केंद्रीय हिंदी संस्थान में आज़ादी के अमृत महोत्सव की गूंज, ‘दक्षिण भारत के लोककाव्यों में राष्ट्रीय चेतना’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

हैदराबाद: केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद केंद्र के सभागार में आज़ादी के महोत्सव के उपलक्ष्य में ‘दक्षिण भारत के लोककाव्यों में राष्ट्रीय चेतना’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई। संगोष्ठी के संयोजक तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान क्षेत्रीय निदेशक डॉ गंगाधर वानोडे थे। उद्घाटन सत्र में अध्यक्ष केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की निदेशक प्रो बीना शर्मा, मुख्य अतिथि हैदराबाद विश्वविद्यालय के समकुलपति प्रो आर एस सर्राजु, तथा बीज वक्ता आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखापट्टणम के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो एस एम इकबाल, प्रो शशि मुदिराज, डॉ आर सुमनलता, प्रो आईएन चंद्रशेखर रेड्डी, प्रो एस एन शर्मा, प्रो ऋषभदेव शर्मा, डॉ अहिल्या मिश्रा, डॉ वी वेंकटेश्वर राव, डॉ पी घनाते, नराकास-1 के अध्यक्ष डॉ अहमद मिन्हजुद्दीन एवं अन्य गणमान्य व्यक्ति तथा पूर्व छात्र तथा शोधार्थी उपस्थित थे।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं अतिथि सम्मान के साथ हुआ। संस्थान गीत के पश्चात डॉ सी कामेश्वरी द्वारा गणेश स्तुति तथा सरस्वती वंदना प्रस्तुत की गई। अतिथियों का स्वागत एवं परिचय डॉ गंगाधर वानोडे ने दिया। उद्घाटन सत्र का सफल संचालन डॉ सी कामेश्वरी ने किया। बीज वक्ता प्रो एस एम इकबाल ने विषय वपन करते हुए इसके विविध आयामों को स्पष्ट किया। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि मनुष्य मूल प्रवृत्तियों के साथ जन्म लेता है, इसके साथ ही उसके अंदर सूक्ष्म भावनाएँ तथा विचार निःसृत होते रहते हैं। इन्हें अभिव्यक्ति की आवश्यकता होती है। सृजित कला रूपों में लोकवार्ता सबसे प्राचीन विधा है। इसे परंपरा आधारित ज्ञान कहा जा सकता है। लोक अभिव्यक्ति के विविध रूप हैं जैसे- लोकगीत, लोकनाट्य, लोकगाथा, लोककथा, लोक कलाएँ, लोक खेलकूद तथा लोक इलाज आदि। यह चिंतनीय प्रश्न है कि अलिखित लोक साहित्य आज भी उपेक्षित रह गया है। तेलुगु और कन्नड़ के लोक रूपों मे ‘बुर्र कथा’ स्वतंत्रता आंदोलन के समय राजनीतिक आज़ादी के अर्थ को समझाकर ग्रामीण लोगों में जागृति पैदा की। लोक साहित्य का संग्रह करना कठिन कार्य है। यह खेतों और खलिहानों में किसानों के श्रम परिवहन के लिए गाया जाता है। लोक साहित्य के संग्रह की दृष्टि से दक्षिण के अन्य राज्यों की तुलना में कर्नाटक में अधिक कार्य हुआ है।

मुख्य अतिथि प्रो आर एस सर्राजु ने अपने वक्तव्य में कहा कि दक्षिण के लोक काव्यों में राष्ट्रीय चेतना प्रचुर मात्रा में पायी जाती है। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन की बात करते हुए खादी वस्त्रों के निर्माण और गांधी के आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को महत्वपूर्ण बताया। खादी का आंदोलन, चरखे का आंदोलन था। उद्घाटन सत्र की अध्यक्ष केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की निदेशक प्रो बीना शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेषण का है।’ इस पंक्ति को उद्धृत करते हुए भारत की प्राचीन खोजों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने देशप्रेम एवं राष्ट्रभक्ति की पंक्तियों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि राष्ट्रीय चेतना को जगाए रखना हमारा कर्तव्य है। अंत में आभार ज्ञापन संगोष्ठी संयोजक डॉ गंगाधर वानोडे ने प्रस्तुत किया।

तत्पश्चात प्रथम सत्र की शुरूआत हुई। प्रथम सत्र की अध्यक्षता हैदराबाद विश्वविद्यालय की पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो शशि मुदिराज ने की। वक्ता के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवयित्री डॉ आर सुमनलता ने ‘तेलुगु लोककाव्यों में राष्ट्रीय चेतना’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत देश उत्तर और दक्षिण में बँटा है। दक्षिण भारत क्षेत्र में चार प्रमुख भाषाएँ तमिल, कन्नड, मलयालम एवं तेलुगु हैं। दक्षिणी पठार का सबसे बड़ा तट समुद्र से जुड़ा है। उन्होंने अपने वक्तव्य में 16 महाजन पदों की चर्चा की। पहले तेलंगाना के लिए ‘अष्मक’ शब्द का प्रयोग किया गया है। फूटी कौड़ियों का संबंध जनपद से है।

इन्होंने लोकगीत की व्याख्या करते हुए कहा कि लोक वह है जहाँ पशु-पक्षी, जीव-जंतु रहते हैं। राजाओं के साथ उनके राज्य की सीमाएँ बदल गई। पहले आंध्र के लोगों को मद्रासी कहा जाता था क्योंकि आंध्र मद्रास रेजीडेंसी के अंतर्गत आता था। ग्रीक इडलियस और ओड़सी को विश्लेषित करते हुए कहा कि यह ‘वीर काव्य’ है। इसमें ‘होनर’ ने दस वर्ष के युद्ध में से एक वर्ष के युद्ध का चित्रण किया है। वीर भोग्या वसुंधरा के कारण ही ‘वीर काव्य’ की रचना हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि 1857 के पहले भी राष्ट्रीय चेतना की चिंगारी दक्षिण में जली। केरल में वेलुनाचार्य ने अपने पिता की मुत्यु के बाद ब्रिटिश के विरूद्ध लगभग नौ वर्ष तक युद्ध लड़ा। ‘पलनाटी वीर भारतम्’ तथा ‘कोमुरमु भीम’ पर भी अपने विचार रखे। गोंडा रामजी ने नारा दिया ‘जल, जमीन, जंगल प्रकृति मेरा है।’

प्रो आई एन चंद्रशेखर रेड्डी ने ‘तेलुगु लोककाव्यों में भाषा विमर्श’ विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारत में वेदों का जो महत्व है वहीं लोक जीवन में लोकवार्ता का भी है। लोक साहित्य की एक शाखा लोककाव्य भी है। वेद अलिखित थे, बाद में लिखे गए। लोक साहित्य पहले जन प्रचलित होता है बाद में लिखा जाता है। पहले काव्य में सब कुछ आता था। गद्य विधा के प्रचलन के कारण आज काव्य कम है। लोक साहित्य के लिए तेलुगु में लोककथा, लोककाव्य, तेलुगु लोककाव्य शब्दों को प्रयोग किया जाता है। उन्होंने गरमल सत्यनारायण के गीतों को उद्धृत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोककथा बनाना और लोककथा लिखना अलग-अलग है तथा पंत की ‘प्रथम रश्मि‘ को उद्धृत किया और बताया कि प्रथम रश्मि एवं उषा स्त्रीलिंग और सूर्य पुल्लिंग क्यों है? इसके लिए आंध्र में प्रचलित उदाहरण को प्रस्तुत किया।

अंत में कहा कि लोकगीत सुनाकर बिना भाषा के उसकी चर्चा नहीं हो सकती है। लोक भाषा, लोक गीत भाषा आम भाषा है। काव्य में कवि एक छंद अलंकार एवं बिंब योजना की बात करता है। लेकिन लोक कवि अलंकार, छंद, बिंब की आशा नहीं चाहता है। वह केवल भाषा संप्रेषण चाहता है। अंत में बाँझ स्त्री से संबंधित आंध्र लोक गीत को प्रस्तुत किया। आंध्र लोक साहित्य में यह भी वर्णित है कि जिनको संतान नहीं होती उसे अंतर्वेदी में स्नान कराने से संतान पैदा होती थी। तेलुगु में 30 लोक रामायण हैं। उत्तर रामायण में मीनाक्षी, चंद्रनखा, सूर्पनखा, एक ही स्त्री है। चंद्रनखा को राम ने सीता की नौकरानी के रूप में रख दिया था। लोक काव्य का उद्देश्य चित्रात्मक भाषा के प्रयोग एवं शब्दों के माध्यम से चित्र उपस्थित करना है।

प्रो ऋषभदेव शर्मा ने ‘हिंदी की समृद्धि में दक्खिनी का योगदान‘ विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि हैदराबाद दक्कन का दरवाजा है। दक्खिनी के विकास में मुहम्मद बिन तुगलक की भूमिका है। इसके विकास में हरियाणा और पंजाब के लोगों का योगदान है जो उत्तर से आकर वहाँ बस गए। भाषा का विकास सामासिक संस्कृति के रूप में हुआ है और ये शब्द ही दक्खिनी के आधार हैं। दक्खिनी हिंदी में समन्वय की भावना है। दक्खिनी को राजभाषा और धर्मभाषा का गौरव प्राप्त है। उत्तर भारत के लोग जो साहित्य और अनुभव लाए थे उसी पर अनुभव साहित्य का प्रणयन हुआ था। दक्खिनी में पहले गद्य रचना हुई। हिंदी में बाद में गद्य रचना हुई है।

अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो शशि मुदिराज ने कहा कि लोक काव्य में बनी बनाई सामग्री नहीं है। यहाँ राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन स्थानीय स्तर पर विकसित हुआ। निजाम शासन का भारत में 1948 में विलय तेलंगाना का मुक्ति आंदोलन था। गद्दर लोक गायक के रूप में प्रसिद्ध है। कौमी तराना का दुनिया में जयकार था। इस सत्र का संचालन भवन्स कॉलेज की सहायक प्रोफेसर डॉ सुषमा देवी ने किया तथा आभार ज्ञापन डॉ गंगाधर वानोडे ने किया।

द्वितीय सत्र काव्य गोष्ठी सत्र रहा। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ अहिल्या मिश्रा, वरिष्ठ साहित्यकार, हैदराबाद ने की। मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय हिंदी संस्थान की निदेशक प्रो बीना शर्मा, प्रो ऋषभदेव शर्मा, डॉ वेणुगोपाल भट्टड उपस्थित थे। मंचस्थ अतिथियों के सम्मान के बाद काव्य पाठ प्र्रारंभ हुआ।

डॉ राजीव सिंह ने गुरजाड़ा अप्पाराव की स्व-अनूदित रचना की पंक्तियाँ सुनाई। प्रो बीना शर्मा ने ब्रज क्षेत्र पर आाधरित लोकसाहित्य गीत को प्रस्तुत किया। सुश्री विजय लक्ष्मी ने कन्नड की स्व-अनूदित रचना पढ़ी जिसका शीर्षक है-‘राष्ट्रीय चेतना’। एफएम सलीम ने दक्खिनी गीत प्रस्तुत किया। डॉ जीजे प्रसन्न कुमारी ने राष्ट्रीयता पर आधारित मलयालम गीत प्रस्तुत किया। डॉ महेंद्र कुमार ठाकुर ने ‘अच्छे दिन’ शीर्षक से व्यंग्य कविता प्रस्तुत की। डॉ सुमनलता ने पहली आंध्र कवयित्री उटकुरू लक्ष्मी कांतम के बारे में चर्चा करते हुए उनकी कविता का वाचन किया। डॉ एजिल वेंधन ने तमिल कविता का अनुवाद हिंदी में प्रस्तुत किया। श्री वहीद पाशा कादरी ने पैरोडी कविता प्रस्तुत की। इन्होंने दक्खिनी गीत भी प्रस्तुत किए। श्री देवप्रसाद मायला ने ‘आओ हम सब मिलकर रहें’ कविता का गायन किया। डॉ सुरेश कुमार मिश्र ने ‘जाने से पहले’ शीर्षक से व्यंग्य गीत प्रस्तुत किए।

डॉ आशा मिश्रा ‘मुक्ता’ ने ‘देश क्या है क्या बताऊँ’ कविता प्रस्तुत की। कवि अजीत गुप्ता ने भारतीय राजनीति पर व्यंग्य करते हुए कविता प्रस्तुत की। सुश्री मीरा जोशी ने ‘हूँ मैं एक चेतना’ कविता की पंक्तियों को उद्धृत किया। तेलुगु के कवि प्रो एसएम इकबाल ने गुरजाडा अप्पाराव और श्री श्री (श्रीरंगरम श्रीनिवास) महाकवियों की स्व-अनूदित कविता प्रस्तुत की। तमिल भाषी सुश्री जयश्री चारी ने ‘राष्ट्रीय चेतना’ शीर्षक से सुंदर कविता प्रस्तुत की। श्री परमेश्वर जी ने बाल कविता ‘साबुन‘ शीर्षक से प्रस्तुत की। डॉ के श्याम सुंदर ने ‘पोट्टी श्रीरामुलु’ की अनूदित कविता सुनाई। कवि श्री वेणु गोपाल भट्टड ने प्रारंभ में कुछ पंक्तियां से काव्य पाठ शुरू किया। उसके बाद तुकांत हाइकू, कणिकाएँ, हास्य व्यंग्य कविताएँ सुनाई गई।

‘तेवरी’ के प्रवर्तक प्रो ऋषभदेव शर्मा ने काव्य पाठ में यथार्थबोध और जन जागृति पर आधारित कविता की बहुत ही सुंदर प्रस्तुति की। इन्होंने प्रेमगीत भी प्रस्तुत किया। काव्य गोष्ठी सत्र की अध्यक्ष डॉ अहिल्या मिश्रा ने मुक्तक कविता की सुंदर प्रस्तुति की। राष्ट्रप्रेम पर आधारित कविता का वाचन भी किया। डॉ महेंद्र कुमार ठाकुर ने ‘करोना एक लव स्टोरी’ पुस्तक संस्थान की निदेशक प्रो बीना शर्मा को भेंट किया। इस सत्र का संचालन डॉ आशा मिश्रा एवं श्री अजीत गुप्ता ने किया। आभार ज्ञापन हैदराबाद केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक डॉ गंगाधर वानोडे ने प्रस्तुत किया। संगोष्ठी प्रतिवेदन श्री चंद्र प्रताप सिंह ने प्रस्तुत किया। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

Recent Comments

    Archives

    Categories

    Meta

    'तेलंगाना समाचार' में आपके विज्ञापन के लिए संपर्क करें

    X