हैदराबाद : वरिष्ठ साहित्यकार एवं भाषाविद् प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा के आवास (208-ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद) में 8 सितम्बर को वरिष्ठ पत्रकार के. राजन्ना की बहुचर्चित हिंदी कृति ‘फांसी’ का बांग्ला अनुवाद ‘ফিরে আসা (फिरे आशा)’ का लोकार्पण किया गया। इस पुस्तक का बांग्ला अनुवाद डॉ. सुपर्णा मुखर्जी ने किया। इसके प्रकाशक चारुपाठ पब्लिकेशन, वाराणसी है तथा प्रकाशन के कर्णधार जयदेव दास हैं।

इस अवसर पर एक गरिमामय पुस्तक-परिचर्चा हुई। इस कार्यक्रम के सूत्रधार प्रोफेसर डॉ. ऋषभ देव शर्मा रहे हैं। इसका फेसबुक लाइव भी किया गया। उन्होंने इसका सारा सारा श्रेय पुस्तक के लेखक और अनुवादक को दिया। गोष्ठी में उपस्थित साहित्यप्रेमियों एवं विद्वानों ने पुस्तक के साहित्यिक, सामाजिक तथा भाषाई महत्व पर विस्तार से चर्चा की।

अपने वक्तव्य में के. राजन्ना ने अपनी रचनात्मक यात्रा के अनेक संस्मरण साझा किए। उन्होंने पुस्तक की रचना-प्रक्रिया से जुड़े अनुभवों को याद करते हुए कहा कि साहित्य समाज की स्मृति और संवेदना का जीवंत दस्तावेज होता है। उन्होंने अपनी कृति के बांग्ला अनुवाद पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ाने में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका है। साथ ही उन्होंने चारुपाठ प्रकाशन और अनुवादक डॉ सुपर्णा मुखर्जी के प्रति आभार जताया।
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अनुवादक डॉ. सुपर्णा मुखर्जी ने पुस्तक की विषयवस्तु तथा उसके अनुवाद की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ‘फांसी’ मानवीय संघर्ष, संवेदना और सामाजिक यथार्थ की गहन अभिव्यक्ति है। उन्होंने बताया कि अनुवाद करते समय मूल रचना की आत्मा, भावभूमि और सांस्कृतिक संदर्भों को अक्षुण्ण बनाए रखने का विशेष प्रयास किया गया है। विश्वास है कि बांग्ला भाषी पाठकों के बीच साहित्यिक संवाद को ‘ফিরে আসা (फिरे आशा)’ और अधिक समृद्ध करेगा।

वरिष्ठ साहित्यकार और कार्यक्रम के मुख्य अथिति रवि वैद्य ने लेखक एवं अनुवादक दोनों को हार्दिक बधाई देते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं के मध्य अनुवाद की परंपरा राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करती है। उन्होंने राजन्ना की लेखकीय दृष्टि और डॉ. सुपर्णा मुखर्जी के अनुवाद कौशल की प्रशंसा करते हुए पुस्तक की व्यापक सफलता की कामना की है।

इस अवसर पर डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने अपनी शुभकामनाएँ व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसी कृतियाँ भारतीय भाषाओं के परस्पर संबंधों को और अधिक मजबूत बनाती हैं। उन्होंने लेखक और अनुवादक के प्रयासों की सराहना की तथा पुस्तक के व्यापक पाठक वर्ग स्वागत की आशा व्यक्त की। उन्होंने अनुवादक डॉ सुपर्णा के परिश्रम और राजन्ना के साहस और धैर्य की सराहना की।
कार्यक्रम के दौरान सुप्रसिद्ध कवि यश मालवीय का आशीर्वाद दूरभाष के माध्यम से प्राप्त हुआ। उन्होंने इस साहित्यिक उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए लेखक, अनुवादक तथा उपस्थित साहित्यकारों को शुभकामनाएँ दीं और कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद का कार्य साहित्यिक समन्वय की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
