विशेष लेख: ऐसा है सितम्बर का महीना और हिन्दी भाषा का महत्व

हिन्दी भाषा भाषी नागरिकों, साहित्यकारों और हिन्दी प्रेमियों के लिए माह सितम्बर बहुत ही महत्वपूर्ण है। साहित्यकारों के लिए यह पूरा माह एक उत्सव जैसा होता है। भारतीय संविधान में “हिन्दी” को राजभाषा के रूप में माह सितम्बर 14, 1949 को सम्मिलित करने का सुखद निर्णय किया गया था। अनुच्छेद 343(1) में यह उल्लेख किया गया है कि हमारी राजभाषा हिन्दी होगी तथा उसकी लिपि देवनागरी होगी। तब से अबतक हिन्दी राजभाषा से “राष्ट्रभाषा” होने की गौरवपूर्ण पद प्राप्ति ओर टकटकी लगाए देख रही है और वहीं क्यों भारत वर्ष में सर्वाधिक बोली जाने वाले हिन्दी भाषी भी लगातार एक आशा भरी दृष्टि से टकटकी लगाए हुए है।

हिन्दी भाषियों का उत्साह इतना कि कुछ हिंदी प्रेमी 1 सितम्बर से 14 सितंबर तक और कुछ 14 सितंबर से 28 सितंबर तक “हिन्दी पखवाड़ा” के नाम से यह उत्सव मनाते हैं। राजकीय संस्थानों, गैर राजकीय संस्थानों, शिक्षण संस्थानों में ही नहीं, निजी घरों में भी छोटे छोटे आयोजन होते देखे गए हैं, यह है अपनी भाषा के प्रति स्नेह, प्यार और अनुराग। इस प्रकार यह पूरा माह ही हिन्दी की खट्टी – मीठी बातों में, प्रशंसा, आलोचना और उसकी की समीक्षा में ही व्यतीत हो जाता है।

शेष बचा खुचा समय भी अनेक साहित्यकारों के जन्म दिवस अथवा निर्वाण दिवस आयोजनों में बीत जाता है किंतु चर्चा वहां भी हिन्दी की “दशा और दिशा” पर ही केंद्रित होती है। पूरा सितंबर माह हिंदीमय हो उठता है किंतु एक टीस और दर्द तो रहता ही है उसके “राष्ट्रभाषा” न बन पाने का। नेताओं और सरकारों द्वारा कोरे आश्वाशन ही मिलते रहे आज तक, कार्यरूप परिणति, क्रियान्वयन नहीं हो पाया आजतक। उन साहित्यकारों को नमन और उनके साहित्यिक अवदान की चर्चा में यह बिंदु स्वतः ही आ जाता है।

कुछ साहित्यकार जिनका सुदृढ़ नाता जन्म दिवस या निर्वाण दिवस के रूप में माह सितम्बर से सदा के लिए जुड़ गया है जिन प्रमुख हैं –

01 सितम्बर (जन्म) दुष्यंत कुमार।

07 सितम्बर (निर्वाण) रामबृक्ष बेनीपुरी।

09 सितंबर (जन्म) भारतेंदु हज़ारिश्चन्द्र।

11 सितंबर (निर्वाण) महादेवी वर्मा।

11 सितंबर (निर्वाण) चंद्रधर शर्मा गुलेरी।

18 सितंबर (जन्म) काका हाथरसी।

18 सितंबर (जन्म) बालमुकुंद दास।

23 सितंबर (जन्म) रामधारी सिंह दिनकर

25 सितम्बर (जन्म) दीनदयाल उपाध्याय।

और अंत में एक निवेदन सभी देशवासियों से-

एकल रूप में हम सब भारतवासी
एक-एक अक्षर हैं ‘हिंदी वर्णमाला’ के,
जब जुड़ते हैं सब एक – एक कर
नियम से, स्नेह से, तब बन जाते हैं –
सुन्दर, प्रेरक, सार्थक – ‘सदवाक्य’.

बन जाते हैं – ‘गीत’ और ‘गान’,
रच जाते हैं – कहानी और उपन्यास.
सृजते हैं – साहित्य और महाकाव्य.
जिसमे निभाते हैं साथ – ‘विराम चिह्न’,
और मात्राएँ धुन बन के, साज बन के;
ध्वनि, संगीत मधुर आवाज बन के.

उनका पथ करते है – ‘प्रशस्त’,
संगीत के सप्त स्वर, पाणिनि के
नियम और माहेश्वर के प्रसिद्द सूत्र.
जब इन अक्षरों से बनते हैं –
शब्द विन्यास, गद्यांश और पद्यांश;
तब खिल उठती है- हमारी सभ्यता,
हमारी संस्कृति, हमारी प्रकृति,
हमारे ज्ञान-विज्ञान, धर्म-सत्कर्म.

परन्तु यही अक्षर जब भटकते हैं,
आपस में एक दूजे की राह रोकते;
लड़ते-भिड़ते हैं, शब्द विन्यास के
नियमों को तोड़ते हैं, मरोड़ते हैं –
तब साहित्य और समाज दोनों,
हो जाते हैं – कुंठित’ और ‘विकृत’.

श्रेष्ठ उपन्यास और श्रेष्ठ काव्य का
सृजन – प्रणयन रुक जायेगा.
साहित्य के नाम पर विकृत साहित्य
परोसा जायेगा और भावी पीढ़ी को
भटकाने का सारा दोष;
हम पर-आप पर ही मढ़ा जायेगा

इसलिए आज आवश्यकता है –
अक्षर – अक्षर से भिड़े नहीं,
श्रेष्ठता – वरिष्ठता की होड़ में
हम पड़े नहीं…
अन्यथा श्रेष्ठ कविता, श्रेष्ठ कहानी,
श्रेष्ठ उपन्यास और श्रेष्ठ काव्य का
सृजन – प्रणयन रुक जाएगा

साहित्य के नाम पर विकृत साहित्य
परोसा जायेगा और भावी पीढ़ी को
भटकने – भटकाने का सारा दोष
हम पर आप पर ही मढ़ा जाएगा।

-डॉ जयप्रकाश तिवारी
बलिया, उत्तर प्रदेश।

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