केंद्रीय हिंदी संस्‍थान: डॉ सूर्यबाला के उपन्यास ‘कौन देश को वासी : वेणु की डायरी’ पर हुई सारगर्भित परिचर्चा

सर्वविदित है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य, संगीत और कला के बिना पूंछविहीन पशु की संज्ञा दी जाती है। साहित्य ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है। सत साहित्य सत्य का संधान कराता है। साहित्यकार अपने अनुभव के आंच की तपन से साक्षात्कार कराता है और आनंद की अनुभूति तक ले जाता है। गत तीन वर्षों से प्रत्येक रविवार को आयोजित होने इस कार्यक्रम में आज की शाम प्रख्यात साहित्यकार सूर्यबाला के उपन्यास ‘कौन देश को वासी : वेणु की डायरी’ पर विद्वानों द्वारा परिचर्चा की गई।

हैदराबाद: केंद्रीय हिंदी संस्‍थान, अंतरराष्‍ट्रीय सहयोग परिषद तथा विश्‍व हिंदी सचिवालय के तत्‍वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार की ओर से हिंदी साहित्य मंथन श्रृंखला के अंतर्गत ‘प्रख्यात साहित्यकार डॉ सूर्यबाला के उपन्यास ‘कौन देश को वासी : वेणु की डायरी’ पर परिचर्चा का आयोजन किया गया।

आरंभ में भोपाल से साहित्यकार डॉ जवाहर कर्नावट द्वारा बड़े ही संयत भाव और मधुर वाणी में कार्यक्रम की सारगर्भित पृष्ठभूमि रखी गई। उन्होंने बताया कि हम सहयोगी संस्थाओं के साथ मर्यादा और मूल्यों सहित गत तीन वर्षों से शनैः शनैः चलते रहे और लगभग एक हजार अतिथि विद्वानो के सहयोग से लगभग साढ़े तीन सौ ज्ञानवर्धक कार्यक्रम आयोजित हुए। इसमें प्रवासी साहित्यकारों की बहुत बड़ी भूमिका रही। इस कड़ी में साहित्य मंथन के अंतर्गत आज प्रख्यात साहित्यकार सूर्यबाला जी के नए उपन्यास पर परिचर्चा है। विश्व हिन्दी सम्मान से सम्मानित डॉ कर्नावट ने साहित्यकार सूर्यबाला जी के साथ सभी साहित्यकारों, अतिथियों, वक्ताओं और श्रोताओं का स्वागत और उपलब्धि पर आभार व्यक्त किया।

अपनी मधुर और मर्मस्पर्शी वाणी में परिचर्चा का बखूबी संचालन करती हुई साहित्यकार अलका सिन्हा ने कहा कि सृजन के क्षणों में मनुष्य अर्ध समाधि की अवस्था में होता है। साहित्यकार समाज की सच्चाई को उजागर करता है और सबके कल्याण के लिए साहित्य सृजन करता है। साहित्यकार सूर्यबाला जी कालजयी रचनाकार हैं। उन्होंने वक्ताओं को सन्नद्ध करते हुए आदर सहित बारी बारी आमंत्रित किया।

तत्पश्चात हिन्दी व अंग्रेज़ी की मशहूर साहित्यकार प्रत्यक्षा जी ने उपन्यास के भीतर अंतर्वस्तु पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कथानक में भावात्मक लगाव है। ऐसा लगता है कि यह हम सबके अपने जीवन की ही झीनी-झीनी कहानी है। अतएव पढ़ते समय तादात्म्य स्थापित हो जाता है। वेणु की कहानी यूनिवर्सल है। हममें से अधिकांश के बच्चे विदेश में पढ़ने, कॅरियर बनाने या नौकरी करने जाते हैं। हम लालसाओं के चक्रवात में फँस जाते हैं। क्या यह अपने देश में रहकर संभाव्य नहीं है? कई बार जीवन छूंछा नजर आने लगता है।

भारत छूटने का त्रास होता है। यह बेहतर जीवन का दिमागी कीड़ा बन गया है। इस उपन्यास में सभी पात्रों के चरित्र बहुत सबल हैं। बेटू और सैंड्रा आदि भारत आने की योजना बनाते हैं। यह न केवल विस्थापन बल्कि मूल्यों के विस्मृत होने की भी कहानी है। इस उपन्यास में दो पीढ़ियों के अनुभव के दार्शनिक कालखंड है जिसमें सूर्यबाला जी के विशद अनुभव के तत्व मोतियों की तरह बिखरे हैं। इसे पढ़ने के बाद हम अमीर बन जाते हैं।

मुख्य वक्ता के रूप में पधारे पद्मश्री डॉ ज्ञान चतुर्वेदी जी ने कहा कि लगभग 400 पृष्ठों की यह बहुत बड़ी किताब है। काश यह मैं लिख पाता। इसके आने से साहित्य जगत में कुछ समय के लिए सन्नाटा छा गया। उन्होने कहा कि आदरणीया सूर्यबाला जी का समूचा साहित्य मैंने पढ़ा है और 25 पृष्ठों का लंबा साक्षात्कार भी लिया है जो प्रकाशित भी हुआ। उनमें कहानी कला जिंदा है। प्रवासियों पर बहुत लिखा गया है किन्तु यह उपन्यास नितांत भिन्न है। इसका द्वंद जड़ों की तरफ लौटाता है। इसमें उपन्यास लेखन की कार्यशाला अंतर्निहित है तथा समय -काल को पकड़ने की कला व समझ है।

अपनी बात कहने का बेहतरीन सलीका है। इसमें परकाया प्रवेश की कला है। किस्सागोई को धीमी आंच पर पकाया गया है। पहले से आखिरी पृष्ठ तक कला की सुगंध है जिससे पौष्टिक अवलेह मिलता है जो लेखकों को सीखने के लिए बहुत उपयोगी है। यह सूर्यबाला जी का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है। हम सबको इसे अवश्य पढ़ना चाहिए। यह अद्भुत कृति अचर्चित रह गई है।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त विदुषी डॉ चन्द्रकला त्रिपाठी ने कहा कि यह उपन्यास बहुत विस्तृत है। इसमें कहीं भी काट छांट की गुंजाइश नहीं है। कथ्य एवं कथानक आदि सभी को एक नाभिक शक्ति मिलती है। किसी भी विषय को दोहराया नहीं गया है। इसे पढ़ने के बाद स्थापित चीजें हिलने लगती हैं। इसके दो नाम ‘वेणु की डायरी और कौन देश को वासी’ स्वतः स्पष्ट हैं। इस उपन्यास के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं। 1- लेखिका द्वारा सटीक इतिहास विवेचन 2- पुराने और नए भारत का समालोचनात्मक नजरिया। वेणु यानी वेणु माधव शुक्ला का एक ही आकाशदीप है – वेणु। इसमें एक नहीं कई वेणुओं की कथा है। हमारा समय बुद्धि को संसाधन में बदलने वाला है।

अमेरिका में वेणु की प्रतिभा का परवान चढ़ा और मूल अमेरिकियों को धकेलकर आगे बढ़ा। वेणु का प्रवासन के बाद संस्थापन एक नियति की तरह है और उसके बाद आत्म निर्वासन होता है। इसमें नास्टेल्जिया मदद नही करती। प्रायः अमेरिका अपने डालर से दूसरों के वजूद को निगल जाता है। इस उपन्यास में सधी कलम से स्मृतियाँ दाखिल हैं। अपने लिखे हुए में कई संघनित रूपक हैं। जैसे थोर्न पक्षी। दूरियाँ अलंघ्य हैं। वह कहता है– मैं बहुत दूर आ गया, वापसी में बड़ी थकान होगी। पिता के भीतर भारत जड़ें जमाये हुए है। लेखिका खुद अमेरिका रहीं लेकिन कोमल कोना भारत में रहा। इस उपन्यास के 9 खंड विस्तार लिए हुए हैं जिनके सार तत्व को लेखिका ने बड़े जतन से संभाला है। अब हमारा जो समय है वह मुनाफे के आकाश को छूना चाहता है। मुनाफे का भी अपना व्याकरण होता है। लेखिका ने अपनी विचारधारा को कायम रखा है। हमारी मनसा है कि इनकी कलम जागे, जिये और परवान चढ़े।

उपन्यास की लेखिका सूर्यबाला जी ने अपनी बात में कहा कि आज के कार्यक्रम को बेसुधी में सुनती रही। उन्होने आयोजक मण्डल के सत प्रयत्न की प्रशंसा की और हृदय की गहराइयों से धन्यवाद दिया। उनका कहना था कि वक्ताओं ने मुक्त भाव से अपनी बात कहकर हमें कृतार्थ किया। पाठकों ने इस मोटी पुस्तक को पढ़ा और अनुक्रिया दी। उन्होने स्पष्ट कहा कि मैंने किसी तरह का तनाव नहीं लिया बल्कि डायरी की तरह सहज भाव से लिखती रही। बेशक वे पिछले 50 वर्षों में कई बार एक तमाशबीन की तरह विदेश भ्रमण की हैं। पहले नेवी में कार्यरत पति के साथ और अब 25 वर्ष बाद बेटी के घर रहीं जिससे अमेरिकी समाज और परिवेश का निकट से अनुसंधान करने का अवसर मिला।

दुनियाँ भर की स्त्रियाँ एक हैं। प्रेम समस्या नहीं, उपलब्धि है। माँ मैं ही हूँ। सन्नाटे घिरते गए, डायरी भरती गई। विस्थापन हमेशा मेरी दुखती रग रहा है। भारतीयों में हीन भाव एवं कुंठा अभी भी है। उपन्यास का डच पात्र मार्टिन, यथार्थ चरित्र और प्रामाणिक पात्र है। वह दशाश्वमेध घाट पर काशी आता है, सरोद सीखता है, राखी बंधवाता है, गेरुआ वस्त्र पहनता है। प्रेम अमुखर ही रहता है। लेखिका ने बताया कि उनका समय बड़ी तेजी से आगे बढ़ता रहा और सच के साथ उपन्यास पीछे चलता रहा। इंडिया इज बीगेस्ट एक्सपोर्टर ऑफ टैलेंट। लेखन ईश्वरीय वरदान है वे इसकी कृतज्ञ हैं।

अपने प्रखर, पैने और आत्मीय भाव से इस कार्यक्रम के प्रणेता एवं प्रवासी साहित्य के मर्मज्ञ श्री अनिल जोशी जी ने सूर्यबाला जी के अद्भुत अचर्चित प्रामाणिक सृजन का अभिनंदन किया। मुक्तिबोध के वाक्य पार्टनर अब तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? और इंद्र नाथ मदान के वाक्य –कृति से गुजरते हुए उन्होंने बेबाक विश्लेषण कर उजागर किया। उन्होंने भारत एक खोज, में इतिहास के विरूपीकरण और निर्मल वर्मा द्वारा स्वामी विवेकानंद की आलोचना का भी जिक्र किया।

उन्होने पुरजोर ढंग से कहा कि नासा में अधिकांश वैज्ञानिक और यू के में अधिकाश चिकित्सक भारतीय हैं। श्री जोशी जी द्वारा तीन प्रवासी पक्ष रखे गए। 1- भारत से बाहर जाने के कारण 2- भारत में रह रहे बिछुड़े परिवारों से लगाव में उत्तरोत्तर कमी। (इतना बड़ा मकान, मैं और श्वान–शैलेंद्र) अमेरिका हड्डियों में जम जाता है। 3- विदेशी प्रवास से करोड़ों लोगों की भाषा, संस्कृति, रचना और जिजीविषा खोखली होती चली गई। भारत में जो अतीत है वह व्यतीत नहीं होता।

उन्होने कहा कि हम इतिहास की रगों में जीते हैं। अंतर पूरब पश्चिम का नहीं बल्कि हमारी दृष्टि का है। औपनिवेशिक दृष्टि घर कर गई है।माता पिता, घर परिवार, समाज परिवेश और पति पत्नी तथा सजीव निर्जीव आदि छूटते हुए लिविंग रिलेशन तक जाना दुखद है। कोलोनियल माइंडसेट से निकलने की जरूरत है। हमने धर्म को अपनी जीवन पद्धति से जोड़ा है। हमें खुशी है कि आदरणीया सूर्यबाला जी ने इसे ठीक से समझकर अपने लेखन में दुरुस्त किया है।

अंत में वैश्विक हिन्दी परिवार की ओर से भोपाल निवासी और लंदन में प्रवासी साहित्यकार डॉ वंदना मुकेश द्वारा बिनु सत्संग विवेक न होई, को उद्घृत करते हुए सभी के प्रति आभार प्रकट किया गया। उन्होंने सृजन का समादर करते हुए आत्मीयता से माननीय अतिथियों, विशिष्ट वक्ताओं, सभी विद्वानों और सुधी श्रोताओं के प्रति हार्दिक आभार प्रकट किया।

उनके द्वारा इस कार्यक्रम से जुड़े संरक्षकों, संयोजकों, मार्गदर्शकों, सहयोगियों, शुभचिंतकों तथा विभिन्न टीम सदस्यों को हृदय की गहराइयों से धन्यवाद दिया गया। डॉ वंदना द्वारा सत साहित्य और साहित्यिक श्रीवृद्धि हेतु लेखिका सूर्यबाला जी के प्रति विशेष कृतज्ञता प्रकट की गई। यह कार्यक्रम यू-ट्यूब पर “वैश्विक हिन्दी परिवार” शीर्षक से उपलब्ध है। रिपोर्ट लेखन कार्य डॉ जयशंकर यादव ने किया।

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