16 फरवरी को अथर्व इंडिया अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान की ओर से अथर्व संवाद-परीक्षा का तनाव विषय पर ऑनलाइन के जरिए एक सारगर्भित संगोष्ठी कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम डॉ. वी. बी. पांडेय जी के मार्गदर्शन में तथा डॉ करुणा पांडेय की अध्यक्षता में किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि अरविंद पांडेय, संयोजन-संचालन अनिशा कुमारी, मुख्य वक्ता डॉ जय प्रकाश तिवारी, अतिथि वक्ता चिकित्सक डॉ. जानवी सिन्हा, अतिथि वक्ता पूजा गुप्ता (अधिवक्ता), अतिथि वक्ता डॉ. अंजली दीवान, अतिथि वक्ता आशीष अम्बर, अतिथि वक्ता मीठू रॉय (समाजसेवी), अतिथि वक्ता श्वेता श्रीवास्तव (शिक्षक), अतिथि वक्ता विभा पाठक (योग), अतिथि वक्ता कुसुम पाठक (शिक्षक), अतिथि वक्ता पूनम मिश्रा शिक्षक और अन्य ने संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रीय कार्यक्रम संयोजक की ओर से किया जाएगा। इस संगोष्ठी में सभी वक्ताओं ने परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों का सुंदर मार्गदर्शन किया है। तेलंगाना समाचार को डॉ जय प्रकाश तिवारी का संबोधन मिला है। विश्वास है कि परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों को यह लाभ दायक साबित होगी।
“परीक्षा का तनाव”: समसामयिक विमर्श
अगले माह से विभिन्न बोर्डों की परीक्षाएं प्रारम्भ हो रही हैं। उसके बाद प्रतियोगी परीक्षाएं होंगी। कुछ परीक्षाएं सेमेस्टर वाइज होती हैं। प्रश्न है परीक्षा क्या है और इसमें तनाव क्यों परिव्याप्त हो जाता है? परीक्षा है – जिसे पढ़ा गया, बार बार समझा गया, जाना गया उसकी ही अभिव्यक्ति। जब यह जाने हुए कि जाने गए की ही अभिव्यक्ति या लेखन है तो इसमें इतना तनाव क्यों? यह क्यों का प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है।
विषय ज्ञान पूर्व की स्थिति
1 तनाव का प्रथम कारण यह है कि पूरी तैयारी नहीं है। अथवा आत्मविश्वास की कमी है कि परीक्षा कैसी होगी? अभिभावक क्या कहेंगे?
2 अब प्रश्न है कि पूरी तैयारी क्यों नहीं है? क्योंकि विषय वस्तु का ज्ञान प्राप्त कैसे किया है? यह प्रक्रिया आज बताई नहीं जाती, इस प्रक्रिया का ज्ञान विद्यार्थी को नहीं है, सच कहा जाए तो अधिकतर अभिभावकों को भी नहीं है। इस प्रक्रिया को “भारतीय संस्कृति और चिंतन” के दिव्य प्रकाश में जाना सा सकता है। किसी विषय वस्तु को जानने की वास्तविक और उचित प्रक्रिया यह है – तत् विज्ञानार्थं स गुरुमेव अभिगच्छेत समितपाणि: (मुण्डक उप. 1/2/12)। तद विद्धि प्राणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ( गीता 4/34)।

इस प्रकार “समितपाणि”, “प्राणिपात” और “प्रतिप्रश्न” जानने, ज्ञान प्राप्त करने के लिए (डाउट क्लियर के लिए) अत्यन्त उपयोगी अवयव हैं। शिष्य जिज्ञासु भाव से गुरु / अध्यापक की शरण में जाय किंतु खाली हाथ नहीं; हाथ में श्रद्धा भाव की पूंजी लेकर जाना चाहिए। मन में दंभभाव युक्त शुल्क/फीस की पूंजी लेकर नहीं कि इतनी फीस देता हूं और इसके बदले पढ़ाना अध्यापक का कार्य है। मन, मस्तिष्क जब दंभ रहित होगा, खाली होगा तभी ज्ञान, विद्या से भरेगा। यदि पहले से ही मन, मस्तिष्क दंभ से भरा होगा कुछ भी बताया, सिखाया जाएगा वह स्थानाभाव के कारण छलक कर बाहर आ जाएगा। कुछ भी पल्ले नहीं पड़ेगा।
अतः अब यह विद्यार्थी का अपना व्यतिगत दायित्व है कि विनम्र भाव से विद्यालय जाय, ज्ञान प्राप्त करे और सार्थक प्रतिप्रश्न भी करे।… प्रतिप्रश्न जिज्ञासा और तर्कयुक्त हो। इस क्या, क्यों और कैसे की जिज्ञासा द्वारा विषय वस्तु को सुस्पष्ट करे और सरल बनाए। आज की शब्दावली में “विश्लेषण प्रक्रिया” द्वारा, “एनालिकल प्रोसेस” से जाने। शिक्षक में श्रद्धा, विश्वास और शिष्य के सीखने की ललक, विनम्रता दुरूह विषय को भी अत्यंत सरल बना देती है।
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विज्ञान के युग में जिस प्रकार उन्नत वृक्ष से “कलम”, या कटिंग कर नई उन्नत पौध तैया की जाती है उसी प्रकार हम अपनी संतति रूपी पौध को तैया करना चाहते हैं। किंतु बच्चे पेड़ पौधे नहीं है।
उत्तम संतति हेतु हमें उर्वर बीज, स्वस्थ वातावरण और कुशल किसान, कुशल कुंभकार बनाना पड़ेगा। मूल को ही सीचना होगा, तना, पत्ते, पुष्प सिंचन अधिक लाभकारी नहीं है – “रहिमन सीचो मूल को फुलही फ़लही अघाय”। मिट्टी रूपी शिष्य को तैयार करना पड़ता है। किंतु शर्त है – “बाहर बाहर थाप दे अंतर हाथ संभाल”। गुरु और अभिभावक दोनों को ही संतति, शिष्य पौध की देखभाल करनी पड़ेगी, तैयारी करनी पड़ती है। दूसरी ओर शास्त्र सूत्र समितपाणि, प्राणिपात और सेवया भाव शिष्य के मानस पटल विकसित करेगा। विद्यार्थी को आत्मसेवा करनी पड़ेगी। अपने वस्ता, यूनिफॉर्म और जूते, मोजे, टाई, बेल्ट की इज्जत करनी होगी। जो वस्त्र और वास्ते का मान सम्मान नहीं करेगा वह अपने लक्ष्य, मूल उद्देश्य को कितना सम्मान दे पाएगा? यह सोचने की बात है। विद्यार्थी के रूचिपूर्ण लक्ष्य के प्रति अभिभावक को सहायक होना पड़ेगा, अपनी भावना और आप ई अपेक्षा नहीं थोपनी चाहिए।
विषय ज्ञान पश्चात की स्थिति
1 ध्यान रहे ज्ञान के बाद विनम्रता आती है, दंभ, अहंकार नहीं। विषय वस्तु के ज्ञान प्राप्ति के बाद अब तैयारी तो पूरी है किंतु उपयुक्त शब्द, सार्थक/ तकनीकी शब्द चयन में कठिनाई आती है।
2 यदि परीक्षार्थी इन दोनों में ही सक्षम हैं तो “अभिव्यक्ति या लेखन समय” निर्धारित समय से अधिक समय ले लेता है। अथवा सर्वश्रेष्ठ उत्तर, व्यापक संदर्भ की लालसा में अधिक समय निकल जाता है और शेष प्रश्नों के लिए पर्याप्त समय नहीं बचता जिससे शेष प्रश्नों के साथ सम्यक न्याय नहीं हो पाता।
फलत: अपूर्ण उत्तर और कम प्राप्तांक। परीक्षार्थी का असंतोष। आजीविका हेतु संकट, फ़लतः तनाव, निराशा और हताशा…। इस तनाव और निराशा का एक प्रमुख कारण यह भी है कि अगली कक्षाओं में प्रवेश, मनोवांछित संस्थानों में चयन केवल प्राप्तांक के आधार पर ही होता है। मेधासूची (मेरिट) बनाने का आधार यही “प्राप्तांक” ही होते हैं। संचित ज्ञान नहीं होता, अभिव्यक्त ज्ञान जो उत्तर पुस्तिका में लिखा गया है, उसका प्राप्तांक ही एकमात्र आधार होता है।
3 हमारी परीक्षा प्रणाली कुछ ऐसी है जिससे परीक्षार्थी का समग्र मूल्यांकन नहीं हो पाता और अपेक्षाकृत अपने से कम कुशल व्यक्तित्व के चयन पर कुशलतर छात्र/व्यक्ति क्षोभ ग्रस्त, क्रोधित और कभी कभी विद्रोही भी हो जाता है। यह तनाव और असंतोष प्रायः किसी न किसी विकृति और अवसाद का कारण भी बन जाया करता है। इस तनाव से न केवल परीक्षार्थी ग्रस्त हैं अपितु माता पिता, अभिभावक और शिक्षक, संस्थान भी ग्रस्त हैं। उन्हें केवल परिणाम चाहिए। परिणाम ही उन्हें ख्याति, प्रख्याति और ऐश्वर्य प्रदान करेगा, लोकेषणाओं को तृप्त करेगा।
अतएव तनाव निराकरण अथवा समाधान हेतु, तनाव से मुक्ति हेतु यह अत्यन्त आवश्यक होना चाहिए कि –
(क) परीक्षा की उचित तैयारी करें। कम से कम शब्दों में अथवा विस्तार से अभिव्यक्त करने की कुशलता प्राप्त किया जाय।
(ख) जितने अंक का प्रश्न हो उसी के अनुरूप लघु या दीर्घ उत्तर भी दिए जायें।
(ग) समय का ध्यान रखें, एक प्रश्न में यदि अधिक समय लगेगा तो अधिक से अधिक उस प्रश्न हेतु निर्धारित उच्चतम अंक ही प्राप्त होंगे, उससे अधिक कभी नहीं।
(घ) समय नियोजन के अभाव में अधूरे, अपूर्ण उत्तर पर आधे अधूरे अंक प्राप्त होंगे। इसका कारण आपके पास “उत्तर का ज्ञान नहीं, समय का अभाव होना है” और यह आपकी लापरवाही और अकुशलता की श्रेणी में परिगणित किया जाएगा।
अतः परीक्षार्थी लिखित परीक्षा हो या मौखिक अथवा साक्षात्कार अपने सर्व श्रेष्ठ कौशल का प्रयोग उचित शब्दों में, प्रतीकों, चित्रों के साथ निर्धारित समय सीमा में करने का सतत अभ्यास करें।
अभिभावक और संस्थान इसके लिए समय समय पर टेस्ट लेकर इन कमियों को दूर कराएं और तनाव तथा अवसाद को जीवन से दूर भगाएं।

डॉ जयप्रकाश तिवारी
बलिया लखनऊ, उत्तर प्रदेश
