[नोट- हमारे खास मित्र और तेलुगु दैनिक ‘निर्देशम’ के मुख्य संपादक याटकर्ला मल्लेश ने खून से “लथपथ” आंदोलन: कब रुकेगी नक्सल-पुलिस हिंसा..? को धारावाहिक प्रकाशित करने की अनुमति दी है। इसके लिए हम उनके आभारी है। विश्वास है कि पाठकों और शोधकर्ताओं को ये रचनाएं लाभादायक साबित होगी।]

तेलुगु दैनिक ‘निर्देशम’ के मुख्य संपादक याटकर्ला मल्लेश की कलम से…
यह कहना उचित होगा कि जब देश में नक्सलवादी आंदोलन नहीं था, तब सभी गांव जमींदारों के हाथों में कैद थे। उस गांव के जमींदार जो कहते थे, सभी को उसका पालन करना पड़ता था। एक प्रकार से गाँवों के सभी लोग जमींदार के गुलाम थे। आजादी के बाद भी गांवों के लोगों को आजादी नहीं मिली थी। आंखों के सामने हो रहे अन्याय के खिलाफ सवाल करने वाला कोई नहीं था। इतना ही नहीं, यदि गांव में किसी की बेटी, बहु, बहन, मां या सास सुंदर हो और इन पर गांव के जमीदार की बुरी नजर पड़ जाये तो उसके बगल में जाकर सोना ही पड़ता था। वर्ना, उस परिवार का जीना हराम कर दिया जाता था। लगभग उसी समय नक्सलवादियों (संघम) ने गांवों में प्रवेश किया। उन्होंने जमीदारों और कुलीनों के जुल्म को नजदीक से देखा और सबक सिखाना शुरू कर दिया। यह देखकर दलित और गरीब परिजन नक्सल को अपना भगवान समझने लगे।
इसका मुख्य कारण नक्सलबाड़ी में कॉमरेड चारू मजूमदार द्वारा लगाई गई आग दावनल की तरह फैल गई और उसकी चिंगारी श्रीकाकुलम के जंगल में आ गिरी। वही आग उत्तरी तेलंगाना में सूनामी की तरह फैल गई है। कोंडापल्ली सीतारामय्या के नेतृत्व में शुरू हुआ नक्सलवादी आंदोलन पूरे देश में फैल गया। शासनतंत्र, नौकरशाही, क्रूर विफलता, लुटेरों के साथ अधिकारियों की मिलीभगत ने आदिवासियों को हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया। तब से हर तेंदुपत्ता सीजन में वांछित मूल्य प्राप्त करने के लिए नक्सलियों के नेतृत्व में हड़ताल करना आदिवासियों के लिए आम बात हो गई है। जनजातीय संघर्षों के साथ मैदानी इलाकों में भी संघर्ष आरंभ हो गया। नक्सल ने ग्रामीण इलाकों में जमींदारों के खिलाफ आंदोलन के लिए लोगों को उकसाया। उस समय तक की गई अनेक अनियमितताओं के लिए कुलीनों को नक्सलियों ने सार्वजनिक अदालतों में सजाएं दी।
जीविका कमाने के लिए खाड़ी देशों में जाने वालों को साहूकारों द्वारा कुलीनों को एक सौ रुपये के लिए पांच से दस रुपये मासिक ब्याज के दस्तावेजों को सार्वजनिक अदालतों में जला दिए गए। यदि कोई गरीब कर्ज मांगता तो आपकी संपत्ति गिरवी रखकर खून निचोड़ने वाले साहूकारों की सरेआम पिटाई की गई। इसके बाद नक्सलियों ने सौ रुपये पर दो रुपये से अधिक ब्याज नहीं वसूल करने का कुलीनों को आदेश दिया। और इसे क्रियान्वित भी किया। एक शब्द में कहा जाये तो उस समय नक्सलवाद समांतर सरकार चला रहे थे।
गरीब लोगों ने सपने में भी नहीं सोचा था ऐसे अनेक अकल्पनीय परिणाम उनके आंखों के सामने होने लगे। इसीलिए वे नक्सलियों को भगवान के रूप में पूजने लगे। जहां कहीं भी नक्सली सभा या समारोह आयोजित होते तो लोग एक सैलाब की तरह वहां जाते थे। इसी समय नक्सलियों ने शराब की कीमत कम करने के लिए आंदोलन चलाया। शराब के ठेकेदारों से बातचीत की और सफलता प्राप्त की। जमींदारों और साहूकारों का शोषण बंद होने से गांवों की सूरत ही बदल गई। हर गांव के लोगों के चेहरे खुशी से खिलने लगे। नक्सलियों के साथ रहना, उनका सहयोग करना और उनकी ओर से संचालित संघम में शामिल होना आम आदमी के लिए स्टेटस सिंबल बन गया। पहले संघम के सदस्य बने और फिर नक्सलवादी बनकर भूमिगत हो गये।
गांव के गांव नक्सलियों के लिए अड्डे बन गये। तब ऐसे लग रहा था कि कुलीन वर्ग राज के स्थान पर नक्सली राज आ गया। तब तक कुलीन वर्ग देखरेख में होने वाले पंचायतों का आयोजन अब नक्सलियों की नेतृत्व में होने लगे। गांवों में आम लोगों की समस्याओं के अलावा भूमि विवाद, पति-पत्नी के बीच मतभेद, लड़ाई-झगड़े, प्रेम-प्रसंग ये सभी समस्याएं पंचायत के रूप में संघम के समक्ष आती थीं। नक्सलियों के फैसले से लोगों को तुरंत न्याय मिलता गया और कुलीनों की लूट बंद होती गई तो आम लोगों के दिलों में नक्सलियों के प्रति प्यार बढ़ता ही गया। गांवों में नक्सलवाद आंदोलन तेजी से फैलता जा रहा था, फिर भी पुलिस खामोशी से सब कुछ देखते रही थी। तब तक शासन ने नक्सल पर प्रतिबंध का फैसला नहीं लिया था।
वजह क्या हो सकती है…? उसका अस्तित्व भी तब तक खतरे में नहीं पड़ा था। सूचना प्रणाली भी बहुत विकसित नहीं हुई थी। पुलिस भी नक्सलियों की सार्वजनिक अदालतें और जमीदारों व कुलीनों को गांव-गांव में दी जाने वाली सजा को आम तौर पर होने वाली पंचायत प्रक्रिया ही मानती थी। सरकार भी इन गतिविधियों को चुपचाप देखती रही थी। कभी भी दमन का सहारा नहीं लिया। वास्तव में पुलिस के पास नक्सली आंदोलनों को दबाने की ताकत या हथियार नहीं थे। यदि फायरिंग करने की जरूरत पड़ती तो भी कलेक्टर से अनुमति लेनी पड़ती थी। इसी कारण नक्सलियों ने अनेक आम सभाओं का आयोजन कर पाये। सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किये। कभी-कभी पुलिस ने लाठियों से उसे नियंत्रित करने की कोशिश करते थे। उसी तरह नक्सली भी पुलिस को दुश्मन नहीं मानते थे। नक्सल और पुलिस कभी आमने-सामने नहीं लड़ते पाये गये। तब तक उनके पास तपंचा जैसे सामान्य स्तर से परे कोई खास हथियार नहीं होते थे।
इसी समय नक्सल वरिष्ठ दल मानने लगे कि ग्रामीण इलाकों में गरीबों का शोषण करने वाले जमींदारों की हत्या करने से लोग उन पर अधिक विश्वास करने लगेंगे। इसी विश्वास के चलते नक्सलियों ने करीमनगर जिले के जगित्याल तालुका के मद्दुनूर गांव के जमींदार राजेश्वर राव की हत्या करने की योजना बनाई। हत्या करने की कोशिश करने वाली एक्शन टीम के बारे में जैसे ही जमींदार राजेश्वर राव को पता चला तो वह भाग गया। इसके बाद तपालपुर में जमींदार पितम्बराव की हत्या करने गई एक्शन टीम को देखकर उसका दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। पहले इस मौत को माना गया कि नक्सलियों ने उसकी हत्या कर दी। इसके बाद नक्सलियों ने उसके बेटों की हत्या कर दी। इसी तरह तिम्मापुर में नक्सलियों ने लोगों से ब्याज के नाम पर अधिक रकम वसूल करने वाले एक साहूकार की हत्या कर दी। इसके तुरंत बाद चंदूबट्टा गांव में एक अन्य साहूकार की भी हत्या कर दी। इससे नक्सल के प्रति लोगों में विश्वास बढ़ने लगा।
इसी समय सरकार ने नक्सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित भूमागौड़ और किष्टय्या को गांव के जमींदार की हत्या के जुर्म में फांसी पर लटका दिया। जिस मुखबिर ने इन दोनों को पुलिस के हवाले किया था, उसे नक्सलियों ने बीच सड़क पर चाकू मारकर हत्या कर दी। प्रारंभ में बड़े बड़े जमींदारों ने छोटे भूस्वामियों पर होने वाले छिटपुट हमलों को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने सोचा कि हमला निहत्थे पर किया गया। हालाँकि, जब दिन-प्रतिदिन जमींदरों के गाँव में खून से लथपथ होने लगे तो वे चिंतित हो गए।
नक्सल आ गये… नक्सल आ गये… कहने में ही देरी, सभी गांव नक्सली आंदोलन की चपेट में ले लिया। यह देख जमींदारों की चिंता और बढ़ गई। तब तक सीना तानकर गांव में चलने वाले जमींदार भयभीत हो गए और सरकार की शरण चले गये। यह देख सरकार भी डर गई और सोचा कि यदि जमींदार उनके खिलाफ हो गये तो उनकी पद की नींव भी हिल जाएगी। परिणामस्वरूप सरकार ने अशांत क्षेत्र नियम को लागू किया। नक्सल आंदोलन पर दमन करना आरंभ कर दिया। करीमनगर जिले में अशांत क्षेत्र अधिनियम लागू किया गया। जबकि अन्य जिलों में दमनकारी नीतियां अपनानी शुरू कर दी। इस प्रकार से सरकार ने पुलिस को पूरे हथियार और हर प्रकार की कार्रवाई करने की छूट दे दी।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र पैसा कमाने का जरिया बन गया
सरकार ने अपनी पदों की रक्षा करने वाले जमींदारों की सुरक्षा के लिए कमर कस ली। सामान्य कानूनों के स्थान पर विशेष कानून को लेकर आई। पुलिस को विशेष ताकत प्रदान की। हथियार प्रणाली को मजबूत किया गया। हालाँकि, तब तक हर मंडल में एक थाना भी नहीं था। थानों में पुलिस की संख्या और हथियार भी कम थे। फिर भी सरकार से मिली नईं ताकत से पुलिस अधिक सशक्त हो गई। तब तक गांवों में सभी आंदोलन की गतिविधियां ‘संघम’ के नाम से होते थें। पुलिस ने अपना संपूर्ण ध्यान इन संघम पर केंद्रित कर दिया। जब भी जमींदारों के निवासों और महलों पर नक्सली हमले होते तो पुलिस ग्रामीणों पर टूट पड़ते थे, बेरहमी से मारते थे और गिरफ्तार करके थानें में बंद करके यातनाएं देना आरंभ कर दिया।
ध्यान देने वाली यह है कि पुलिस को नक्सल को शारीरिक रूप से पूरी तरह से खत्म करने का कोई इरादा नहीं था। क्योंकि संघम हमलों से पुलिस ने दूसरे तरीके से फायदा उठाना शुरू कर दिया। पुलिस सैकड़ों ग्रामीणों को गिरफ्तार करके थाने लेकर जाती और मुकदमा दायर करने की धमकी देकर पैसा कमाना शुरू कर दिया। उस समय नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम करने वाले पुलिस अधिकारी इस प्रकार की कमाई से कुबेर बन गए। इतना ही नहीं, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम करने के लिए एसआई, सीआई और डीएसपी में होड़ सी लगी रहती थी। क्योंकि पुलिस के लिए नक्सल प्रभावित क्षेत्र पैसा कमाने का जरिया बन गया था।
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రక్తంతో ‘‘తడిసిన’’ ఉద్యమం
నక్సల్స్ – పోలీసుల హింస ఆగేదెప్పుడు..?
ధారావాహిక – 05
భారత దేశంలో నక్సలైట్ ఉద్యమం లేనప్పుడు గ్రామాలన్నీ భూస్వాముల కబంద హస్తలలో ఉండేవి. ఆ ఊళ్లే దొర చెప్పిందే వేదం. భూస్వామికి ఆ ఊరు ప్రజలంతా బానిసలే. స్వాతంత్ర్యం సిద్దించినా ఆ పల్లెటూర్ లలో స్వేచ్ఛలేదు. కళ్ల ముందు జరుగుతున్న అన్యాయాన్ని ప్రశ్నించే నాథుడు కనిపించే పరిస్థితి లేదు. అందమైన ఆడపడుచు కూడా ఆ దొర పక్కలో పండాల్సిన పరిస్థితులు ఉండేవి. అగో ఆ సమయంలోనే నక్సలైట్లు రంగ ప్రవేశం చేశారు. నక్సల్భరీలో కామ్రేడ్ చారు మజుందర్ అంటించిన నిప్పు రవ్వ చెలరేగి శ్రీకాకుళం అడవులను అంటుకుంది. ఆ మంటనే ఉత్తర తెలంగాణలో ఉప్పెనలా ఉదృతమైంది.
కొండపల్లి సీతారామయ్య నాయకత్వంలో ప్రారంభమైన నక్సలైట్ ఉద్యమం దేశ వ్యాప్తంగా విస్తరించింది. రాజ్యం.. అధికారగణం.. దారుణ వైఫల్యం, దోపీడిదారులతో అధికారులు కుమ్మక్కై గిరిజనులను ఆయుధాల వైపు నడిపించాయి. అప్పటి నుంచి దాదాపు ప్రతి తునికాకు సీజన్లోనూ నక్సలైట్ల ఆధ్వర్యంలో సమ్మె చేపట్టి కావాల్సిన ధర సాధించుకోవడం అనవాయితీగా మారింది. గిరిజన పోరాటాలతో పాటే మైదాన ప్రాంత పోరాటాలు కొనసాగాయి. పల్లెల్లో భూస్వాములపై ఉద్యమాలకు గ్రామాలను కదిలించారు. అంతకాలం జరిపిన అనేక అక్రమాలకు దొరలను ప్రజాకోర్టులలో శిక్షించారు.
కలలో కూడా ఊహించని అనేక పరిణామాలకు కారకులైన (నక్సలైట్లు) అన్నలను సాక్షాత్తూ దేవుళ్లుగా ప్రజలు ఆరాధించారు. ఎక్కడ సమావేశాలు జరిపినా సభలు పెట్టినా వరదలా ప్రజలు రావడం మొదలైంది. ఇదే సమయంలో సారా ధర తగ్గించే ఉద్యమం చేపట్టిన నక్సల్స్ కాంట్రాక్టర్లతో చర్చలు జరిపి విజయం సాధించారు. భూస్వాముల, వడ్డీవ్యాపారుల దోపీడి నిలిచి పోవడంతో గ్రామాల రూపురేఖలు మారి పోయాయి. నక్సల్స్తో కలిసి ఉండటం వారికి సహాకరించడం, అన్నల ఆధ్వర్యంలో నడిచే సంఘంలో చేరడం సామాన్యుడికి స్టేటస్ సింబల్గా మారింది. సంఘ సభ్యులు కాలక్రమంలో మిలిటెంట్లుగా రూపాంతరం చెందారు.
గ్రామాలకు గ్రామాలే అన్నలకు ఆటపట్టుగా మారాయి. దొరల రాజ్యం స్థానే మిలిటెంట్ల రాజ్యం వచ్చింది. అంతదాకా దొరలు నిర్వహించిన పంచాయితీలు మిలిటెంట్లు నిర్వహించడం ప్రారంభించారు. గ్రామాలలో సామాన్యులు ఎదుర్కొనే సమస్యలతో పాటు భూవివాదాలు, భార్యభర్తల మధ్య విబేధాలు, కొట్లాటలు, ప్రేమ వ్యవహారం ఇలా అన్ని సమస్యలు దళం ముందుకు పంచాయతీ రూపంలో వచ్చేవి. తగిన న్యాయం కూడా జరగడం దండుగలు దడ్వత్ల పేరిట దొరలు చేసిన దోపిడీ నిలిచి పోవడంతో పల్లె గుండెల్లో ఎర్రెజెండాలు గూడుకట్టుకున్నాయి. గ్రామాల్లో శరవేగంగా నక్సల్స్ రాజ్యం విస్తరిస్తున్నా పోలీసులు మౌనాన్నే ఆశ్రయించారు. రాజ్యం ఇంకా నిర్భంధానికి సంకల్పించలేదు.
కారణం…? దాని ఉనికికి అప్పటికి ఇంకా ప్రమాదం ఏర్పడలేదు. సమాచార వ్యవస్థ సైతం అంతగా విస్తరించలేదు. ప్రజాకోర్టులు, శిక్షలు గ్రామాల్లో మాములుగా జరిగే దొమ్మిల వంటి సాధారణ నేరాల స్థాయిలోనే పోలీసులు పరిగణించారు. ప్రభుత్వం సైతం ఈ కార్యకలాపాలను మౌనంగా గమనించిందే తప్ప అణచివేతకు పూనుకోలేదు. నిజానికి ఉద్యమాలను అణిచివేసే అధికారాలు గాని ఆయుధాలు గాని పోలీసుల వద్ద లేవు. కాల్పులు జరపాలన్నా కలెక్టర్ అనుమతి తప్పని సరి కావల్సి వచ్చేది. అందువల్లే నక్సల్స్ బహిరంగంగా ఎన్ని సభలు పెట్టుకున్నా. రోడ్డెక్కి ఆందోళనలకు దిగినా. పోలీసులు లాఠీలతోనే అదుపు చేసేందుకు యత్నించేవారు. అలాగే నక్సల్స్ కూడా పోలీసులను శత్రువుగా పరిగణించలేదు. వారితో ఎప్పుడూ ముఖాముఖి పోరాటానికి దిగలేదు. అప్పటికి వారి వద్ద తపంచాలవంటి సాధారణ స్థాయికి మించిన ఆయుధాలు లేవు.
పల్లెలో పేద ప్రజలను దోపీడి చేస్తున్న భూస్వాములను హంతం చేయడంతో ప్రజలు తమపై విశ్వాషం పెంచుకుంటారని భావించింది అధిష్టాన వర్గం. కరీంనగర్ జిల్లా జగిత్యాల్ తాలుఖ మద్దునూర్ భూస్వామి రాజేశ్వర్రావు ఆరాచకలపై కన్నెర్ర చేసారు నక్సల్స్. అతనిని హత్య చేయడానికి యత్నించిన యాక్షన్ టీమ్ సమాచారం తెలుసుకుని పారి పోయాడు. ఆ తరువాత తపాల పూర్లో భూస్వామి పితాంబరావును హత్య చేయడానికి వెళ్లిన యాక్షన్ టీమ్ ను చూసి గుండెపోటుతో మరణించారు. నక్సల్స్ హత్య చేసారని భావించారు. అతని కుమారులపై దాడి చేసి ఖతం చేసింది నక్సల్స్ దళం.. అలాగే తిమ్మాపూర్లో వడ్డి పేరిటా ప్రజలను ఫీడిరచే వడ్డి వ్యాపారిని హత్య చేసారు నక్సల్స్. చందుబట్ట గ్రామంలో మరో వడ్డి వ్యాపారిని హత్య చేసారు.
నగ్జల్బరి ఉద్యమానికి ఆకర్శితులైన భూమాగౌడ్, కిష్టయ్యలు ఇద్దరు తమ ఊరు భూస్వామిని హత్య చేసినందుకు ప్రభుత్వం ఉరి తీసింది. ఈ ఇద్దరిని పోలీసులకు పట్టిచ్చిన ఇన్పార్మర్ను నడి రోడ్డులో నరికి హత్య చేసారు నక్సల్స్. మొదట్లో అక్కడక్కడా చిన్న చిన్న భూస్వాములపై జరిగిన దాడులకు బడా దొరలు స్పందించలేదు. మందీ మార్బలం లేని అర్భాకులపై దాడులు జరిగాయానుకున్నారు. అయితే రోజుకొకటిగా దొరల ఊళ్లు ఎర్రబారుతుంటే వారిలో కంగారు పుట్టింది.
నక్సల్స్ దళం వచ్చింది.. వచ్చిందీ అనుకుంటుండగానే అన్ని ఊళ్లనే ఉద్యమం చుట్టు ముట్టుంది. దీనితో భూస్వాములలో ఆందోళన హెచ్చింది. రొమ్ము విరుచుకు తిరిగిన ఊళ్లలో దొరలు భయపడే పరిస్థితి ఏర్పడగానే సర్కార్ శరణు జొచ్చాయి. తమ ఆయువు పట్టుగా ఉన్న దొరలు ఎదురు తిరిగితే పునాదులు కదుల్తాయన్న భయంతో సర్కారు రంగ ప్రవేశం చేసింది. ఫలితం కల్లోలిత ప్రాంత చట్టం. ఉద్యమ అణచివేత చర్యలు. కరీనంగర్ జిల్లాలో కల్లోలిత ప్రాంత చట్టం అమలు చేయగా మిగిలిన చోట్ల అణివేత విధానాలు ప్రారంభించారు. పోలీసులకు ఆయుధాలు, అధికారాలు దారాదత్తం చేశారు.
నిర్బంధపు నిశీధిలో పోరుబాటే వేగుచుక్క..
తన ఆయువు పట్టైన భూస్వామ్య రక్షణకు రాజ్యం నడుం బిగించింది. సాధారణ చట్టాల స్థానే ప్రత్యేక చట్టాలను తెచ్చింది. పోలీసులకు ప్రత్యేక అధికారాలను దారాదత్తం చేసింది. ఆయుధ వ్యవస్థను బలోపేతం చేసింది. అయినా అప్పటికింకా మండలానికో పోలీసుస్టేషన్ లేదు. పోలీసుల సంఖ్య, ఆయుధాల బలం తక్కువే. కొత్తగా సంక్రమించిన అధికారాలు పోలీసులకు బలానిచ్చాయి. గ్రామాల్లో అప్పటికి ఉద్యమ కార్యకలపాలన్నీ ‘సంఘం’ పేరు మీదే కొనసాగుతున్నాయి. పోలీసులు తమ దృష్టిని సంఘంపై కేంద్రికరించారు.
దొరల నివాసాలు గడీలపై దాడులు జరిగినపుడల్లా పోలీసులు విరుచుకు పడడం దొరికిన గ్రామస్థులను పట్టుక పోయి లాకప్లో పెట్టడం ప్రారంభించారు. ఉద్యమ కార్యకర్తలను భౌతికంగా నిర్మూలించాలన్న ఆలోచన వారిలో లేదు. సంఘం దాడులను పోలీసులు మరో మార్గంలో వినియోగించుకున్నారు. వందల సంఖ్యలో గ్రామస్తులను పట్టుకురావడం కేసులని బెదిరించి సొమ్ము చేసుకోవడం ప్రారంభించారు. ఆ సమయంలో నక్సల్స్ ప్రభావిత ప్రాంతాలలో పని చేసిన పోలీసు అధికారులు ఈ మార్గంలో కుభేరులు అయ్యారు. ప్రభావిత ప్రాంతాల పోస్టుల కోసం ఎస్ఐలు.. సీఐలు.. డిఎస్పిలు ఎగబడేవారు.
(6వ ఎపిసోడ్ లో కలుద్దాం..)
