देश में छोटे व्यापारी से लेकर बड़े मॉल्स तक कैशलेस पेमेंट में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) सिस्टम में अहम बदलाव हुआ है। पिछले छह साल से चल रही पूरी तरह मुफ्त सेवा को खत्म करते हुए केंद्र सरकार ने अहम फैसला लिया है। बड़ी रकम वाले कारोबारी लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लगाते हुए केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने आदेश जारी किया है। ऐलान किया गया है कि 15 अक्टूबर से ये चार्ज लागू होंगे। बताया गया है कि हमेशा की तरह Person to Person (P2P) UPI लेन-देन मुफ्त ही रहेंगे। साथ ही, स्पष्ट किया गया है कि P2P के अलावा 2 हजार रुपये से कम के कारोबारी भुगतान (P to M) MDR के दायरे में नहीं आएंगे।
क्या है MDR?
डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया संभालने वाले बैंकों और नेटवर्क संस्थाओं को व्यापारियों द्वारा दिया जाने वाला शुल्क ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (MDR) कहलाता है। डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए 2020 से UPI को MDR से छूट दी गई थी। बैंक और पेमेंट कंपनियां दलील दे रही हैं कि हर महीने अरबों लेन-देन होने से सिक्योरिटी और सर्वर का रखरखाव बोझ बन गया है। इसलिए बड़ी रकम वाले लेन-देन पर सीमित MDR लगाने के मुद्दे पर NPCI कमेटी ने हाल ही में फैसला लिया है।

रोजमर्रा की सेवाओं पर फ्लैट चार्ज
रेलवे टिकट, टेलीकॉम रिचार्ज, इंश्योरेंस प्रीमियम, पेट्रोल/डीजल पंप पर भुगतान, बीज और खाद की खरीद पर विशेष रियायत दी गई है। इनमें 2 हजार रुपये से ज्यादा के लेन-देन पर फ्लैट 5 रुपये ही चार्ज लगेगा। बिजली, पानी, गैस जैसे सरकारी यूटिलिटी बिल, स्कूलों, यूनिवर्सिटीज की फीस के भुगतान पर भी यही 5 रुपये वाला नियम लागू होगा। वहीं, म्यूचुअल फंड, सिक्योरिटीज, स्टॉक ब्रोकर को किए जाने वाले भुगतान पर मामूली दो फीसदी MDR लागू होगा। इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये है। एसेट मैनेजमेंट कंपनियां, स्टॉक ब्रोकर, शेयरों की खरीद, डेट मार्केट, ब्रोकर वॉलेट टॉप-अप के लिए किए जाने वाले लेन-देन इस दायरे में आएंगे।
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नाम के लिए व्यापारियों पर UPI चार्ज, भार तो जनता पर ही पड़ेगा
फ्री UPI पेमेंट को मोदी सरकार के अलविदा कहे जाने के चलते एक तरफ व्यापारी तो दूसरी तरफ आम UPI यूजर्स भी डर रहे हैं। व्यापारियों पर लाया गया यह नया मर्चेंट चार्ज असल में बिजनेस कम्युनिटी के लिए बोझ ही है। व्यापारी कह रहे हैं कि पहले से ही इनकम टैक्स और GST भर रहे हैं, उस पर अतिरिक्त UPI पेमेंट चार्ज भी ढोना मुश्किल है। पहले से ही कम मार्जिन और ज्यादा कॉम्पिटिशन से बिजनेस धीमा पड़ा है। ऐसे समय पर मोदी सरकार ने एक और टाइम बम फोड़ा है।
दो गुटों में बंट गए हैं व्यापारी
केंद्र सरकार के UPI चार्ज के फैसले से व्यापारी दो गुटों में बंट गए हैं। कुछ व्यापारी सोच रहे हैं कि इन चार्ज को झेलना है तो अपने बिजनेस मार्जिन को उसी हिसाब से बढ़ाना पड़ेगा तो वस्तुओं-सेवाओं के दाम बढ़ाना सही रास्ता है। इससे सीधे तौर पर ग्राहकों पर बोझ पड़ता हुआ नहीं दिखेगा, लेकिन हकीकत में जनता की जेब पर ही अप्रत्यक्ष रूप से UPI पेमेंट चार्ज का बोझ पड़ेगा।

डिजिटल पेमेंट वेस्ट
वहीं दूसरे गुट के व्यापारी कह रहे हैं कि ये डिजिटल पेमेंट वेस्ट हैं, जब से ये आए हैं तब से हम कई परेशानियां झेल रहे हैं। कई लोगों ने अपनी दुकानों पर UPI पेमेंट लेना बंद करके कैश बिजनेस शुरू कर दिया है। देखने में एक होलसेल व्यापारी दिन में 50 हजार रुपये का बिजनेस करता है, लेकिन उसमें GST, टैक्स, दुकान का किराया, बिजली बिल, वर्करों की सैलरी जैसे ढेरों खर्चे होते हैं। बचे हुए थोड़े से पैसे पर फिर से UPI चार्ज के नाम पर सताना ठीक नहीं है। इसलिए हम सीधे कैश पेमेंट पर जा रहे हैं।
रुपये की वैल्यू गायब
एक जमाने में जब फिजिकल करेंसी इस्तेमाल होती थी, तब कोई व्यक्ति अपने पास मौजूद 100 रुपये खर्च करके कुछ भी खरीदता था, तो शाम तक 10 हाथ बदलने के बाद भी उस पैसे की वैल्यू 100 रुपये ही रहती थी। लेकिन अब सीन पूरी तरह बदल गया है। सुबह एक व्यक्ति 100 रुपये दुकान में खर्च करता है तो व्यापारी के हाथ में पहुंचते-पहुंचते उसकी वैल्यू 96 रुपये हो जाती है। वह बिजनेस पेमेंट के लिए उसे इस्तेमाल करे तो वह 96 रुपये की वैल्यू चार्ज की वजह से और गिर जाती है। ऐसे दस हाथ बदलते-बदलते सुबह के 100 रुपये की वैल्यू शाम तक कोई 80 या 70 रुपये रह जाती है। इस तरह पैसा हाथ बदलना बढ़ने के साथ उसकी वैल्यू जनता के हाथ में गायब होती रहती है, जबकि सरकारी खजाने में बिना कुछ किए ही टैक्स और चार्ज के रूप में धन की बारिश होती रहती है।
