आज विश्व जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें संवेदनाएँ मानो युद्ध और राजनीति के शोर में कहीं दब-सी गई हैं। ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध को लेकर महीनों बीत चुके हैं। मानवता की निर्मम हत्या हो रही है, परंतु विश्व का एक बड़ा हिस्सा मौन प्रतीत होता है। समय फिर भी रुकता नहीं; प्रकृति अपने नियमों के अनुसार चलती रहती है। जीवन गतिमान है, इसलिए भूख, प्यास, नींद, सृजन और संघर्ष—सब समानांतर रूप से चलते रहते हैं। जीवन है तो समस्याएँ भी होंगी। भले ही हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्श को व्यवहार में पूरी तरह न उतार पाए हों, किंतु प्रकृति का प्रत्येक कण परस्पर जुड़ा हुआ है।
ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के प्रभाव ने यह बात पुनः स्पष्ट कर दी है। गैस और पेट्रोल जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर संकट गहराया तो पूरा विश्व प्रभावित हुआ। होर्मुज़ जलडमरूमध्य का नाम, जिसे शायद पहले बहुत कम लोग जानते थे, आज वैश्विक चर्चा का विषय बन गया है। हाल ही में अमावस्या पूजन हेतु मंदिर जाना हुआ। वहाँ ज्ञात हुआ कि ‘भोग वितरण’ अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। कारण वही—गैस की समस्या। उस क्षण मन में प्रश्न उठा कि जब आज ‘मेड इन इंडिया’ का नारा इतनी दृढ़ता से बुलंद किया जा रहा है, तब भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आंशिक अथवा पूर्ण आत्मनिर्भर बनने की दिशा में और गंभीरता से प्रयास क्यों नहीं करने चाहिए?
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बचपन में पढ़ा था कि गोबर से गैस बनाई जा सकती है। इस विषय पर एक सहकर्मी से चर्चा हुई। उस युवा ने कहा—“मैडम, मुझे इसे बनाना आता है, पर संसाधनों की कमी है।” उसकी बात सुनकर मन में विचार आया कि कमी केवल संसाधनों की ही नहीं, बल्कि ज्ञान, जागरूकता और सामूहिक चेतना की भी है। कोरोना काल ने हमें डिजिटल और ऑनलाइन माध्यमों से जोड़ दिया। संभव है कि वर्तमान वैश्विक संकट भारत को अपने पारंपरिक एवं स्वदेशी ऊर्जा स्रोतों की ओर पुनः उन्मुख करे। यदि इस बहाने ईंधन उत्पादन, वैकल्पिक ऊर्जा और स्थानीय संसाधनों पर आधारित नए विषयों एवं तकनीकों का विकास हो, तो ‘मेड इन इंडिया’ केवल एक नारा न रहकर वास्तविक आत्मनिर्भरता का सशक्त प्रतीक बन सकता है।
डॉ. सुपर्णा मुखर्जी
हैदराबाद
संपर्क-96032 24007
