प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा (1957) के प्रतिनिधि कविता संग्रह ‘इक्यावन कविताएँ’ में संकलित कविताएँ विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक विषयों पर आधारित हैं। इन कविताओं में कवि ने मानवीय भावनाओं, सामाजिक अन्याय और आध्यात्मिक विचारों को गहराई से व्यक्त किया है। उनकी कविताएँ न केवल समकालीन सामाजिक संदर्भों को उजागर करती हैं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और दार्शनिक चिंतन को भी स्पर्श करती हैं। उनकी लेखन शैली और विषयवस्तु की गहराई उन्हें हिंदी साहित्य के बड़े साहित्यकारों की परंपरा में खड़ा करती है। उनकी कविताओं में निराला की तरह ही विद्रोह, प्रेमचंद की तरह ही सामाजिक यथार्थ और महादेवी वर्मा की तरह ही आध्यात्मिक गहराई देखी जा सकती है। उनकी कविताएँ साहित्य की इस समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाती हुई प्रतीत होती हैं।
कवि ने अपनी कविताओं में सामाजिक अन्याय और विषमता के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया है। उदाहरण के लिए, कविता “औरतें औरतें नहीं हैं!” में महिलाओं के प्रति समाज में व्याप्त हिंसा और उत्पीड़न को चित्रित किया गया है। यह कविता महिलाओं को केवल शारीरिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित होने वाली वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि संस्कृति और समाज की धुरी के रूप में प्रस्तुत करती है। इस तरह की सामाजिक संवेदनशीलता और यथार्थवादी दृष्टि उन्हें प्रेमचंद की परंपरा से जोड़ती है, जिन्होंने अपने लेखन में सामाजिक अन्याय और शोषण के विभिन्न रूपों को उजागर किया था। ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ भी उसी तरह समाज के गहरे सच को उजागर करती हैं और पाठकों को सोचने के लिए मजबूर करती हैं। उनकी कविताओं में महिलाओं के प्रति समाज के दोहरे मानदंडों और उनके साथ होने वाले अत्याचारों को बहुत ही सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है। यह कविता न केवल महिलाओं के प्रति समाज की क्रूरता को उजागर करती है, बल्कि उनकी शक्ति और संघर्ष को भी दर्शाती है।
मानवीय भावनाओं की गहराई को व्यक्त करने में ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ अद्वितीय हैं। कविता “दुआ” में एक पिता और पुत्र के बीच के संबंधों की मार्मिकता को दर्शाया गया है। यह कविता पिता (परमात्मा) से पुत्र (कवि) की प्रार्थना के रूप में है, जिसमें पुत्र चाहता है कि वह जीवन में लोकहित से प्राप्त होने वाले संतोष और परिपूर्णता को महसूस कर सके। इस तरह की भावनात्मक गहराई और मानवीय संबंधों को चित्रित करने की क्षमता पाठक को महादेवी वर्मा की कविताओं की याद दिलाती है, जिन्होंने अपनी रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं को बहुत ही सूक्ष्मता से व्यक्त किया था। ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ भी उसी तरह पाठकों के मन को छूती हैं और उन्हें अपने जीवन के संबंधों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। उनकी कविताओं में पारिवारिक प्रेम, मानवीय संबंधों की नाज़ुकता और जीवन के छोटे-छोटे पलों की महत्ता को बहुत ही सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है।
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आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों को व्यक्त करने में भी ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ बहुत प्रभावशाली हैं। कविता “सूरज होने का दर्द” में सूरज को एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अपने अस्तित्व के दर्द को झेलते हुए भी निरंतर प्रकाश बिखेरता है। यह कविता जीवन के संघर्ष और उसके बावजूद निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इस तरह के आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों को व्यक्त करने की क्षमता उन्हें निराला और महादेवी वर्मा जैसे कवियों की परंपरा से जोड़ती है, जिन्होंने अपनी कविताओं में जीवन के गहन सत्यों को उजागर किया था। ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ भी उसी तरह जीवन के संघर्ष और उसके अंदर छिपी शक्ति को दर्शाती हैं। उनकी कविताओं में आध्यात्मिकता और दर्शन का समन्वय देखा जा सकता है, जो पाठकों को जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण देता है।
राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य को व्यक्त करने में तो ख़ैर ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ बहुत प्रभावशाली हैं ही। वह उनका मुख्य काव्यक्षेत्र है। उदाहरणस्वरूप कविता “धर्मयुद्ध जारी है” में कवि ने समाज में धर्म के नाम पर होने वाले झगड़ों और हिंसा को व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। यह कविता धर्म के नाम पर होने वाले झूठ और पाखंड को उजागर करती है और समाज को इससे ऊपर उठने की प्रेरणा देती है। इस तरह के व्यंग्य और सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करने की क्षमता उन्हें नागार्जुन और धूमिल जैसे कवियों की परंपरा से जोड़ती है, जिन्होंने अपनी कविताओं में समाज की विभिन्न विसंगतियों को उजागर किया था। ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ भी उसी तरह समाज के विभिन्न पहलुओं को बहुत ही सूक्ष्मता और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविताओं में राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य का प्रयोग बहुत ही सटीक और प्रभावशाली है, जो पाठकों को समाज की विभिन्न विसंगतियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
भाषा और शैली के स्तर पर भी ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ बहुत प्रभावशाली हैं। उनकी भाषा सरल और मारक है, जो सामान्य जन की भाषा से जुड़ी हुई है। इससे उनकी कविताएँ सहज और समझने में आसान बन गई हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में प्रतीकों, रूपकों और मिथकों का भी सुंदर प्रयोग किया है, जो कविताओं को और भी गहरी और अर्थपूर्ण बनाता है। इस तरह की भाषा और शैली उन्हें हिंदी साहित्य के बड़े कवियों की परंपरा से जोड़ती है, जिन्होंने अपनी कविताओं में सरल और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग किया है। उनकी कविताओं में भाषा की सरलता और गहराई का समन्वय देखा जा सकता है, जो उनकी कविताओं को और भी प्रभावशाली बनाता है। विवेच्य कविताओं में और भी अनेक उदाहरण हैं जो कवि की साहित्यिक प्रतिभा और सामाजिक संवेदनशीलता को दर्शाते हैं।
जैसा कि प्रवीण प्रणव ने कहा है- “इन कविताओं से गुज़रना किसी चुंबकीय रास्ते से गुज़रने जैसा है, जहाँ इन कविताओं के अंश पाठकों की आत्मा से चिपक जाते हैं और फिर देर तक उन्हें गुदगुदाते, कचोटते, कोसते और ढाढ़स बँधाते रहते हैं।”
इस प्रकार, ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं। उनकी कविताएँ हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाती हुई प्रतीत होती हैं और उनकी रचनाधर्मिता को प्रमाणित करते हुए उन्हें बड़े साहित्यकारों की परंपरा में खड़ा करती हैं। ये पाठकों को न केवल सोचने के लिए प्रेरित करती हैं, बल्कि समाज और जीवन को एक नए जनपक्षीय दृष्टिकोण से देखने के लिए आमंत्रित भी करती हैं।
समीक्षित पुस्तक: इक्यावन कविताएँ (कविता संकलन) लेखक व कवि : प्रोफेसर ऋषभ देव शर्मा
चयन और प्रस्तावना : प्रो गोपाल शर्मा
प्रकाशक : साहित्य रत्नाकर, कानपुर
स्करण-प्रथम, 2023/पृष्ठ- 136/ मूल्य-200 रुपये

समीक्षक: डॉ आल अहमद
सहायक आचार्य, हिंदी विभाग,
मुमताज़ पीजी कॉलेज, लखनऊ
मो. 9651876962.
