केंद्रीय हिंदी संस्थान: विद्वान प्रो पाण्डेय शशि भूषण शीतांशु के साहित्य पर इन विद्वानों ने डाला प्रकाश

हैदराबाद (डॉ जयशंकर यादव की रिपोर्ट) : सृजन के क्षणों में मनुष्य अर्धसमाधि की अवस्था में होता है। सृजन और परख को सम्मान व नमन करते हुए सुप्रसिद्ध आलोचक आचार्य डॉ शीतांशु की समालोचना पर उनकी गरिमामयी उपस्थिति में केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, विश्व हिंदी सचिवालय और वातायन के तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। हिंदी साहित्य की विविध विधाओं और आलोचना के क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित करने वाले 40 वर्षों से अध्यापनरत, 38 पुस्तकों के लेखक और 100 से अधिक पीएचडी करा चुके विद्वान प्रो पाण्डेय शशि भूषण शीतांशु पर यह कार्यक्रम केन्द्रित था। इसमें देश विदेश के अनेक विचारक, विद्वान विदुषी, भाषा प्रेमी और शोध छात्र लाभान्वित हुए।

आरंभ में रेलवे बोर्ड में राजभाषा के निदेशक डॉ बरुण कुमार ने विवादों से परे विद्वान शीतांशु की रचनाधर्मिता और दीर्घकालिक साधना की प्रस्ताविकी प्रस्तुत की और अतिथियों का संक्षिप्त परिचय कराते हुए स्वागत किया। तत्पश्चात डी ए वी कालेज पंजाब की हिंदी विभागाध्यक्ष और शीतांशु की शिष्या डॉ किरण खन्ना द्वारा समुचित भूमिका और साहित्यिक परिचय के साथ शालीन ढंग से संचालन संभाला गया। उन्होने बारी-बारी वक्ताओं को आत्मीय ढंग से आमंत्रित किया। सर्व प्रथम शीतांशु को अपनी साहित्य साधना को अपने ही शब्दों में रूपायित करने की विनती की गई।

अपनी आलोचना के दर्पण, का दिग्दर्शन कराते हुए वैश्विक ख्याति अर्जित डॉ शीतांशु ने इस कार्यक्रम पर हर्ष प्रकट करते हुए कवि नीरज की पंक्तियों को उद्घृत कर कहा कि दर्पण मत झाँको, तुम्हें नजर लग जाएगी। उन्होंने कहा कि मैंने अपनी जन्मना भावयित्री और करियत्री प्रतिभा की बदौलत साहित्य साधना की है। जिस ओर किसी का ध्यान नहीं गया उस ओर निर्भीकता और प्रामाणिकता से लेखनी चलाई। यही मेरी पूंजी है। उन्होंने कवि प्रसाद को याद करते हुए कहा कि तुम न विवादी स्वर छेड़ो अनजाने। साहित्यकार के शब्द और अर्थ के क्षितिज की पट्टी को हटाना हमारा कर्तव्य है। सुयश तो कानों की गुदगुदी-सा है।

वयोवृद्ध समालोचक डॉ शीतांशु ने प्रखर और ओजपूर्ण वाणी में कहा कि लगभग 100 वर्षों की हिंदी आलोचना में अधिकांश बाह्य आरोपित था जो मार्क्सवाद और पश्चिम से प्रभावित था जबकि हमारी ज्ञान परंपरा में डेढ़ हजार वर्षों से अधिक समय से सही मूल्यांकन का आधार विद्यमान था। मैंने उसके गह्वर में पैठकर कृतियों के साक्षात्कार और अनुभूति से न केवल तैराक बल्कि गोताखोर के रूप में डूबकर सर्जनात्मक आलोचना का मौलिक सार तत्व दिया। उन्होने मुख्यतया उपन्यास कहानी और कविता के पक्षों को बारीक विश्लेषण सहित रखा और अपनी परिकल्पना को समझाते हुए ‘गोदान’ तथा ‘कफन’ का बहुध्वनित उदाहरण रखा जिसमें ऊंचे मन्तव्य के साथ, दान और त्याग की संस्कृति निहित है, परिग्रह और अपरिग्रह का पुट है।

उन्होंने सतही आलोचकों को खारिज किया और राजेन्द्र यादव तथा कमल किशोर गोयनका के पत्रों का भी जिक्र किया तथा कर्मोन्मुख व कर्म विमुख संस्कृति और नए पैदा बिचौलिया वर्ग का पटाक्षेप किया। उन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय में राष्ट्रकवि दिनकर द्वारा नौकरी के लिए लिए गए अपने साहित्यिक साक्षात्कार का वृतांत भी बताया। इसके अलावा निराला की कविता तोड़ती पत्थर के वर्तमान, भूत और भविष्यत काल की क्रिया न होने का खुलासा किया और कहा कि कविता अर्थदीप्ति देती है। प्रतिभा ही अर्थ निकालती है। इसके लिए साहित्य विवेक चाहिए। पश्चिमी देशों की अपनी परंपरा है। उन्होने शैली विज्ञान, भाषा विज्ञान और आलोचना आदि की अपनी स्थापित दृष्टि रखी और वाग्देवी की कृपा से गर्व विहीन होकर काम करने का रहस्य बताया।

लेखिका अलका सिन्हा के अपने लेखन के आँकने के सवाल पर शीतांशु ने कहा कि आत्मिक विकास और दृष्टि आवश्यक है। पढ़ने से द्वीतीयक प्रतिभा प्राप्त होती है। दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कालेज में वरिष्ठ प्रोफेसर और शीतांशु जी की पुत्री डॉ स्वाती श्वेता ने समय की महत्ता के मद्देनजर इस महान साहित्यकार की समालोचना, सम्पादन और पुत्री रूप के पक्ष को उद्घाटित करते हुए कहा कि इनका व्यक्तित्व प्रिज्म की तरह है जिससे होकर अनेक रंग निकलते और प्रकाशित करते हैं। आपकी सूक्ष्म अनुशानात्मक दृष्टि है जो भ्रांत धारणाओं का सीधे खंडन करते हुए सूत्रात्मक और गत्यात्मक नई स्थापना करती है। संपादक के रूप में 1995 से 2023 तक की प्रामाणिक पुस्तकों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि पिताजी हमेशा अन्याय के विरुद्ध लड़े। किसी से कुछ मांगा नहीं है। नारियल की तरह ऊपर के कठोर किन्तु अंदर द्रवीभूत और स्वाभिमानी हैं। ये तेज तूफानों में भी चलने के लिए आदी है। पिता के लिए सौभाग्यशाली पुत्री के शब्द श्रोताओं के लिए भावुक, प्रेरक और गौरवान्वित करने से ओत-प्रोत थे।

मुंबई विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर और समालोचक डॉ करुणाशंकर उपाध्याय ने कहा कि आलोचना कृति से अधिक चुनौती है और कृतिकार के सामने विराजमान होने पर चुनौती बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि शीतांशु हिंदी के श्रेष्ठ साहित्यिक सृजनात्मक और अनिर्वाचनात्मक आलोचक हैं। इन्होंने ज्ञान परंपरा को आत्मसात कर आलोचना का संस्कार ग्रहण किया है। ये शास्त्रज्ञ और आचार्य हैं जो भाव की सहयात्रा कराते हुए अंतरतम में प्रवेश कराते हैं। इनकी अन्तः अनुशासनिक दृष्टि ज्ञान सम्पन्न और आर-पार भेदने की है। शैली विज्ञान में संरचनावाद और विसंरचनावाद के जनक हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बाद वाद मुक्त पारखी निर्भ्रांत आलोचक हैं और साहित्यिक विवेक को प्रश्रय देते हुए काव्यशास्त्रीय प्रामाणिक दृष्टि रखते हैं। आचार्य शीतांशु एक मात्र सैद्धांतिक विसंरचनावाद के स्थापित आलोचक है। आपका सार्थक हस्तक्षेप बना रहे और शतायु हों।

कार्यक्रम के प्रणेता और वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष अनिल जोशी ने कहा कि यह आचार्य जी के अभिनंदन का समय है। हम उनकी दीर्घकालिक साधना और बौद्धिक विमर्श का सादर समादर करते हैं। निश्चय ही हमारी ज्ञान परंपरा की लंबे काल खंड तक उपेक्षा हुई है। उपनिवेशवादी मन का कायम रहना दुर्भाग्यपूर्ण है। आचार्य शीतांशु की असाधारण दुर्लभ प्रतिभा है जिन्होने सही तथ्य स्थापित किए और नई दिशा दी। अतएव हम सब ऋणी हैं। आपसे सीखते रहेंगे और आगे बढ़ते रहेंगे। आगामी समय भी आपको पहचानता रहेगा और सही दिशा में चलता रहेगा।

कार्यक्रम में अमेरिका से नीलम जैन, यू के से पदमेश गुप्त, साहित्यकार अरुणा अजितसरिया, शैल अग्रवाल, रूस से प्रो अल्पना दास, सिंगापुर से संध्या सिंह, कनाडा से शैलेजा सक्सेना, खाड़ी देश से आरती लोकेश, थाइलैंड से प्रो प्रिया, श्रीलंका से प्रो अतिला कोतलावल तथा भारत से नारायण कुमार, मुकुल जैन, प्रेम विरग, प्रसून लतान्त, शशिकला त्रिपाठी, योगेश प्रताप, मालिक मोहम्मद, रश्मि वार्ष्णेय, पी के शर्मा, विजय नगरकर, गंगाधर वानोडे, संध्या सिलावट, विवेकानन्द, विश्वजीत मजूमदार, सुकन्या शर्मा, आयुष प्रजापति, अंशिका वर्मा, वीर बहादुर, शशिकांत पाटील, अशोक कुमार सिंह, शुभम राय त्रिपाठी, संजय कुमार, अपेक्षा पाण्डेय, अनिल साहू, सरिता, स्वयंवदा, ऋषि कुमार, कृष्ण कुमार एवं जितेंद्र चौधरी आदि सुधी श्रोताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर शीतांशु के अनेक शिष्य भी उपस्थित होकर धन्यता का अनुभव किए। तकनीकी सहयोग का दायित्व कृष्ण कुमार द्वारा बखूबी संभाला गया। मौके पर अनेक शोधार्थी मौजूद थे।

अंत में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो राजेश गौतम द्वारा आत्मीय भाव से आचार्य शीतांशु, सम्माननीय वक्ताओं, संयोजकों, समन्वयकों, संचालकों, सहयोगियों, शोधार्थियों एवं सुधी श्रोताओं आदि को नामोल्लेख सहित धन्यवाद ज्ञापित किया गया। समूचा कार्यक्रम सौहार्द पूर्ण माहौल में गुरुता और गुणग्राह्यता सहित सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में युगानुरूप साहित्यिक समालोचना और गहन ज्ञान की गहन अनुभूति सहज ही परिलक्षित हुई। यह कार्यक्रम वैश्विक हिंदी परिवार शीर्षक से यू-ट्यूब पर उपलब्ध है।

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