हैदराबाद : कादम्बिनी क्लब हैदराबाद के तत्त्वावधान में 19 अप्रैल को क्लब की 405वीं मासिक गोष्ठी का आयोजन ऑनलाइन गूगल मीट पर संपन्न हुआ। प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी देते हुए कार्यकारी अध्यक्ष मीना मुथा एवं महासचिव प्रवीण प्रणव ने आगे बताया कि प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ मंजु रुस्तगी (डॉ अहिल्या मिश्र सम्मान 2025 से सम्मानित, चेन्नई निवासी) ने की। मीना मुथा ने पटल पर उपस्थित सभी गणमान्य साहित्यकारों का शब्दकुसुमों से स्वागत करते हुए शुभ्रा मोहन्तो को सरस्वती वंदना प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया।
तत्पश्चात संगोष्ठी सत्र का आरंभ करते हुए प्रवीण प्रणव ने कहा कि आज मुख्य वक्ता के रूप में प्रबुद्ध साहित्यकार अनिल कुमार झा (देवघर, झारखंड) हमारे बीच उपस्थित हैं। इनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं। झा जी कविता, कहानी, रेडिओ-नाटक, आलोचना आदि लेखन के जानेमाने हस्ताक्षर हैं। आज वे हमें नवगीत के विषय में हमें बतायेंगे।
अनिल कुमार झा ने अपने वक्तव्य में कहा कि अहिंदी भाषी क्षेत्र में कादम्बिनी क्लब की लंबी यात्रा निश्चय ही सराहनीय है। मैं क्लब के संस्थापक अध्यक्ष डॉ अहिल्या मिश्र व उनकी- टीम को साधुवाद देता हूँ। नवगीत के संबंध में बताते हुए उन्होंने आजादी के पूर्व और बाद के साहित्यिक मानसिकता की चर्चा की। भारतेंदु, द्विवेदी और फिर छायावाद आया तो पश्चिमी क्षेत्र में रूमानियत का बोलबाला हुआ। 1950 में नवगीत के नाम पर गीत छपा। गीत में हम अपने मनोभावों को व्यक्त करते हैं। गीत अंदर से निकलता है और बाहरी परिवेश में समा जाता है। गीत में संक्षिप्तता होती है। हम जीवन के लिए काव्य रचना करते-करते कविता की परिभाषा ही भूल गए। मुक्त छंद आया फिर छंदमुक्त और सपाट बयानी आने लगी।
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उन्होंने आगे कहा कि हर नवगीत गीत है पर हर गीत नवगीत नहीं है। नवगीत लोकप्रिय विधा के रूप में लोकप्रिय शैली है। तत्परता, तन्मयता, इमानदारी से इसमें लिखा जा रहा है। इसमें अंग्रेजी, संस्कृत, लोक भाषाओं से शब्द ले सकते हैं। नवगीत में अभिव्यक्ति की संभावना अधिक है। आनेवाला समय नवगीत का है। उन्होंने नवगीतकार रमेश रंजक की कुछ पंक्तियों के साथ नवगीत का उदाहरण दिया। दर्शन सिंह, मीरा ठाकुर आदि ने अपनी शंकाओं का समाधान उनसे प्रश्न पूछकर किया।
डॉ मंजु रुस्तगी ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि गीत और नवगीन के बीच के अंतर को बहुत अच्छी तरह से अनिल कुमार ने समझाया है। नवगीत में आधुनिक और समसामायिक विषयों को उठाया जाता है रूपक का प्रयोग किया जाता है अतः क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग कम होता है। यह समष्टिपरक समग्रता को लेकर चलता है। कविता का मूलभाव संवेदना होता है। गीत में मुखड़ा और अंतरा आवश्यक है, नवगीत में मुखडा नहीं हो तो भी चलेगा। कुँवर बेचैन की पंक्तियों के साथ डॉ मंजू ने अपने शब्दों को विराम दिया। संगोष्ठी सत्र संयोजक प्रवीण प्रणव ने सत्र का संचालन करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।
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दूसरे सत्र में कवि गोष्ठी का आयोजन अनिल कुमार झा की अध्यक्षता में हुआ। इसमें उषा शर्मा, आर्या झा, डॉ सुरभि दत्त, मीरा ठाकुर, प्रियंका पांडे, जी परमेश्वर, दर्शन सिंह, डॉ मंजू रुस्तगी, डॉ रमा बहेड़, उमा सोनी, डॉ राशि सिन्हा, अंशु श्री सक्सेना, रेखा अग्रवाल, शिल्पी भटनागर, मोहिनी गुप्ता, डॉ स्वाति गुप्ता, निधि झा, डॉ आशा मिश्र मुक्ता, प्रवीण प्रणव, प्रियंका पांडे, भावना पुरोहित, मीना मुथा ने काव्यपाठ किया। अनिल कुमार झा ने अध्यक्षीय काव्यपाठ में नवगीत सुनाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया और सभी रचनाकारों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। पटल पर शांति अग्रवाल, चंद्रलेखा कोठारी, डॉ मधु भटनागर, डॉ सुपर्णा मुखर्जी, डॉ सुषमा देवी, दीपक कुमार दीक्षित, मुखविंदर सिन्हा, सरिता दीक्षित, लता-चौहान, की उपस्थिति रही।
डॉ आशा मिश्र ‘मुक्ता’ (कोषाध्यक्ष) ने कार्यक्रम में उपस्थित होने व सहयोग के लिए सभी के प्रति आभार व्यक्त किया एवं डॉ मंजु एवं आलोक कुमार का विशेष आभार व्यक्त किया गया। शुभ्रा मोहंतो को सरस्वती वंदना प्रस्तुति एवं शिल्पी भटनागर को तकनीकी सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया तथा प्रवीण प्रणव एवं मीना मुथा को सत्र संचालन हेतु कृतज्ञता व्यक्त की।
