हैदराबाद/बेंगलुरु: भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है। रोज-रोज कई नए-नए आविष्कार सामने आ रहे हैं। वे यहाँ हो सकते हैं। दूसरे देशों में भारतीय मूल के लोग हो सकते हैं। यहाँ सही सहयोग, अवसर न मिलने से विदेश जाकर वहाँ प्रतिभा साबित करने वाले कई हैं। अब ऐसी ही कहानी है 24 साल की अनघा राजेश की। भारत में ही जन्म लेकर, यहीं पढ़कर, यहीं एक अद्भुत टेक्नोलॉजी बनाने वाली युवती अब अपना स्टार्टअप को सैन फ्रांसिस्को ले गई है।
यह सिर्फ उसका जाना नहीं है, भारत में डीपटेक प्रतिभा विदेश कैसे जा रही है यह दिखाने वाली परिस्थितियों का आईना है। अनघा राजेश बिट्स पिलानी (गोवा) ग्रेजुएट हैं। 2024 में उन्होंने बेंगलुरु में बायोकंप्यूट नाम का स्टार्टअप स्थापित किया। उनका लक्ष्य छोटा नहीं है। दुनिया के विशाल डेटा को सामान्य हार्ड डिस्क, टेप की बजाय मानव शरीर के DNA में स्टोर करना है। हाँ, इससे संबंधित उन्होंने पहले ही व्यापक प्रयोगों से हड़कंप मचा दिया है।
सामान्य कंप्यूटरों में डेटा को हार्ड डिस्क, मेमोरी चिप या क्लाउड डेटा सेंटर में सुरक्षित रखा जाता है। लेकिन 2024 में बेंगलुरु में स्थापित बायो कंप्यूट कंपनी DNA की मदद से डेटा स्टोर करने की तकनीक विकसित कर रही है। सिर्फ एक ग्राम DNA में लगभग 215 पेटाबाइट (लगभग 2 लाख GB डेटा) डेटा सुरक्षित रखा जा सकता है। दुनिया के विशाल डेटा सेंटरों को भी छोटे अणु के आकार में समेटा जा सकता है।
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यहाँ एक और विशेषता यह है कि सामान्य हार्ड डिस्क में डेटा कुछ सालों में खराब हो सकता है, वही DNA में डेटा हजारों साल तक बिना खराब हुए रहता है। बेंगलुरु में लैब लगाकर, दो साल में ही प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट से एंड टू एंड प्रोटोटाइप तक ले आई बायोकंप्यूट कंपनी।पता चल है कि भारतीय निवेशक – त्वरित लाभ की उम्मीद के अनुसार उसकी कंपनी को उम्मीद के मुताबिक निवेश नहीं मिला। यह भी जानकारी मिली है कि इससे वह बेंगलुरु में अपनी लैब बेचकर अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को चली गई हैं।
2024 में अनघा ने बायोकंप्यूट स्टार्टअप शुरू किया। उनका डेटा स्टोर करने का तरीका बहुत अलग है। नया DNA सिंथेसाइज किए बिना पुन: उपयोग योग्य टेम्प्लेट पर एंजाइम से डेटा लिखना। इससे राइट कॉस्ट प्रति मेगाबाइट खर्च एक डॉलर से कम हो गया। यह अब की प्रमुख टेक्नोलॉजी से बहुत कम है। भारत में ही इस क्षेत्र में पहली प्राइवेट लैब के रूप में यह रही। कोरमंगला में लैब स्थापित कर, हजारों प्रयोग करके, प्रोटोटाइप तैयार किया।
निखिल कामत WTF Fund, ग्रैड कैपिटल और 1517 फंड जैसे स्रोतों से लगभग 5 करोड़ रुपये का फंड जुटाया इस कंपनी ने। हाल ही में जून में अचानक अनघा ने अपने ब्लॉग में एक पोस्ट डाली। ‘भारत के संसाधनों का उपयोग करके प्रोटोटाइप तक आए। अब v1 चिप बनाकर ग्राहकों को देना है। इसके लिए हाई रिस्क, हाई इन्वेस्टमेंट, टैलेंट और कस्टमर रिस्क है। बताया कि यह सैन फ्रांसिस्को में है।’ इसी क्रम में बेंगलुरु लैब में गतिविधियां बंद करके, लैब उपकरण और फर्नीचर बिक्री के लिए रखे।
अमेरिका में मिलने वाला पेशेंट कैपिटल (दीर्घकालिक धैर्य वाला निवेश), डीपटेक निवेशक, रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर और दीर्घकालिक साइंस को समर्थन देने वाला माहौल ही उसके अमेरिका चुनने का कारण बताया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वहाँ के लोग रेवेन्यू कब आएगा यह पूछने के बजाय, टेक्नोलॉजी बनाने के लिए क्या चाहिए यह सोच रहे हैं। यहाँ भारत ग्लोबल टेक सुपरपावर बने ऐसा कहते समय, फ्रंटियर टेक्नोलॉजी बनाने वाली युवा प्रतिभा को रोकने में कैसे पीछे है यह दिखाने के उदाहरण के रूप में अनघा की कहानी बताई जा रही है। DNA स्टोरेज जैसी टेक्नोलॉजी सफल होने पर वह दुनिया के आविष्कारों में भारत को आगे ले जाने का मौका होता।

One thought on “DNA में डेटा स्टोर करने वाली अद्भुत टेक्नोलॉजी, अचानक बेंगलुरु से अमेरिका चली गई फाउंडर, पढ़ें आखिर क्या हुआ?”