बेंगलुरु : क्राइस्ट एकेडमी फॉर एडवांस्ड स्टडीज, बेंगलुरु के कला एवं मानविकी विभाग की ओर से “हिंदी राजभाषा सप्ताह” के अंतर्गत ‘अभिव्यक्ति-2026’ समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हिंदी को भारतीय भाषायी विविधता, सांस्कृतिक संवाद और युवा अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया। समारोह में 10 से अधिक बाहरी महाविद्यालयों ने भाग लिया, जबकि विभिन्न आंतरिक एवं अंतर-महाविद्यालयीन प्रतियोगिताओं में 100 से अधिक बहुभाषी विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।

समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में पधारे प्रतिष्ठित लेखक, कवि एवं आलोचक तथा अंतरिक्ष विभाग एवं परमाणु ऊर्जा विभाग की संयुक्त हिंदी सलाहकार समिति के गैर-सरकारी सदस्य प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने हिंदी की विकास-यात्रा को आदिकाल से आधुनिक हिंदी साहित्य और वर्तमान डिजिटल युग तक रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हिंदी का विकास किसी एक क्षेत्र, समुदाय या परंपरा का परिणाम नहीं, बल्कि भारत की विविध भाषाओं, संस्कृतियों और सामाजिक परंपराओं के निरंतर संवाद से निर्मित हुआ है।

प्रो. शर्मा ने हिंदी और कन्नड़ के बीच पारस्परिक भाषायी एवं सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि दक्षिण भारत ने हिंदी के विकास और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कर्नाटक सहित दक्षिण भारतीय राज्यों के साहित्यकारों, शिक्षाविदों, संस्थाओं और सामान्य जन ने हिंदी को अपनाकर उसके विस्तार को नई दिशा दी है। वहीं हिंदी ने भी दक्षिण भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों से निरंतर बहुत कुछ ग्रहण किया है। उन्होंने कहा कि हिंदी के विकास की कहानी केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें दक्षिण भारत सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों और भाषायी समुदायों की साझी भूमिका रही है।

प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार में ईसाई मिशनरियों, शिक्षण संस्थानों और मुद्रण परंपरा के योगदान का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार भाषा के विकास में विभिन्न समुदायों और संस्थाओं की भूमिका को व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। हिंदी की यात्रा अनेक भाषाओं, परंपराओं और संस्थागत प्रयासों के मेल से बनी है।

युवा पीढ़ी और बदलती तकनीक पर चर्चा करते हुए प्रो. शर्मा ने कहा कि विशेषकर जेन-ज़ी के बीच हिंदी को प्रभावी बनाने के लिए उसे उनकी भाषा, रुचियों, तकनीक और डिजिटल जीवन से जोड़ना होगा। हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में आधुनिक रोजगार की व्यापक संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। उन्होंने स्किल इंडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में भारतीय भाषाओं के अधिकाधिक प्रयोग और विकास पर जोर दिया। उनका कहना था कि तकनीक के दौर में भारतीय भाषाओं को पीछे हटने के बजाय नई तकनीकी संभावनाओं के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
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समारोह के अंतर्गत आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं ने विद्यार्थियों को हिंदी के पारंपरिक और आधुनिक दोनों रूपों से जुड़ने का अवसर दिया। ‘हिंदी क्लासिक सॉन्ग’ के माध्यम से विद्यार्थियों ने हिंदी गीत-संगीत की समृद्ध परंपरा को स्वर दिया, जबकि ‘दादी-नानी की कहानी’ ने मौखिक परंपरा और पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद को मंच प्रदान किया। ‘युवा पीढ़ी और मातृभाषा: भावनात्मक पहचान या केवल औपचारिकता?’ विषय पर वाद-विवाद में विद्यार्थियों ने भाषा और पहचान के समकालीन प्रश्नों पर विचार रखे। निबंध प्रतियोगिता का विषय ‘युवा पीढ़ी में भाषा, संस्कृति और पहचान का बदलता स्वरूप’ रहा। भाषण प्रतियोगिता में ‘हिंदी: राष्ट्र की एकता और अखंडता की भाषा’ विषय पर विद्यार्थियों ने अपने विचार व्यक्त किए, जबकि ‘हिंदी का नया अंदाज़: युवा, तकनीक और सोशल मीडिया’ विषयक रील मेकिंग प्रतियोगिता ने हिंदी को डिजिटल माध्यमों से जोड़ने का रचनात्मक प्रयास किया।
प्रतियोगिताओं में हिंदी क्लासिक सॉन्ग में सेंट जोसेफ कॉमर्स कॉलेज, भाषण प्रतियोगिता में दयानंद सागर कॉलेज, बेंगलुरु तथा वाद-विवाद प्रतियोगिता में दयानंद सागर कला, वाणिज्य महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने विजेता स्थान प्राप्त किया।
कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए डॉ. मिलन बिश्नोई के प्रयासों की विशेष सराहना की गई। उन्होंने हिंदी राजभाषा सप्ताह को केवल औपचारिक आयोजन न बनाकर उसे समकालीन भाषा-चिंताओं और युवा पीढ़ी की रचनात्मकता से जोड़ने का प्रयास किया। प्रतियोगिताओं के विषयों का चयन भी वर्तमान समय के महत्वपूर्ण प्रश्नों को ध्यान में रखकर किया गया, जिससे विद्यार्थियों को साहित्य, संस्कृति, परंपरा और डिजिटल मीडिया के बीच संबंधों को समझने का अवसर मिला। इस पहल ने विद्यार्थियों को अपनी रचनात्मक प्रतिभा सामने लाने के साथ-साथ हिंदी को नए माध्यमों और नए संदर्भों में देखने का मंच प्रदान किया।
बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक बेंगलुरु में, जहाँ भाषा को लेकर समय-समय पर विभिन्न विमर्श सामने आते रहे हैं, क्राइस्ट एकेडमी फॉर एडवांस्ड स्टडीज का यह प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। आयोजन ने हिंदी को किसी अन्य भारतीय भाषा के प्रतिस्पर्धी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय संवाद, सहभागिता, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और भारतीय भाषायी विविधता के सेतु के रूप में सामने रखा। हिंदी और कन्नड़ सहित भारतीय भाषाओं के बीच पारस्परिक सम्मान और सहयोग की भावना को केंद्र में रखकर आयोजित ‘अभिव्यक्ति-2026’ ने यह संदेश दिया कि भारत की भाषायी विविधता उसकी शक्ति है और युवा पीढ़ी इस विविधता को नई तकनीक, नए विचारों और नए अभिव्यक्ति-माध्यमों के साथ आगे ले जा सकती है।
कार्यक्रम के आयोजन में डॉ. मिलन बिश्नोई और डॉ. बालाकृष्णा सी की प्रमुख भूमिका रही। डॉ. निशा जैन और डॉ. दीपक कुमार गोंड ने सह-संयोजक के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समारोह में उप-प्राचार्य डॉ. विनय कुमार, विभागाध्यक्ष डॉ. थेपोरल एस., डॉ. ज्योत्सना आर्या सोनी तथा डॉ. गंगाधर रामाडगे सहित विभाग के शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
