नवउदारवाद के दौर में बाजारवाद से दूर एक त्योहार: ढेड़िया, जानें इसकी संस्कृति और परंपरा

हमारे देश में त्योहारों की विविधता रही है। इसका प्रमुख कारण यह है कि यह देश धर्म, भाषा, संस्कृति और जाति जैसी विविधताओं से भरा हुआ है और हर धर्म से ही नहीं अपितु हर जाति-जनजाति और समुदाय से जुड़े लोगों के अपने खुद के सांस्कृतिक और पारंपरिक त्योहार हैं। इनको मानने/मनाने के पीछे का महत्वपूर्ण कारण है। इनका अपना इतिहास, रीति-रिवाज और विश्वास के अनुसार अलग अंदाज और हर एक उत्सव का अपना एक इतिहास, पौराणिक कथाएँ और मनाने का विशेष महत्व है। वर्तमान समय में तो हर धर्म, जाति और समुदाय के लोग अपने महापुरुषों के जन्मदिन को भी किसी त्योहार से कम नहीं मानते।

इन त्योहारों का मकसद अपनी जाति, धर्म और समुदाय को ऊँचा दिखाना भी है। यह भी कहा जा सकता है कि हर धर्म, जाति और समुदाय की अपनी एक सांस्कृतिक विरासत है जो इन त्योहारों के माध्यम से प्रकट होती रहती है। सभी त्योहार स्वयं में एक विशिष्ट अर्थ व उद्देश्य लिए होते हैं जिसके कारण इनकी महत्ता लंबे समय तक कायम रहती है। यह माना जाता है कि त्योहारों के उल्लास के रंगों में मनुष्य की संकीर्णता व रंग एवं जाति-भेद दूर-होते चले जाते हैं. परंतु इन त्योहारों की मूल भावना अब लगभग ख़त्म सी हो चुकी है। अगर इन त्योहारों में कुछ शेष है तो वह है इन त्योहारों का स्वरूप मात्र और इसमें भी बाजार इतना हावी हो गया है। लगता है कि ये त्योहार बाजार के कारण ही मनाए जाते हैं।

अधिकांश त्योहारों का संबंध या तो सीधा-सीधा कृषि से रहा है या तो कृषि कार्य सम्पन्न होने के बाद उल्लास से। जैसे-जैसे समय बदलता गया वैसे-वैसे त्योहार भी बाजार के लपेट में आते गए अर्थात जहां बाजार ने कुछ त्योहारों को बहुत ही प्रचलित कर दिया जिससे वे ग्रामीण इलाक़ों से निकलकर शहरों में छा गए तो वहीं दूसरी तरफ कुछ त्योहार बाजार के कारण या तो विलुप्त हो गए अर्थात बाजार की भेंट चढ़ गए या लुप्तप्राय अवस्था में हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में त्योहार हमेशा फसल कटने के समय या कट कर आनज के घर में पहुँच जाने के बाद होते रहे हैं। त्योहार तो अब भी वही हैं परंतु इनमें बहुत बड़ा बदलाव जो आया वह है कृषि से जुड़े इन सभी त्योहारों का ब्राह्मणी करण के कारण देवी-देवताओं से जोड़ा जाना। कुछ त्योहारों को राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है जबकि कुछ को क्षेत्रीय स्तर पर मनाया जाता है। कुछ त्योहार तो ऐसे भी हैं कि वह किसी जिले के संपूर्ण भाग में भी नहीं मनाए जाते। कुछ त्योहार स्थानीय परंपरा के अनुरूप ही मनाए जाते हैं। उन्हीं में से एक त्योहार है ढेड़िया।

अगर किसी से यह पूछा जाए कि भाई-बहन का त्यौहार कौन सा है? तो यही जवाब मिलेगा कि रक्षाबन्धन और भाईदूज। भाई-बहन के त्यौहार के रूप में मनाए जाने वाले ‘ढेड़िया’ का नाम शायद ही किसी के मुँह से निकले। ढेड़िया के बारे में अधिकांश लोगों की अल्पज्ञता का कारण है- अग्रणी समुदाय यथा- ब्राह्मण, ठाकुर, और कायस्थ लोगों द्वारा इस त्योहार को मनाए जाने की परम्परा का न होना। यही कारण है- शरद पूर्णिमा के बारे में लम्बा-लम्बा लेख लिखकर अपने पाठकों को प्रभावित करने वाले देशी-विदेशी लेखक भी ढेड़िया का उल्लेख करना भूल जाते हैं, जबकि ढेड़िया शरद पूर्णिमा के एक दिन पहले अर्थात दशहरा के चौथे दिन ही मनाई जाती है।

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ढेड़िया का त्योहार मुख्यतया इलाहाबाद और कौशांबी में ही मनाया जाता है और कहीं भी इस त्योहार को मनाने के उल्लेख नहीं प्राप्त होते हैं। यह त्योहार क्यों मनाया जाता है इसका ठीक-ठीक कारण बता पाने में लोग असमर्थ है, लेकिन एक बात सभी लोग खुले दिल से मानते हैं कि यह त्योहार बहनों द्वारा भाइयों की बला-बधाएं उतारने के लिए मनाया जाता है। यह त्योहार भी ब्राह्मणी करण से नहीं बच पाया। हालांकि यह किसी भी दिन पड़ जाए तो भी बड़े उल्लास से मनाया जाता है फिर भी यदि शनिवार को पड़ जाए तो बहुत ही शुभ/अच्छा माना जाता है, इसका एक कारण यह है कि जिसे ग्रामीण लोग आम बोल-चल में बला-बधाएँ कहते हैं वह दरअसल ब्राह्मणों की भाषा में शनीचर अर्थात शनि का प्रकोप माना जाता है। इस त्योहार के पीछे ऐसी मान्यता है कि ढेड़िया उतारने से भाई शनि के प्रकोप से मुक्त हो जाते हैं। यह त्योहार हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन (क्वार) माह के शुक्ल पक्ष में दशहरे के बाद चौथे दिन और शरद पूर्णिमा से ठीक एक दिन पूर्व अर्थात चतुर्दशी को मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसी दिन को कोजगिरी व्रत के रूप में मनाया जाता है।

बरसात ख़त्म होने के बाद ही कुम्हार ढेड़िया और दिवाली बनाने के अपने कामों में जुट जाते हैं। ढेड़िया को ठेले या टोकरी में लेकर कुम्हारों की टोली पूरे दिन गांव के मोहल्ले-मोहल्ले में चक्कर लगाती रहती है, पहले ढेड़िया का लेन-देन विनिमय (अर्थात ढेड़िया के बदले में अनाज दिया जाता था, जो कि प्रायः धान हुआ करता था, अन्य अनाज भी दिए-लिए जाते थे) के आधार पर होता था। इस दिन कुम्हारों के घरों और दुकानों पर भी ढेड़िया के लिए लोगों का आवागमन बना रहता है।

ढेड़िया के पर्व के लिए बहनें अपने ससुराल से भाइयों के घर पहुंचती हैं। इस त्योहार पर भी बहनों में रक्षाबंधन से कम उल्लास नहीं रहता है, मायके आने की खुशी बहनों के चेहरे पर देखते ही बनती है। ढेड़िया पर्व पर अपने भाइयों की बला-बाधाएं दूर करने के लिए बहनें भाइयों के ढेड़िया उतारती हैं। दूज की तरह ही बहनें भाइयों के माथे पर टीका करती हैं, उन्हें मिठाई/गट्टा (चीनी से बने खिलौने) खिलाती हैं और आरती उतारती हैं। फिर झरोखेदार डेढ़िया से भाइयों की बला-बाधाएं उतारी जाती हैं। परंपरा के मुताबिक कच्ची मिट्टी से बना कलश नुमा कुल्हड़ के आकार से लेकर लोटे के आकार तक की मिट्टी का बना एक पात्र मिलता है, जो नहन्नी (जिससे नाई गांवों में लोगों के नाखून काटते थे) की मदद से तैयार किया गया होता है।

इस पात्र के चारों ओर विभिन्न आकृतियों में छेद बने होते हैं। इस पात्र को रंग-बिरंगे रंग से रंगा भी जाता है जिससे यह बहुत ही सुंदर दिखने लगता है। इस झरोखेदार पात्र/ढेड़िया के भीतर धान की भूसी (धान के छिलके) रखकर एक दिवाली में दिया जलाया जाता है। फिर ढेड़िया को ऊपर कच्ची मिट्टी की ही एक बड़ी दिवाली/सकोरा(करई) से ढक कर उसमें लाई (मुरमुरे), चीनी से बने खिलौने (जो विभिन्न पशु-पक्षियों के आकार में होते हैं) और पैसे रखा जाता है। जलते हुए दिये के साथ ढेड़िया को भाइयों के सिर पर एक कपड़ा (गोड़री) रखकर ढेड़िया उतारी जाती है। इस दौरान हर राउंड के बाद ढेड़िया को सर पर रखा जाता है, ऐसा ही सात बार किया जाता है। इस प्रक्रिया को ढेड़िया उतारना कहते हैं।

मान्यता यह है कि ऐसा करने से भाइयों के ऊपर आने वाली हर मुसीबत (बला) टल जाती है और भाई सुरक्षित रहता है। बहनें ढेड़िया उतरने के साथ ही भाइयों के लिए मंगल कामना भी करती हैं। जिन भाइयों के बहन नहीं होती है/हैं उनकी बुआ (पिता की बहन) उनके ढेड़िया उतारती हैं। कई घरों में पिता की मंगल कामना के लिए भी ढेड़िया उतारी जाती है। इसके बाद जलते दीये के साथ ही ढेड़िया को रास्ते या चौराहे पर ले जाकर फेंक दिया जाता है। इसके पीछे यह मान्यता है कि जो कोई भी रास्ते से गुजरेगा सारी बला-बाधाएँ उसके साथ चली जाएँगी। ढेड़िया उतारने के बाद घर-परिवार के सारे लोग एक साथ बैठकर लाई, मिठाई (गट्टा और हाथी-घोड़ा) खाते हैं। भाई अपनी बहनों को यथाशक्ति उपहार भी देते हैं। इस अवसर पर घरों में विशेष पकवान भी बनाए जाते हैं।

यह त्योहार प्रमुखतया महिलाओं की स्वच्छंदता या आजादी का भी एहसास कराता है। महिलाएं ढ़ेडिया के लगभग 15 दिन पहले से रात्रि में घर के सारे सदस्यों को खाना खिलाने और बच्चों को सुलाने के बाद द्वार पर गाना गाती थीं और तमाम तरह के स्वांग करती थीं, जिसे ग्रामीण भाषा में ‘अताव’ या ‘सुरांग’ कहा जाता है। उनके इस कार्यक्रम को ‘ढेड़िया गाना’ कहा जाता है। यह गांव के लगभग सभी मुहल्ले में होता था। इनके इस अताव में महिलाएं प्रायः पुरुषों की भूमिका में ही होती थीं। पुरुषों के वेश धारण करना, उनकी नकल उतारना, उनकी मिमिक्री करना, चोर-सिपाही, डॉ. और मरीज आदि शामिल थे। महिलाएं यह सब करने के लिए दिन से ही अपने घर के पुरुषों के सामानों यथा कपड़े, लाठी, साइकिल आदि पर नजर रखने लगती थीं और रात में वस्तुएं उनके अभ्यास में काम आती थीं और सुबह सारी वस्तुएं यथास्थान ही मिलती थीं। कई बार कपड़ों के अस्त-व्यस्त हो जाने पर पता चल जाया करता था, और डांट भी सुननी पड़ती थी।

अधिकांश युवा पुरुष भी घर से बाहर गोइण (आस-पास) के खेतों में ‘बदी’ खेलने जाया करते थे। यह खेल कबड्डी की ही तरह होता है, जो कि आलू बोने के लिए तैयार खेतों में खेला जाया करता था, पर इसमें कुछ भिन्नता होती है। जब तक पुरुष बदी खेल कर आया करते थे तब तक महिलाओं का अताव वाला खेल ख़त्म हो चुका होता था और वे सामूहिक रूप से गाना गाने में लगी होती थीं। इस गाने में प्रायः महिलाएं एक-दूसरे का हांथ पकड़कर गोले में घूम-घूमकर गाती थीं। पहले एक या दो महिलाएं गाती थीं और बाकी उनका अनुसरण करती थीं। महिलाओं के इसमें सहभागिता के दौरान कुछ उम्रदराज महिलाएं घरों में बच्चों की देखभाल करती थीं और कुछ कार्यक्रम स्थल पर बैठी रहा करतीं थीं।

आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने के कारण पूरी रात बिल्कुल सफ़ेद चाँदनी की तरह चमकती है, इस समय मौसम भी बहुत अच्छा होता है क्योंकि न ठंडी होती है और न गर्मी और इस समय खेती में बहुत अधिक काम भी नहीं होता था/है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि महिलाएं देर तक जागती थीं तो सुबह देर तक सोती थीं, रात्रि 2-3 बजे तक जागने के बाद भी सुबह शीघ्र उठकर घर के सारे कम भी निपटातीं थीं और फिर वही अपनी दिनचर्या में लग जाती थीं। अब भी कुछ स्थानों पर ऐसा होता है परंतु उसमें कम पढ़ी-लिखी या निरक्षर महिलाएं ही जातीं हैं, पढ़ी-लिखी महिलाएं या तो यह सब पसंद नहीं करतीं या तो वे टी वी पर आ रहे धारावाहिकों में व्यस्त रहना ज्यादा अच्छा समझती हैं। यह त्योहार तो अब भी मनाया जाता है पर इस त्योहार को लेकर उतना उल्लास नहीं रहता और न ही उस तरह से महिलाएं ‘ढेड़िया गाने’ में भाग ही लेती हैं और अब गाँवों में पहले जैसी समरसता भी नहीं रही।

आज भले ही यह त्योहार इलाहाबाद शहर में रह रहे कुछ घर-परिवार में मनाया जाने लगा हो परंतु आज भी बाजार की चकाचौंध और तड़क-भड़क इसको प्रभावित नहीं कर पाईं और न ही इसे बहुत लोकप्रियता हासिल हुई है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है क्योंकि इस त्योहार को उच्च जातियों के लोग न के बराबर ही मानते हैं। शायद इसीलिए यह किसी पुस्तक या दस्तावेजों में भी दर्ज नहीं हो पाया है। यह आज भी निम्न जातियों के बीच में ही लोकप्रिय है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि यह कम खर्चीला त्योहार है और व्रत रहने या किसी बहुत ताम-झाम की जरूरत भी नहीं थी।

हालांकि यह तो नहीं कहा जा सकता कि समाज में महिलाओं का बहुत अच्छा स्थान था। पर इस त्योहार से पता चलता है कि उन्हें इस तरह के मौकों पर कुछ स्वच्छंदता तो जरूर मिल जाया करती थी जिसे वे किसी भी कीमत पर भुनाने में चूक न करना चाहती हों या जब वे अपने मन के गाने गा सकें, खेल खेल सकें और कुछ धमाल मचा सकें। महिलाओं द्वारा पुरुषों के कपड़े पहनना इस बात का प्रतीक हो सकता है कि महिलाएं यह देखना चाहती रही हों कि पुरुष के कपड़ों में वे कैसी लगती हैं और पुरुषों द्वारा अपने ऊपर के दबाव/शासन को कम करने का अहसास करना चाहती रही हों। इस दौरान वे जो गाने गातीं थीं उनमे न केवल ईश्वर भक्ति और अपनी व्यथा-कथा ही अपितु अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने की पीड़ा भी शामिल होती थी। ये भी हो सकता है कि अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने की पीड़ा का गीत पुरुषों की आधीनता या वर्चस्व से मुक्त होने का प्रतीक स्वरूप ही रहा हो।

हो सकता है कि इस त्योहार को निम्न जातियों द्वारा प्रमुखतया से मनाए जाने के कारण ही उच्च जातियों के लोग इसे न मनाना चाहते/मनाते रहे हों। यह बात भी दीगर है कि रंगने के बाद ढेड़िया का यह पात्र इतना सुन्दर लगने लगता है कि यह पात्र ‘फैंसी नाइट लैंप’ से किसी भी मायने में कम नहीं लगता है। अंधेरे में रखे जलते हुए ढ़ेडिया से निकलने वाली मद्धम रोशनी बहुत ही अच्छी दिखाई देती है। ढेड़िया में इस्तेमाल होने वाले पात्रों का न पकाया जाना इस बात का आभास कराता है कि लोग प्रकृति के कितने करीब थे कि बर्तनों को भी नहीं पकाते थे और इस तरह उसके निर्माण में मनुष्य की शारीरिक ऊर्जा के अतिरिक्त किसी भी प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता नहीं पड़ती थी, और नष्ट होने के तुरंत बाद ही वह पात्र पुनः मिट्टी में मिल जाता था।

यह कहा जा सकता है कि कुछ विसंगतियों के बावजूद भी यह त्योहार जहां एक तरफ भाई-बहन के असीम प्रेम का, बहन द्वारा भाई का ख़याल रखे जाने का और प्रकृति से मनुष्य के प्रेम का प्रतीक है तो वहीं दूसरी तरफ निम्न जातियों के आपसी सामंजस्य के आधार पर जीवन जीने का भी प्रतीक है। इस त्योहार को पढ़ी-लिखी महिलाएं भले न पसंद करती हों लेकिन उनमें से कुछ ने इसे अब लोक कला के मंच पर गाना शुरू कर दिया है। अब आवश्यकता यह है कि कृषि से जुड़े पूर्णरूप से इस प्राकृतिक त्योहार को नवउदारवाद के इस दौर में भी बजारवाद की भेंट चढ़ने से बचाया जा सके।

लेख एवं छाया चित्र: नरेन्द्र कुमार दिवाकर
अतिथि प्राध्यापक (समाज कार्य)
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
मो. 9839675023

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