वर्तमान समय में महिला सशक्तिकरण की चर्चा प्रायः आरक्षण तक सीमित होकर रह जाती है। निस्संदेह, आरक्षण ने महिलाओं को प्रतिनिधित्व और अवसर प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। परंतु वर्ष 2026 के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है कि क्या केवल आरक्षण ही पर्याप्त है? एक शिक्षिका के रूप में, जब मैं अपने छात्र-छात्राओं के बीच इन विषयों पर संवाद करती हूँ, तो बार-बार यह अनुभव होता है कि वास्तविक सशक्तिकरण के लिए केवल अवसर नहीं, बल्कि एक सुरक्षित, संवेदनशील और सहयोगी वातावरण का निर्माण अधिक आवश्यक है।
यदि हम वर्तमान स्थिति पर दृष्टि डालें, तो कई चिंताजनक तथ्य सामने आते हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार भारत में लगभग 70–75 फीसदी शिक्षित महिलाएँ संतानोत्पत्ति के बाद अपने कॅरियर से दूरी बना लेती हैं, और इनमें से बड़ी संख्या लंबे समय तक कार्यक्षेत्र में वापस नहीं लौट पाती। कुछ सर्वेक्षणों में यह भी पाया गया है कि लगभग 48 फीसदी महिलाएँ मातृत्व अवकाश के कुछ ही समय बाद नौकरी छोड़ देती हैं। कक्षा में पढ़ाने के दौरान जब छात्राएँ अपने भविष्य को लेकर सवाल करती हैं, तो यह आंकड़े केवल तथ्य नहीं, बल्कि एक वास्तविक चिंता के रूप में सामने आते हैं। मेरी छात्राएँ आजकल कहती हैं, विवाह एक बोझ है’। मेरे छात्र जब यह कहते हैं कि ‘महिला आरक्षण ने नौकरी के क्षेत्र में उनकी चुनौतियों को बढ़ा दिया है’। जब वे पूछते हैं, ‘एक पढ़ी-लिखी लड़की को आरक्षण की क्या आवश्यकता है? तब मैं सोचती हूँ कि आरक्षण के नाम पर देश की युवा पीढ़ी का भविष्य किस ओर जा रहा है? महिला और कामकाजी महिला होते हुए जब मैं अपने चारों तरफ देखती हूँ तो मुझे लगता है- सबसे पहले, महिलाओं के स्वास्थ्य की बात करना अत्यंत आवश्यक है।
व्यवहार में अक्सर देखा जाता है कि घर और कार्यस्थल दोनों जगह महिलाओं के पोषण को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिलती। कई बार महिलाएँ स्वयं भी परिवार की जिम्मेदारियों के कारण अपने स्वास्थ्य को पीछे रख देती हैं। एक शिक्षक होने के नाते मैं यह महसूस करती हूँ कि जब तक हम अगली पीढ़ी को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं बनाएंगे, तब तक सशक्त समाज की कल्पना अधूरी रहेगी। एक स्वस्थ महिला ही सशक्त समाज की आधारशिला बन सकती है— इस तथ्य को हमें व्यवहार में उतारना होगा।
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दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है— सुरक्षित और स्वच्छ शौचालयों की उपलब्धता। नव मातृत्व को प्राप्त महिलाओं के लिए स्तनपान कराने के कक्षों की व्यवस्था होनी ही चाहिए। ये केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा और स्वास्थ्य से जुड़ा मूलभूत अधिकार है। कई बार छात्राओं से बातचीत के दौरान यह बात सामने आती है कि सार्वजनिक स्थानों पर इस मूलभूत सुविधा का अभाव उनकी स्वतंत्रता को सीमित करता है। कैसी विडम्बना है हमारे बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, मौल्स आदि कहीं भी ऐसी सुनियोजित व्यवस्था आज भी दिखाई नहीं देती। क्या ये विषय महिला आरक्षण से कम महत्वपूर्ण है?
तीसरा, मासिक चक्र के दौरान महिलाओं को आवश्यकता अनुसार बिना वेतन कटौती के अवकाश मिलना चाहिए। यह किसी प्रकार की विशेष रियायत नहीं, बल्कि एक जैविक आवश्यकता है। इसी संदर्भ में Supreme Court of India की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी भी उल्लेखनीय है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि मासिक अवकाश को कानून द्वारा अनिवार्य बनाना उपयुक्त नहीं होगा, क्योंकि इससे महिलाओं के रोजगार अवसर प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही, न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि इस प्रकार की नीतियाँ स्वैच्छिक रूप से अधिक प्रभावी ढंग से लागू की जा सकती हैं।
एक शिक्षक के रूप में मेरा मानना है कि इस विषय पर जागरूकता और संवेदनशीलता विकसित करना उतना ही आवश्यक है, जितना कि महिला आरक्षण को लेकर नीति निर्माण। इसी प्रकार, यौन अपराधों की परिभाषा को लेकर भी समाज में कई भ्रांतियाँ व्याप्त हैं। “without penetration it’s not rape” जैसी धारणाएँ अक्सर अधूरी समझ पर आधारित होती हैं। वास्तव में, Indian Penal Code Section 375 के अंतर्गत बलात्कार की परिभाषा में “penetration” एक आवश्यक तत्व है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि बिना penetration के किया गया कृत्य अपराध नहीं है। ऐसे मामलों को अन्य गंभीर यौन अपराधों के रूप में सख्ती से दंडनीय माना गया है।
इस विषय में Bombay High Court के एक निर्णय ने विवाद उत्पन्न किया था, जिसे बाद में Supreme Court of India ने व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए स्पष्ट किया कि कानून की व्याख्या उसके उद्देश्य—विशेषकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा—को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। इन विषयों पर विद्यार्थियों के साथ चर्चा करते समय यह अनुभव होता है कि सही जानकारी और संवेदनशील दृष्टिकोण, दोनों ही समान रूप से आवश्यक हैं। जितना शोर मीडिया ‘महिला आरक्षण बिल’ को लेकर मचा रही है, सरकार खुद भी विशेष वार्ता देने आ गई। सरकार, क्या आपको नहीं लगता कि आप भी चुनावी खेल ही खेल रहे हैं महिलाओं की गरिमा को लेकर?
चौथा, कार्यस्थलों पर मातृत्व अवकाश की पर्याप्त और प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। केवल नीति निर्माण ही नहीं, बल्कि उसका सही क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक है। एक माँ को अपने नवजात शिशु के साथ समय बिताने का अधिकार मिलना चाहिए, क्योंकि यह न केवल उसके स्वास्थ्य बल्कि बच्चे के समुचित विकास के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी के साथ अगर वाकई में महिलाओं को लेकर सरकार और संसद चिंतित हैं तो फिर काम करने का तरीका बदलें। कामकाजी माताओं के लिए कार्यालयों में क्रेच (बाल देखभाल केंद्र) की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। यह व्यवस्था न केवल महिलाओं को मानसिक रूप से सशक्त बनाती है, बल्कि उन्हें अपने कार्य और मातृत्व के बीच संतुलन स्थापित करने में भी सहायता करती है। एक शिक्षिका के रूप में मैं यह भी देखती हूँ कि ऐसी व्यवस्थाएँ समाज में रोजगार के नए अवसर उत्पन्न कर सकती हैं और सामाजिक संरचना को अधिक सहायक बना सकती हैं।
अंततः यह स्पष्ट है कि महिला सशक्तिकरण को केवल आरक्षण तक सीमित करना एक अधूरा दृष्टिकोण है। आधी आबादी को आरक्षण की भीख मत दीजिए। वास्तविक सशक्तिकरण तब संभव है जब महिलाओं को सुरक्षित वातावरण, स्वास्थ्य सुविधाएँ, सम्मानजनक कार्यस्थल और संतुलित जीवन जीने के अवसर मिलें। एक शिक्षक होने के नाते मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि यदि हम अपनी सोच और नीतियों दोनों में परिवर्तन लाएँ, तो आने वाली पीढ़ी को एक अधिक न्यायपूर्ण और सशक्त समाज मिल सकता है।

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी
हैदराबाद
संपर्क- 96032 24007
