कादम्बिनी क्लब की 407 वीं मासिक गोष्ठी का शानदार आयोजन, कहानी संग्रह ‘वक्त महल’ के लेखक ने बताई राज की यह बात

हैदराबाद : कादम्बिनी क्लब हैदराबाद के तत्वावधान में क्लब की 407वीं मासिक गोष्ठी का आयोजन 21 जून को अवधेश कुमार सिन्हा (संगोष्ठी सत्र संयोजक, नई दिल्ली) की अध्यक्षता में गूगल मीट पर किया गया। प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी देते हुए मीना मुथा (कार्यकारी अध्यक्ष) एवं प्रवीण प्रणव (महासचिव) ने संयुक्त रूप से बताया कि प्रथम सत्र का आरंभ शुभ्रा मोहन्तो द्वारा सस्वर सरस्वती वंदना की प्रस्तुति से हुआ।

मीना मुथा ने क्लब की संक्षिप्त जानकारी देते हुए कहा कि इसी माह 2 जून को कादम्बिनी कल्ब ने 33वें वर्ष में कदम रखा है और संस्थापिका डॉ अहिल्या मिश्र द्वारा सिंचित इस वृक्ष को सभी का साथ लेकर वटवृक्ष में हम सबको रूपांतरित करना है। साहित्य के प्रति कटिबद्ध रहते हुए क्लब की निरंतरता को जारी रखना है। उन्होंने सूचित किया कि प्रथम सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार प्रबोध कुमार गोविल (साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, जयपुर) अपनी कहानी संग्रह “वक्त महल” पर बात रखेंगे और संगोष्ठी सत्र सह संयोजक प्रवीण प्रणव विषय प्रवेश कराएंगे।

प्रवीण प्रणव ने मुख्य वक्ता प्रबोध कुमार गोविल का परिचय देते हुए कहा कि आपने साहित्य की लगभग हर विधा में लेखन किया है। कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा – खंड, जीवनी आदि इनकी कृतियाँ प्रकाशित हैं। कई उच्च सम्मानों से आप विभूषित हैं। कई संदर्भों में डॉ अहिल्या मिश्र के साथ आपके साहित्य और आपके बारे में सुना बहुत था पर रूबरू आज पटल पर भेंट हो रही है। आज आप कहानी संग्रह “वक्तमहल’ पर अपनी बात रखेंगे। लेखक से उनके साहित्य के बारे में जानना सुखद अनुभव होता है। तत्पश्चात कहानी संग्रह पर प्रकाश डालने हेतु प्रबोध कुमार गोविल को प्रवीण प्रणव ने आमंत्रित किया।

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मुख्य वक्ता प्रबोध कुमार गोविल ने क्लब से जुड़ने पर हर्ष की अनुभूति महसूस करते हुए कहा कि “वक्त महल”” 6 लंबी कहानियों का संग्रह है। उन्होनें कहानी, उपन्यास, लघुकथा को परिभाषित करते हुए कहा कि कहानी एक घटना पर आधारित होती है जबकि उपन्यास पूरे परिवेश, कालखंड को समाविष्ट करता है। संग्रह की शीर्षक कहानी “वक्त महल” राजस्थान के सत्य घटना से प्रेरित है। एक बालक इंग्लैड जाता है, लौटते वक्त मित्र को भारत ले आता है। रोज डायरी लिखने की उसकी आदत थी जिसमें वह शाही परिवार के तौर तरीके, महलों का रखरखाव, राजस्थान की सांस्कृतिक वैभव, व्यवहार, खूबियाँ-खामियाँ, सतीप्रथा, पर्दा प्रथा आदि उस बालक ने जो निरीक्षण किया उसे अपनी डायरी में शब्दांत किया। वापस जाते वक्त वह डायरी लेकर जाना भूल गया। वर्षों बाद सेवकों को जब वह डायरी मिली तब उसे पढ़ा गया। कहानी रोचक है। इसके अतिरिक्त जुनून, हँसता क्यों है पागल, त्रास खनन, थोडी देर और ठहर, कपास का भूत आदि विभिन्न कहानियों के बारे में भी उन्होंने संक्षिप्त में बताया। उन्होंने कहा कि सभी कहानियों का विषय और तेवर भिन्न-भिन्न हैं। अलग अलग अनुभवों और समय पर आधारित है। पुरातन समय और विज्ञान का समिश्रण भी आप इसमें देख पाएंगे।

पटल की ओर से धीरेंद्र कुमार झा,, मीरा ठाकुर, सरिता सुराणा, आर्या झा ने उनके साहित्य से जुड़े कुछ प्रश्न पूछे जिनका जवाब गोविल ने दिया। अवधेश कुमार सिन्हा ने उत्सुकता दर्शाते हुए पूछा कि विभिन्न सेवाओं में आप रहें, रचनाक्रम के लिए विशाल अनुभवों का होना आवश्यक है क्या? गोविल ने कहा कि विगत 60 वर्षों में विभिन्न शहरों में, विभिन्न कार्यक्षेत्रों में पदासीन रहा हूँ, कई यात्राएँ की है। अतः अनुभव का दायरा विस्तृत होने से लेखन में भी विभिन्नता और परिपक्वता आती गई।

अवधेश कुमार सिन्हा ने अध्यक्षीय टीप्पणी में कहा कि कहानियों के बारे में मात्र सुनकर जिज्ञासा हो रही है कि कब इन्हें पढ़े। लेखक 200 वर्ष पीछे चले जाते हैं फिर वैज्ञानिक धरातल पर भी आ जाते हैं। यह गोविल के लेखन की विशेष खूबी है। निश्चित ही प्रबोध कुमार से भेंट कर हमें सुखद अनुभूती हुई है। सत्र का संचालन करते हुए प्रवीण प्रणव ने मुख्य वक्ता के प्रति आभार व्यक्त किया।

दूसरे सत्र में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। सत्र की अध्यक्षता डॉ इंदू सिंह ने की। भावना पुरोहित, उषा शर्मा, सुषमा त्रिपाठी, दीपक दीक्षित, दर्शन सिंह, रवि वैद, चंद्र प्रकाश दायमा, रमा बहेड, विनोद गिरी अनोखा, डॉ क्षमा कौशिक, मनोरमा शर्मा, कमल राठी, गजानन पांडे, सुनीता लुल्ला, आर्या झा, मीरा ठाकुर, धीरेंद्र कुमार झा, प्रबोध कुमार गोविल, डॉ आशा मिश्र “मुक्ता”, मीना मुथा ने काव्यपाठ किया।

इंदु सिंह ने अध्यक्षीय काव्य पाठ किया और सभी रचनाकारों को साधुवाद दिया। क्लब का साथ बनाएं रखें यह कामना भी की। तृप्ती मिश्रा, चंद्रलेखा कोठारी, सत्यनारायण काकडा, श्रुतिकान्त भारती, इंदुशेखर त्रिपाठी, शांति अग्रवाल, डॉ स्वाति गुप्ता, डॉ सुषमा देवी और वर्षा शर्मा की उपास्थिती रही। सत्र का धन्यवाद डॉ आशा मिश्र “मुक्ता” ने दिया। तकनीकी सहयोग प्रवीण प्रणव ने दिया। मीना मुथा ने कार्यक्रम का संचालन किया। सभी ने योग दिवस और पितृ दिवस पर एक दूसरे को शुभकामनाएँ दी।

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