देश में हाल ही में कॉर्पोरेट लोन के राइटऑफ और सेटलमेंट फिर से चर्चा में आए हैं। जी ग्रुप के संस्थापक और एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्र से संबंधित लोन सेटलमेंट इस चर्चा का सिर्फ एक संदर्भ है। असली सवाल किसी एक कंपनी से संबंधित नहीं है। लोग बैंकों में जमा करने वाले डिपॉजिट से बने फंड से बड़ी कॉर्पोरेट संस्थाओं को हजारों करोड़ रुपये लोन के रूप में दिये जा रहे हैं। उनमें से भारी रकम वापस न आए तो वह नुकसान सिर्फ बैंक के खातों में ही नहीं रह जाता। उसका असर आखिर में पूरी अर्थव्यवस्था पर, परोक्ष रूप से जनता पर ही पड़ता है। नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के इन बारह सालों में यानी 2014-15 से 2025-26 तक बड़ी इंडस्ट्रीज, सेवा क्षेत्र की संस्थाओं से संबंधित 9.95 लाख करोड़ रुपये के लोन बैंकों ने राइटऑफ किए हैं। 2018-19 में अकेले एक साल में 1,48,753 करोड़ रुपये के लोन राइटऑफ हुए। 2025-26 में यह रकम घटकर 20,485 करोड़ रुपये हो गई।
राइटऑफ का मतलब लोन माफी नहीं है
सा सरकार कह रही है कि राइटऑफ का मतलब लोन माफी नहीं है, लोन लेने वाले पर रिकवरी की कार्रवाई जारी रह सकती है। वह तकनीकी रूप से सच है। हालांकि, राइटऑफ की गई पूरी रकम वापस आ जाएगी, ऐसा नहीं है। 2021-22 से 2025-26 के बीच सरकारी बैंकों ने 3.57 लाख करोड़ रुपये राइटऑफ किए, उसमें से 1.65 लाख करोड़ रुपये ही रिकवर हुए। कहा जा रहा है कि पूरे बारह साल की अवधि में रिकवरी प्रतिशत 16 प्रतिशत से ज्यादा नहीं रहा। मतलब बाकी रकम पर अब उम्मीद छोड़नी ही पड़ेगी न!

गहराई से जांच न करने से ही समस्या
कॉर्पोरेट लोन लेना गलत नहीं है। इंडस्ट्रीज, निवेश, रोजगार के लिए बैंक लोन जरूरी ही हैं। हालांकि लोन देने से पहले कंपनी की वास्तविक आर्थिक स्थिति की गहराई से जांच न करने से ही समस्या आ रही है। लोन देने के बाद वह पैसा कहां जा रहा है, इसकी सख्ती से निगरानी करनी चाहिए। लेकिन यहां कई मामलों में ऐसा नहीं हो रहा है।
फंड्स को संबंधित ग्रुप कंपनियों में डायवर्ट
कॉर्पोरेट लोन फ्रॉडकॉर्पोरेट लोन फ्रॉड कई बार बैंक से पैसा ले जाने के क्षण में शुरू नहीं होता। पहले कागजों पर ही शुरू होता है। कंपनी की संपत्तियों की कीमत को वास्तविकता से ज्यादा दिखाना, कोलैटरल की वैल्यू को मार्केट वैल्यू से बढ़ाकर दिखाना, भविष्य की कमाई का ज्यादा अनुमान लगाना, कंपनी के कैशफ्लो को मजबूत दिखाना जैसे गलत तरीकों से एक संस्था को कागजों पर आर्थिक रूप से मजबूत दिखाया जा रहा है। उन आधारों पर भारी लोन लेने के बाद, जानबूझकर उन फंड्स को संबंधित ग्रुप कंपनियों में डायवर्ट करना, असली प्रोजेक्ट के लिए नहीं बल्कि दूसरी जरूरतों के लिए इस्तेमाल करना, संपत्तियों को दूसरी संस्थाओं को ट्रांसफर करना जैसे काम किए जा रहे हैं।
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एंड-टू-एंड अकाउंटेबिलिटी होनी चाहिए
एक आम आदमी 20 लाख रुपये का होम लोन लेकर एक-दो किस्तें लेट होने पर भी ब्याज, पेनाल्टी, क्रेडिट स्कोर, नोटिस का सामना करता है। आखिर में गिरवी रखी संपत्ति का कब्जा भी कुछ महीनों में ही हो जाता है। लेकिन हजारों करोड़ के लोन लेने वाले कॉर्पोरेट्स के मामले में रीस्ट्रक्चरिंग, रिजॉल्यूशन, सेटलमेंट कहते हुए सालों की प्रक्रिया चलती है। सच्ची बिजनेस फेल्योर के लिए कानूनी समाधान जरूरी ही है।
सुभाष चंद्र से संबंधित ताजा सेटलमेंट
हालांकि, धोखा करके लोन पाने वालों को भी भारी छूट मिले तो.. वह व्यवस्था में कमजोरी को बढ़ावा देना होगा। सुभाष चंद्र से संबंधित ताजा सेटलमेंट मामला भी खामियों को उजागर कर गया। भारी लोन क्यों दिए, उनके पीछे मौजूद वैल्यूएशन कितने वास्तविक हैं, फंड कहां गए, लोन एनपीए होने तक किसने निगरानी की, आखिर में बैंक को कितना वापस मिला, यही व्यापक रूप से जांचने वाली बात है।
सख्त एंड-टू-एंड अकाउंटेबिलिटी होनी चाहिए
कॉर्पोरेट लोन फ्रॉड को रोकना है तो लोन देने से पहले ही नहीं, लोन देने के बाद भी सख्त एंड-टू-एंड अकाउंटेबिलिटी होनी चाहिए। कोलैटरल के लिए स्वतंत्र वैल्यूएशन, बड़े लोन पर लगातार एंड-यूज मॉनिटरिंग, ग्रुप कंपनियों के फंड फ्लो पर नजर, अर्ली वार्निंग सिस्टम होना चाहिए। फ्रॉड साबित हो तो लोन लेने वाले के साथ ही संबंधित वैल्यूअर, ऑडिटर, मध्यस्थ या बैंक अधिकारी पर भी कार्रवाई जरूरी होनी चाहिए। जवाबदेही न हो तो कुछ लोगों के बिजनेस फेल्योर या गड़बड़ियों को छुपाकर, आखिर में वह नुकसान जनता के सिर पर डालने वाली व्यवस्था के रूप में यह बदल जाएगी।
बैंकिंग व्यवस्था में विफलता
हजारों करोड़ का लोन मंजूर करने से पहले वैल्यूएशन किसने किया? कोलैटरल वैल्यू किसने तय की? कंपनी के कैशफ्लो को किसने जांच की? ग्रुप कंपनियों के लेन-देन को किसने देखा? लोन देने के बाद फंड के इस्तेमाल की निगरानी किसने की? इन सवालों के जवाब चाहिए। बैंक हजारों करोड़ का लोन देते समय कागजों के पीछे की सच्चाई को पहचान न पाए, तो वह सिर्फ बिजनेस फेल्योर नहीं है। बैंकिंग व्यवस्था की विफलता भी है।
पहचानने वाली व्यवस्था जरूरी है
आरबीआई भी लोन फ्रॉड के नियंत्रण में अर्ली वार्निंग सिग्नल्स, रेड फ्लैगिंग, डेटा एनालिटिक्स, एंड-यूज मॉनिटरिंग, इंटरनल कंट्रोल्स, स्टाफ अकाउंटेबिलिटी जैसे पहलुओं को महत्व दे रहा है। 2024-25 में बैंकिंग व्यवस्था में वैल्यू के हिसाब से दर्ज फ्रॉड में 92.1 प्रतिशत लोन पोर्टफोलियो से संबंधित ही होना भी समस्या की गंभीरता दिखा रहा है। इसलिए लोन एनपीए होने के बाद कार्रवाई करने से ज्यादा धोखा होने से पहले ही पहचानने वाली व्यवस्था जरूरी है। (तेलुगु दैनिक वेगुलु 1 सितंबर अंक से साभार)

– श्रीनिवास गौड़ मुद्दम
