इंकलाब जिंदाबाद!
मोदी हटाओ, देश बचाओ!
इंकलाब जिंदाबाद!
लेके रहेंगे आजादी!
गरीबी से आजादी!
भूखमरी से आजादी!
बेकारी से आजादी!
जातिवाद से आजादी!
मनुवाद से आजादी!
सामंतवाद से आजादी!
पूंजीवाद से आजादी!
इंकलाब जिंदाबाद!
लगभग एक महीने से कॉक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में दिल्ली का जंतर-मंतर ‘इंकलाब जिंदाबाद! मोदी हटाओ, देश बचाओ!…’ नारों से गूंज रहा है। यह तब और तेज हुआ जब पुलिस ने 18 जुलाई को सुबह 7.30 बजे पर्यावरणविद सोनम वांगचुक का अनशन भंग कर दिया। चलने, उठने और बैठने में असर्थ वांगचुक को सफेद कपड़ों में ढककर जबरन उठाकर ले गये। तब उनके शरीर पर दवाइयों को देने के लिए ‘इंजेक्शन’ लगे थे। तब उन्हें कितना दर्द हुआ होगा, यह अलग से कहने की जरूरत नहीं है।

यह देख सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके उसी समय अनशन पर बैठ गये। 20 जुलाई को ‘चलो संसद’ आंदोलन के आह्वान पर दिल्ली समेत अनेक राज्यों से हजारों की संख्या में युवक जंतर मंतर पहुंच गये। यह देख प्रशासन ने मेट्रो स्टेशन बंद कर दिये। फिर भी दोपहर तक प्रदर्शकारियों से जंतर-मंतर समेत आसपास के सभी मार्ग खचाखच भर गये। दीपके ने अनशन समाप्त कर दिया। हालांकि, चलो सांसद के लिए आगे नहीं निकल पाये। इसी बीच सीजेपी के दो प्रतिनिधि केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मिले और अपनी मांगे रखी।

तीन-चार बजे के आसपास पूरी तैयारी के साथ तैनात पुलिस और अन्य बलों ने शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे युवकों पर बर्बतापूर्वक लॉठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले दागे। इनमें से अनेक आंसू गैस के गोलों की एक्सपाइरी डेट खत्म हो चुकी थी। इस से बचने के लिए युवक इधर-उधर भागने लगे। खबरे आई हैं कि लॉठीचार्ज और आंसू गैस में सैकड़ों युवक घायल हो गये। वो कौन हैं और कहां से आये हैं। इसका किसी को कुछ पता नहीं है। ‘चलो संसद’ आंदोलन का नेतृत्व करने वाले दीपके जंतर मंतर के पास ही रहे गये। इससे पहले पुलिस ने कहा कि चलो संसद की अनुमति किसी ने मांगी नहीं और पुलिस ने अनुमति नहीं दी है।
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लोकतंत्र देश में शांतिपूर्वक आंदोलन करने का सभी को अधिकार है। सरकार को इसका सम्मान किया चाहिए। उनसे पहले बातचीत करना चाहिए। आमरण अनशन आंदोलन पर तो जल्द से जल्द बात करना चाहिए और हल निकाला जाना चाहिए। हालाँकि, वर्तमान सरकार ने वांगचुक के अनशन को समाप्त करने के लिए कोई पहल नहीं की है। खबरें आ रही है कि पुलिस प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले दर्ज कर रही हैं। इन तीन दिनों में देश और विदेशी मीडिया में जो खबरें प्रसारित और प्रकाशित की गई है।

हालांकि गोदी मीडिया कुछ अलग दिखाया और बताया। उसे देखकर मोदी सरकार के खिलाफ देश और दुनिया में प्रदर्शन और आंदोलन जारी है। संसद में विपक्षी दल छात्रों पर किये गये बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज पर चर्चा करने की मांग कर रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने सरकार से बात करके जवाब देने की बात कही है। ध्यान देने वाली बात यह है कि सदन का सर्वोच्च होता है और फैसला ले सकता है। बेचारे ओम…।

गौरतलब है कि एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने युवकों को ‘कॉक्रोच-कीड़े-मकोड़े’ कह दिया। इस टिप्पणी को देखकर अमेरिका में पढ़ाई कर रहे अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पोस्ट किया, ‘जी, हां हम कॉक्रोच-कीड़े-मकोड़े हैं। इसके लिए जिम्मेदार कौन है और हम ऐसे क्यों हुए।’ इस पोस्ट को देखकर करोड़ों फ़ॉलोअर जुड़ गये। कुछ ही दिन में यह संख्या करोड़ों में पहुंच गई। युवकों के हौसले बुलंद देखकर दीपके दिल्ली आ गये। परिणाम, जंतर-मंतर पर युवाओं की दहाड़ती आवाज से पूरा देश जाग उठा है।

जंतर-मंतर के आंदोलन ने पूरे देश को जगा दिया और एक जूट किया है। हर धर्म के लोगों ने देश के कोने-कोने से प्रदर्शनकारियों के लिए जोमैटो और स्विगी के जरिए लगातार खाना भेज रहे हैं। गुरुद्वारों से लंगर भेजा रहा है। मुस्लिम समुदाय भी पीछे नहीं है। कॉक्रोच जनता पार्टी का यह आंदोलन अब देश का आंदोलन बन गया। पूरा देश जान गया है कि वर्तमान सरकार राम के नाम, धर्म के नाम, गाय के नाम पर, हिंदू-मुस्लिम में दरार पैदा करके सत्ता में आई है।

जंतर-मंतर के आंदोलन को लेकर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने वकील के सवाल के जवाब में कहा कि वीडियो देखने का समय नहीं है। हमारा और आपका समय बर्बाद मत करो। जनता के टैक्स से वेतन पाने वाले जस्टिस को जनता पर हुए बर्बरता की तस्वीरें देखने के लिए तैयार नहीं है। हालांकि, इस जज को बीजेपी और आरएसएस के मीटिंगों जानें का समय जरूर मिलता है। ऐसे जजों से न्याय की कल्पना बेकार है। इसीलिए अब पूरा देश इस सरकार से पूरा हिसाब मांग रही है।

धन्यवाद चीफ जस्टिस आपके फैसले ने देश की जनता को जगाने और एकजूट करने में बड़ा योगदान दिया। भले ही आपकी टिप्पणी गलत रही है। लेकिन बहुत बढ़िया टॉनिक का काम किया। इतना ही देश की मीडिया में दो भागों में बट चुकी है। एक गोदी मीडिया और दूसरी सच्ची मीडिया। हर जगह गोदी मीडिया का बहिष्कार और सच्ची मीडिया का आदर किया जा रहा है। सरकार की चापलूसी करने वाली मीडिया को इससे सबक लेने की जरूरत है।

