बल्दिया में भ्रष्टाचार का बोलबाला, एक ही काम के लिए दो बार बिलों का भुगतान

हैदराबाद: जीएचएमसी में ठेकेदारों ने एक बार काम किया तो अधिकारियों ने दो बार बिलों का भुगतान कर दिया। इतना ही नहीं अतिरिक्त भुगतान भी किया। बल्दिया की आंतरिक जांच में सामने आया है कि दो साल से यह सिलसिला जारी है। इसके बाद विजिलेंस जांच का आदेश दिया गया तो पता चला कि बल्दिया के कर्मचारियों का ही यह काम किया है। इस मामले में जीएचएमसी फाइनेंशियल एडवाइजर शरत चंद्र, कंप्यूटर ऑपरेटर (आउटसोर्सिंग एम्प्लॉयी) तरुण की भूमिका होने की अधिकारियों ने पहचान की है। शरत चंद्र को जीएचएमसी से ट्रांसफर करके छोड़ दिया गया, जबकि तरुण को सेवा से हटा दिया गया।

पाया गया है कि 78 बिलों में 6.92 करोड़ रुपये का अंतर आया है। बल्दिया ने बताया है कि 74 बिलों में 6,83 लाख रुपये और 4 अन्य बिलों से 8 लाख रुपये डीडी के रूप में रिकवरी की है। यह प्रारंभिक पुष्टि ही है। ऑडिट में पूरी रकम सामने आने पर पूरी तरह रिकवरी करेंगे। अब से एक बार भुगतान किए गए ईआरपी वाउचर को दोबारा प्रोसेस न करने के लिए सिस्टम में बदलाव किए हैं। हालांकि, अटकलें सुनाई दे रही हैं कि लूटी गई रकम कुल मिलाकर भारी हो सकती है।

बिलों के भुगतान में गड़बड़ी करने वाले ऑफिसर को ट्रांसफर करना और कंप्यूटर ऑपरेटर को ड्यूटी से हटाकर मामला निपटाने पर आलोचनाएं हो रही हैं। ऑफिसर को सस्पेंड न करने, क्रिमिनल केस दर्ज न करने पर संदेह जताया जा रहा है। इसमें उच्च अधिकारियों की भूमिका पर भी चर्चा शुरू हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि फाइनेंशियल एडवाइजर के बिल फाइनल करने के बाद फंड्स रिलीज करने वाले फाइनेंस एडिशनल कमिश्नर बिना देखे ही बिल कैसे करते हैं। दो बार, अतिरिक्त बिल लेने वाले ठेकेदारों से सिर्फ रिकवरी ही की गई है, ब्लैक लिस्ट में डालकर, चीटिंग केस दर्ज करने की मांग उठ रही है।

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जीएचएमसी के पास फंड उपलब्ध न होने के समय ठेकेदारों को बिलों का भुगतान करने के लिए जीएचएमसी ट्रेड्स (ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम) नीति को दो साल पहले लाया गया था। इसके तहत बल्दिया की सिफारिश वाले ठेकेदारों को ही बैंक पहले बिलों का भुगतान करते हैं। काम करने के बाद बिल का ऑडिट पूरा होता है। बाद में फाइनेंस विभाग बिल को मंजूरी देकर कमिश्नर की अनुमति से ट्रेड्स में लिस्टिंग करता है। उन बिलों का भुगतान करने के लिए बैंक ब्याज दरों का प्रस्ताव रखते हैं। कम ब्याज देने वाले बैंकों से ठेकेदारों को बिल मिलते हैं। इसके लिए 18 बैंकों के साथ बल्दिया ने करार किया है।

अधिकारियों ने पाया है कि एक बार ट्रेड्स में लिस्टिंग हुए बिल को, बैंक की भुगतान प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही दोबारा ऑडिट, फाइनेंस विभाग लिस्टिंग करने से एक ही बिल के लिए दो बार पैसे मंजूर हुए। कमिश्नर के ट्रेड्स में बिल को लिस्टिंग करने की अनुमति देने के बाद बैंक के प्रस्ताव पर ठेकेदार के सहमत होने तक आम तौर पर 4 दिन लगते हैं। इसी अवधि में चालाकी से उसी ठेकेदार के बिल को एक बार फिर ऑडिट, फाइनेंस विभाग कमिश्नर की अनुमति के लिए भेज रहे हैं। जांच में सामने आया है कि इससे पहले से ही ट्रेड्स में मौजूद बिल ही फिर से लिस्टिंग होकर, दूसरी बार भुगतान हो रहा है। ट्रेड्स अपडेट के तहत यह भ्रष्टचारा का पता चला है।

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