संत गाडगे बाबा जयंती पर विशेष : डॉ भीमराव अंबेडकर जी से प्रेरणा लेकर युवक पढ़ाई करें…

23 फरवरी यानी सोमवार को राष्ट्रसंत गाडगे बाबा की 150 जयंती है। वैसे तो भारत की भूमि साधु-संतों, महात्माओं और समाज-सुधारकों से भरी है। इनमें से कुछ ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व वाले हैं जो किसी एक सम्प्रदाय, मत या दर्शन की सीमा में बंधकर नहीं रह जाते, बल्कि उनका जीवन ही एक सार्वभौमिक दर्शन बन जाता है। ऐसे ही एक अद्वितीय, अनूठे और समाज सुधारक संत थे- राष्ट्रसंत गाडगे बाबा। उनका असली नाम डेबूजी झिंगराजी जानोरकर था और उनके माता-पिता का नाम- सखुबाई और झिंगराजी था। हालांकि ‘झाड़ू’ और ‘मिट्टी के बर्तन’ से उनकी पहचान बनी। गाडगे बाबा ने कोई नया धर्म स्थापित नहीं किया, न ही वे किसी गूढ़ दार्शनिक चिंतन में उलझे रहे। उनका सम्पूर्ण जीवन सादगी, स्वच्छता, शिक्षा, सामाजिक न्याय और निःस्वार्थ सेवा के इर्द-गिर्द घूमता रही। उन्होंने अपने दैनिक आचरण और अथक यात्राओं के माध्यम से अपना संदेश जन-जन तक पहुँचाया।

संत गाडगे बाबा का जन्म 23 फरवरी, 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के ‘शेणगाँव’ नामक गाँव में एक धोबी परिवार में हुआ था। जन्म से ही वे सामान्य स्थितियों में पले, लेकिन उनके मन में बचपन से ही समाज में व्याप्त विषमताओं, गरीबी और अज्ञानता को देखकर एक व्याकुलता थी। उन्होंने देखा कि समाज छुआछूत, ऊँच-नीच और धार्मिक आडम्बरों में जकड़ा हुआ है, जबकि गरीब और वंचित वर्ग अशिक्षा और गंदगी के अंधेरे में जीने को मजबूर हैं। युवावस्था में ही उनका विवाह हो गया और उन्होंने एक साधारण गृहस्थ का जीवन शुरू किया। किन्तु एक आंतरिक आवाज ने उन्हें सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर समाज सेवा के एक विशिष्ट मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने घर त्याग दिया और एक साधारण सा नीला कपड़ा, सिर पर मिट्टी का चिलम (कुंभ) बर्तन और हाथ में एक झाड़ू लेकर पैदल यात्राएँ शुरू कर दीं। यहीं से ‘गाडगे बाबा’ का अवतरण हुआ।

राष्ट्रसंत गाडगे बाबा के दर्शन को किसी ग्रंथ में नहीं, बल्कि उनके कर्मों, उपदेशों और जीवनशैली में देखा जा सकता है। गाडगे बाबा के लिए ईश्वर की सच्ची पूजा मंदिरों में दीपक जलाने या मूर्तियों के सामने झुकने में नहीं, बल्कि मानव सेवा और समाज कल्याण में निहित थी। उनका प्रसिद्ध कथन था- “जो मनुष्य मात्र की सेवा करता है, वही सच्चा ईश्वर-भक्त है।” उन्होंने मन्दिरों में धन चढ़ाने के बजाय उस धन से स्कूल और अस्पताल बनाने पर जोर दिया। वे कहते थे कि भूखे को भोजन देना, बीमार व्यक्ति की सेवा करना और अज्ञानी को शिक्षित करना ही सबसे बड़ा धर्म है। उनका दृढ़ विश्वास था कि अज्ञानता ही सभी सामाजिक बुराइयों की जड़ है। गरीब और दलित वर्ग के बच्चों को शिक्षा से वंचित देखकर उन्हें गहरा दुख होता था।

इसलिए उन्होंने अपने जीवनकाल में असंख्य विद्यालय, छात्रावास और पुस्तकालय स्थापित किए। वे शिक्षा को केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सामाजिक चेतना का माध्यम मानते थे। उनके लिए एक स्कूल का निर्माण एक मंदिर के निर्माण से कहीं अधिक पुण्य का कार्य था। गाडगे बाबा ने स्वच्छता के अभियान को एक धार्मिक और सामाजिक आंदोलन का रूप दिया। वे कहते थे- “स्वच्छता ईश्वर भक्ति का पहला चरण है।” उनकी यात्राओं का एक अटूट नियम था- गाँव में प्रवेश करते ही सबसे पहले गंदगी वाले स्थानों की सफाई करना। इससे न केवल पर्यावरण स्वच्छ होता, बल्कि लोगों में सामूहिक उत्तरदायित्व और गर्व की भावना भी जागृत होती। आज के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के मूल में गाडगे बाबा का यही दर्शन झलकता है।

एक धोबी परिवार में जन्मे संत गाडगे बाबा ने छुआछूत और जातिगत भेदभाव को बहुत निकट से भोगा था। उनका दर्शन इन बेड़ियों को तोड़ने पर केंद्रित था। वे सभी धर्मों और जातियों के लोगों से समान व्यवहार करते। उनके भजन-कीर्तन में सभी वर्गों के लोग बिना किसी भेद के शामिल होते थे। उन्होंने ‘गाडगेवाड़ी’ नामक सामुदायिक स्थानों की स्थापना की, जो सभी के लिए खुले थे और जहाँ सामूहिक भोज (सात्विक भंडारा) का आयोजन होता था। यह सामाजिक एकता और भाईचारे का मूर्त रूप था।

वे समाज में फैले आडम्बर, फिजूलखर्ची और दिखावे के कट्टर विरोधी थे। शादी-विवाह या अन्य समारोहों में अनावश्यक खर्च करने वालों को वे टोकते थे। उनका सुझाव था कि इस पैसे को गरीबों की शिक्षा या कल्याण पर खर्च किया जाए। वे जल, अनाज और समय की बचत पर बहुत जोर देते थे। उनके लिए, संसाधनों का सदुपयोग ही सच्ची समझदारी थी।

संत गाडगे बाबा ने महाराष्ट्र और आस-पास के राज्यों की लगभग 20-25 वर्षों तक निरंतर पदयात्राएँ कीं। ये केवल यात्राएँ नहीं थीं, बल्कि जन-जागरण के अभियान थे। वे गाँव-गाँव जाते, लोगों को इकट्ठा करते और सरल, व्यावहारिक भाषा में उपदेश देते। उनकी भाषा में आम जनता की बोली होती थी, जिसमें लोकोक्तियाँ, कहावतें और हास्य-व्यंग्य का सटीक प्रयोग होता था। वे लोगों को डाँटते भी थे, प्यार से समझाते भी थे। उनकी यात्राओं का सीधा परिणाम यह होता था कि गाँव के लोग स्वेच्छो से सफाई अभियान में जुट जाते, स्कूल बनाने के लिए चंदा देते और सामाजिक सद्भाव बढ़ाने का संकल्प लेते।

गाडगे बाबा ने भिक्षा में मिले अनाज और धन को कभी भी अपने लिए संचित नहीं किया। इसका उपयोग उन्होंने लोकोपयोगी संस्थाओं के निर्माण के लिए किया। उनके द्वारा स्थापित की गई ‘गाडगे महाराज मिशन’ आज भी सक्रिय है। उन्होंने अनेक धर्मशालाएँ, पशु चिकित्सालय, अनाथालय और महिला आश्रम बनवाए। उनकी सबसे बड़ी देन शिक्षण संस्थाएँ हैं, जो आज भी हजारों गरीब और मेधावी छात्रों को शिक्षा प्रदान कर रही हैं। यह सब उन्होंने बिना किसी सरकारी सहायता से किया। इसके लिए केवल जनता ही सहयोग करती थी।

आज भारत तेजी से विकास कर रहा है। इसमें गाडगे बाबा का संदेश, दर्शन और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उनका ‘स्वच्छता’ का संदेश केवल कूड़ा साफ करने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहने का संदेश था, जो आज के जलवायु संकट के युग में अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज भी जाति, धर्म और आर्थिक आधार पर समाज में गहरी खाई मौजूद हैं। गाडगे बाबा का समन्वयवादी और समतामूलक दृष्टिकोण इन्हें पाटने का मार्ग दिखाता है। उनका शिक्षा पर जोर, विशेष रूप से वंचित वर्गों के लिए आज भी एक प्रेरणा है। जब शिक्षा महंगी और व्यावसायिक होती जा रही है। भौतिकवाद और दिखावे की संस्कृति में उनकी सादा जीवन और उच्च विचार की अवधारणा मानवीय मूल्यों की रक्षा का आधार है।

झाड़ू: यह केवल गंदगी साफ करने का साधन (औजार) नहीं था। यह सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों, छुआछूत और मानसिक गंदगी को साफ करने का प्रतीक था। वे जहाँ भी जाते, सबसे पहले सार्वजनिक स्थानों, मंदिरों के आस-पास की सफाई करते। इस क्रिया के माध्यम से वे यह संदेश देते थे कि बाहरी स्वच्छता आंतरिक पवित्रता की पहली सीढ़ी है और समाज की सफाई हर व्यक्ति का दायित्व है।

सिर पर मिट्टी का बर्तन (कुंभ/चिलम): यह सादगी, संतोष और अहंकारहीनता का प्रतीक था। यह दिखाता था कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताएँ न्यूनतम रखनी चाहिए। साथ ही, मिट्टी का बर्तन सभी जातियों के लिए एक समान था अर्थात यह समानता का भी संकेत था।

भिक्षा माँगना: वे अपने लिए कभी धन या सामग्री एकत्र नहीं करते थे। वे केवल दो समय की भिक्षा माँगते और उससे अधिक में उनकी रुचि नहीं थी। यह लोभ और संग्रह की प्रवृत्ति से मुक्ति का प्रतीक था। उनकी भिक्षा का उद्देश्य स्वयं का पेट भरना नहीं, बल्कि लोगों को दान और साझा करने की भावना का पाठ पढ़ाना था।

संत गाडगे बाबा ने कोई धर्मग्रंथ नहीं लिखा। कोई नया पंथ नहीं चलाया। न ही वे किसी चमत्कार के लिए जाने जाते थे। उनका चमत्कार केवल आम जनता के हृदय परिवर्तन की शक्ति। वे एक व्यावहारिक आदर्शवादी थे, जिन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि बिना धन, बिना राजनीतिक सत्ता और बिना किसी औपचारिक शिक्षा के भी, केवल दृढ़ इच्छा शक्ति, निःस्वार्थ प्रेम और कर्मठता से समाज में व्यापक परिवर्तन लाया जा सकता है। उनका झाड़ू केवल गलियों की नहीं, बल्कि हमारी मानसिकता की गंदगी साफ करने का आह्वान है। उनका मिट्टी का बर्तन हमें सादगी और समानता का संदेश देता है। संत गाडगे बाबा सच्चे अर्थों में ‘महान’ थे, क्योंकि उनकी महानता उनके कर्मों में निहित थी, जो आज भी करोड़ों लोगों के लिए मार्गदर्शक बनी हुई है। वे युवकों से कहते थे कि डॉ भीमराव अंबेडकर जी से प्रेरणा लेकर पढ़ाई करें। शिक्षा ही ऊंचाई तक पहुंचने की सीढ़ी है। आइए ऐसे महान राष्ट्रसंत गाडगे बाबा के जयंती पर हम प्रतिज्ञा लेते है कि उनके सामाजिक परिवर्तन संदेश का पालन करते है। (सोशल मीडिया से साभार)

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