हैदराबाद : हिंदी साहित्य भारती के तत्वावधान में 21 मार्च को “अंतरराष्ट्रीय तरंग संगोष्ठी” का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य विषय “राष्ट्र-वंदन : वर्तमान का अभिनंदन” रहा। इस अवसर पर “अभिनंदनीय मूर्ति” प्रख्यात हिंदी साहित्यकार डॉ. ऋषभदेव शर्मा के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर केंद्रित विशेष कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया। अपने संबोधन में अभिनंदनीय मूर्ति डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने युद्ध और उससे उत्पन्न विभीषिकाओं पर आधारित अपनी सशक्त कविताओं का पाठ किया। “कवि धर्म” और “मानव अधिकार” जैसी रचनाओं में उन्होंने सत्ता और समाज के प्रति कवि की जिम्मेदारी को रेखांकित किया, वहीं अपने दोहों में युद्ध की निरर्थकता और मानवीय त्रासदी को मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया।
विश्व कविता दिवस के संदर्भ में प्रस्तुत उनकी लंबी कविता में खाड़ी क्षेत्र के युद्ध, मानवीय संकट, विस्थापन और विनाश के बीच भी जीवित मानवीय आशा को प्रभावशाली प्रतीकों के माध्यम से उकेरा गया। “युद्धं देहि!” शीर्षक कविता में युद्ध को एक विनाशकारी राक्षस के रूप में चित्रित करते हुए उन्होंने यूक्रेन, गाज़ा, अफगानिस्तान जैसे संदर्भों के माध्यम से वैश्विक पीड़ा को स्वर दिया। इनके अतिरिक्त “तेवरी” और अन्य कविताओं में उन्होंने युद्ध, हिंसा, राजनीति और सामाजिक विघटन पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया, जबकि “निवेदन” और “मैं?” जैसी रचनाओं में मानवीय संबंधों, प्रेम, सह-अस्तित्व और वैश्विक नागरिकता की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। उनकी कविताओं ने न केवल वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को प्रतिबिंबित किया, बल्कि श्रोताओं की संवेदनाओं को गहराई से स्पर्श किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिंदी एवं अंग्रेजी साहित्य के मर्मज्ञ प्रो. गोपाल शर्मा ने अपनी अध्यक्षीय टिप्पणी में डॉ. ऋषभदेव शर्मा के व्यक्तित्व की विशिष्टताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डॉ. शर्मा दक्षिण भारत में भारतीय भाषा, संस्कृति और कला के एक महत्वपूर्ण दीप-स्तंभ हैं। उन्होंने अनेक नवांकुर साहित्यकारों को प्रेरित कर उन्हें पुष्पित-पल्लवित किया है तथा उनके लेखन को दिशा और परिष्कार प्रदान किया है। परिचायक के रूप में डॉ. बी. बालाजी, प्रबंधक (हिंदी अनुभाग एवं निगम संचार), मिधानि, हैदराबाद ने डॉ. ऋषभदेव शर्मा के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि डॉ. शर्मा को ‘सरस्वती साधक’ बताते हुए उन्हें कवि, समालोचक और भाषाविद् का अद्वितीय संगम है। साथ ही उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि डॉ. शर्मा एक संवेदनशील किंतु संतुलित पत्रकार हैं, जो अपने संपादकीय लेखन के माध्यम से समाज की विद्रूपताओं को सशक्त स्वर प्रदान करते हैं।

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कार्यक्रम का संचालन डॉ. निर्मला देवी चिट्टिल्ला ने कुशलतापूर्वक किया तथा सरस्वती वंदना का सुमधुर प्रस्तुतीकरण शुभ्रा मोहन्तो द्वारा किया गया। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. रवींद्र शुक्ल (अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष, हिसांपा एवं पूर्व शिक्षा मंत्री, उत्तर प्रदेश) की गरिमामयी उपस्थिति रही। उपस्थित अतिथियों का परिचय रंजन झा ने कराया। संगोष्ठी के सफल आयोजन में आचार्य देवेंद्र देव, ममता सक्सेना एवं रुचि निवेदिता का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम का समापन डॉ. रामनिवास शुक्ल के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। यह संगोष्ठी हिंदी साहित्य के संवर्धन एवं सांस्कृतिक समरसता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुई है।
