हैदराबाद: खैरताबाद उपचुनाव में अहम मोड़ सामने आ रहा है। प्रमुख पार्टियां सोच रही हैं कि खैरताबाद उपचुनाव न हो तो अच्छा रहेगा। इन पार्टियों का मानना है कि अब उपचुनाव हुआ तो किसी को भी ज्यादा फायदा नहीं होगा। इसी बीच इस चुनाव पर कानूनी पेचीदगियां आने से सभी पार्टियां खुश नजर आ रहे हैं। पूर्व विधायक दानम नागेंदर के खिलाफ दायर याचिका पर फैसला सुनाने तक उपचुनाव न कराने की मांग को लेकर विजया रेड्डी के हाईकोर्ट जाने को सभी पार्टियों ने राहत की सांस ली। क्योंकि आम चुनावों से पहले उपचुनाव से खर्च के अलावा फायदा नहीं होगा।
विजया रेड्डी की याचिका
2023 में बीआरएस टिकट पर जीतकर, 2024 में हुए पार्लियामेंट चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर दानम नागेंदर के सिकंदराबाद एमपी के तौर पर चुनाव लड़ना दल-बदल के तहत आता है, ऐसा फैसला देते हुए हाईकोर्ट ने उन पर अयोग्यता की कार्रवाई की। उस फैसले को चुनौती देते हुए दानम सुप्रीम कोर्ट गए, वहां भी उनके खिलाफ फैसला आया। इसके साथ उच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर विधानसभा सचिव ने खैरताबाद निर्वाचन क्षेत्र 24 अप्रैल 2024 से खाली है, कहते हुए गजट जारी किया। वह गजट आते ही उपचुनाव तय है, ऐसा डर सभी पार्टियों को सताने लगा। लेकिन इस बीच विजया रेड्डी ने लंबित अपनी याचिका को हाईकोर्ट को याद दिलाने पर सभी प्रमुख पार्टियों ने खुशी जताई। उनकी याचिका से चुनाव रुक जाए तो अच्छा होगा, ऐसी वे मजबूती से कामना कर रही हैं।

सुप्रीम तक जाने के लिए विजया रेड्डी तैयार
2023 में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ीं विजया रेड्डी ने दानम नागेंदर का चुनाव वैध नहीं है, कहते हुए केस दायर किया। दानम ने अपने चुनावी हलफनामे में दर्ज मामले और संपत्तियों से जुड़े पूरे विवरण घोषित नहीं किए, इसलिए उनका चुनाव रद्द करके, दूसरे स्थान पर रहीं खुद को विधायक घोषित करने की मांग को लेकर याचिका दायर की। इस मामले की सुनवाई पूरी होने तक चुनाव में न जाने की बात चुनाव आयोग ने हाईकोर्ट को बताई। जल्द ही उससे संबंधित हलफनामा पेश करने के लिए तैयारी हो रही है। अगर हाईकोर्ट में खुद के खिलाफ नकारात्मक फैसला आता है, तो सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए विजया रेड्डी तैयार हैं।
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खर्चों से डर रहीं पार्टियां
आम चुनावों की तुलना में उपचुनावों का खर्च अधिक होता है। चुनावों में किसी भी तरह जीतने की चाहत से खर्च करना पड़ता है। पार्टी नेताओं और कैडर की जरूरतें पूरी करनी पड़ती हैं। किसी को कोई कमी न हो, इसका ध्यान रखना पड़ता है। चुनाव प्रचार को आकर्षक तरीके से चलाना पड़ता है। इन सब से बढ़कर वोटरों को आकर्षित करने के लिए किया जाने वाला पोल मैनेजमेंट बहुत अहम है। वोटरों के घर-घर जाकर दावतें देनी पड़ती हैं। शराब बांटनी पड़ती है। इसके साथ हर एक वोटर को नकद देना पड़ता है। महिलाओं को साड़ियां, रसोई का सामान गिफ्ट के तौर पर देना पड़ता है। ये सारे खर्च मिलाकर उपचुनाव खत्म होने तक हर एक प्रमुख पार्टी को औसतन 100 करोड़ रुपये तक खर्च होने की संभावना है। इसलिए उपचुनाव न आए तो अच्छा होगा, इस सोच में प्रमुख पार्टियां हैं।
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राजनीतिक फायदा शून्य
दो साल में विधानसभा चुनाव हैं। पार्टियां सोच रही हैं कि अब उपचुनाव आने से राजनीतिक रूप से होने वाला फायदा ज्यादा नहीं होगा। असल में उपचुनाव सत्ताधारी पार्टी के अनुकूल होते हैं। लेकिन बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। इतना खर्च करके जीतने पर भी, हारने पर भी दो साल में आम चुनावों के लिए तैयार होना पड़ता है। अगर विपक्ष जीत भी जाता है तो तुरंत सत्ताधारी पार्टी को तुरंत गद्दी से हटाना संभव नहीं है। आम चुनावों तक इंतजार करना पड़ेगा। इससे उपचुनाव क्यों, इस सोच में विपक्ष है।
