भारत के महान समाज सुधारकों में महात्मा ज्योतिराव फुले का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। ऐसे महान महात्मा की 11 अप्रैल को जयंती है। यह जयंती केवल एक स्मरण दिवस नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और शिक्षा के महत्व को पुनः स्थापित करने का अवसर है।
19वीं सदी में जब भारतीय समाज गहरी कुरीतियों, जातिगत भेदभाव और अंधविश्वासों में जकड़ा हुआ था, तब फुले ने इन बंधनों को तोड़ने का साहसिक कार्य किया। उन्होंने समाज के उस वर्ग के लिए आवाज उठाई, जिसे सदियों से शिक्षा और सम्मान से वंचित रखा गया था।
फुले का सबसे बड़ा योगदान शिक्षा क्षेत्र का विकास करने में रहा है। उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर 1848 में देश का पहला बालिका विद्यालय खोला। यह उस समय एक क्रांतिकारी कदम था, जब महिलाओं को शिक्षा से दूर रखा जाता था। सावित्रीबाई फुले स्वयं भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं और उन्होंने नारी शिक्षा के क्षेत्र में एक नई दिशा दी।
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महात्मा फुले ने केवल शिक्षा तक ही अपने कार्य को सीमित नहीं रखा। उन्होंने जातिवाद और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ खुलकर संघर्ष किया। 1873 में उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य समाज में समानता और न्याय स्थापित करना था। इस संगठन ने शोषित वर्गों को एकजुट कर उनके अधिकारों के लिए संघर्ष का मार्ग प्रशस्त किया।
फुले ने बाल विवाह, सती प्रथा और अन्य कुरीतियों का भी विरोध किया। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और समाज में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए कार्य किया। उनके विचारों में मानवता सर्वोपरि थी।
आज के समय में भी महात्मा फुले के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। शिक्षा, समानता और सामाजिक जागरूकता के बिना किसी भी समाज का विकास संभव नहीं है। विशेष रूप से पिछड़े वर्गों और वंचित समुदायों के उत्थान के लिए फुले के सिद्धांत आज भी मार्गदर्शक हैं।
महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती हमें यह संदेश देती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए साहस, शिक्षा और एकता आवश्यक है। उनके दिखाए मार्ग पर चलकर ही हम एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज का निर्माण कर सकते हैं। अंततः, फुले केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचारधारा है। यह एक ऐसी विचारधारा जो हर युग में समाज को नई दिशा देती रहेगी।

कमलेकर नागेश्वर राव ‘कमल’
कवि-लेखक-अनुवादक
9848493223
