतकार भी थे। अनुजा ने अग्रज की पावन स्मृति को कौण्डिन्य के तेलुगू अनुवाद के साथ शाश्वत बना दिया।
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डॉ. सुमनलता रुद्रावझला (संपर्क- 98494 15728) ने अनूदित कविता संकलन को अपने स्व पति डॉ. वी बी एस मूर्ति को समर्पित किया है जो उस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद में भूभौतिक विज्ञान के प्रोफेसर तथा अध्यक्ष थे। सौभाग्य से आपको दोनों कुलों मे विद्वान मिले। शोधनिर्देशिका सुमनलता के धन का अधिकांश भाग छात्रवृत्ति में चला जाता है। आपको अनेक सम्मान मिल चुके हैं जिनकी नवीनतम कड़ी में अंतरराष्ट्रीय प्रज्ञा सम्मान 2026है।

यदि आज आपके अग्रज होते तो वे बहुत प्रसन्न होते। मैं तथा कविराज मथुराप्रसाद सिंह जटायु विगत 9 नवंबर 2024 को कादंबरी जबलपुर के सम्मान के लिए जबलपुर गये थे। वहां आदरणीया डा रुद्रावझला भी सम्मानित होने आयी थीं। आदरणीय जटायु जी ने आपकी विद्यावती वाणी सुनकर कहा कि इन्होंने कठिन सारस्वत तपस्या की है।
कौण्डिन्य का श्रीमती रूमी लस्कर ने असमिया में, उत्तरप्रदेश हिन्दी लखनऊ से 2020 में सौहार्द सम्मान से सम्मानित डॉ जशभाई पटेल ने गुजराती में तथा श्रीमती सुनीता सिंह सरोवर में अंग्रेजी में अनुवाद किया जो प्रकाशित है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से 2021 में साहित्य भूषण सम्मान से सम्मानित तथा अन्य सुप्रतिष्ठ सारस्वत सम्मानों से समलंकृत पं विजयशंकर मिश्र ‘भास्कर’ ने मेरे दो महाकाव्यों कौण्डिन्य तथा अगस्त्य का क्रमशः ‘कंबुज नरेश कौण्डिन्य’ तथा ‘देदीप्यमान अगस्त्य’ के नाम से औपन्यासिक रूपांतरण कर उसे प्रकाशित भी कराया।

कौण्डिन्य तथा अगस्त्य के तीन -तीन सर्ग डॉ राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय अयोध्या के परिसर में संचालित एम ए द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में निर्धारित हैं। इन दोनों महाकाव्यों तथा मेरी अन्य रचनाओं के संदर्भ में पी एच डी, एम फिल तथा लघु शोध प्रबंध स्तर के कार्य हुए हैं।
साहित्यभूषण पंडित विजय शंकर मिश्र ‘भास्कर’ ने मेरी सारस्वत साधना पर साहित्येन्दु सुधा लिखा था जो प्रकाशित है। अब वे ‘साहित्येन्दु गौरव’ नामक ग्रंथ सृजित करने का ताना-बाना बुन रहे हैं। मैं साहित्य महोपाध्याय भास्कर जी के साथ उन सभी मनीषियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं जिनके सौजन्य से मेरी सारस्वत साधना समादरित हो रही है।
सादर,
डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय साहित्येन्दु
