[21 जून 2026 को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाएगा। यह 12वां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस है। इस साल का केंद्रीय विषय “स्वस्थ आयु के लिए योग” है। इस बार मुख्य योग दिवस कार्यक्रम कोलकाता के रेड रोड पर आयोजित किया जाएगा। इस योग कार्यक्रम सुबह 5 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हजारों लोग शामिल होंगे।]
आज के युग में योग शब्द अत्यंत प्रचलित हो चुका है। योग के प्रति लोगों की रुचि निरंतर बढ़ रही है। यह एक आश्चर्यजनक किंतु सत्य तथ्य है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है जिसके माध्यम से मन और शरीर के बीच संतुलन स्थापित किया जाता है। योग भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। यह मनुष्य के आंतरिक जीवन को परिष्कृत करके उसे आत्मिक शांति तथा आत्मसंतुष्टि प्रदान करता है।
वर्तमान समय में योग एक वैश्विक आंदोलन का रूप ले चुका है। यद्यपि कई लोग इसे केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित मानते हैं, परंतु वास्तव में योग का क्षेत्र इससे कहीं अधिक व्यापक है। योग व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। योग के विषय में अनेक ग्रंथों में वर्णन मिलता है। महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में योग की प्रसिद्ध परिभाषा दी है— “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।” सरल अर्थ- योग वह अवस्था है जिसमें मन की चंचल वृत्तियाँ, विचारों का अनावश्यक प्रवाह और मानसिक अशांति नियंत्रित हो जाती है। जब मन स्थिर और शांत हो जाता है, तब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव कर सकता है।
इसी प्रकार भगवद्गीता में कहा गया है— “समत्वं योग उच्यते।” (गीता 2.48) सरल अर्थ- जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, सफलता-असफलता जैसी परिस्थितियों में समान भाव बनाए रखना ही योग है। जो व्यक्ति हर परिस्थिति में संतुलित रहता है, वही योगी कहलाता है। योग केवल आसन करने का नाम नहीं है। यह एक जीवन-पद्धति है जो मनुष्य को संयमित, स्वस्थ और संतुलित बनाती है। योग के अभ्यास से शरीर में स्फूर्ति आती है, मानसिक तनाव कम होता है तथा आत्मविश्वास बढ़ता है।
भारतीय दर्शन के अनुसार प्रकृति तीन गुणों— सत्त्व, रज और तम से संचालित होती है। योग का उद्देश्य इन गुणों के प्रभाव को समझते हुए व्यक्ति को उच्चतर चेतना और आत्मविकास की ओर ले जाना है। इस प्रकार योग मानव जीवन को स्वस्थ, संतुलित और सार्थक बनाने का एक प्रभावी साधन है। आज के तनावपूर्ण जीवन में योग का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में योग को स्थान देना चाहिए।
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मनुष्य जीवन को 4 आश्रमों में विभाजित किया गया है- 1. ब्रम्हचर्य, 2. गृहस्थ, 3. वानप्रस्थ, 4. संन्यास। योग ज्ञान, वह ज्ञान है जो इन चारों आश्रमों में मनुष्य जीवन के लिए उपयोगी है। ऋषि अरविंद का योग के संबंध में कहना था कि, ‘All Life is Yoga’. अर्थात, मनुष्य जीवन का प्रत्येक कार्य ‘योग’ के साथ जुड़ा हुआ है। ‘योग’ को मुख्यतः 4 भागों में बाँटा गया है- 1. कर्म योग, 2. भक्ति योग, 3. राज योग, 4. ज्ञान योग। ये चारों प्रकार अलग-अलग प्रकार से अलग-अलग मनुष्य को उसके रूचि के अनुसार योगोन्मुख बनाता है।
इसी कारण से ‘योग’ को ‘साधना कर्म’ भी माना जाता है। अर्थात, योग का अभ्यास नित्यदिन करना चाहिए। जब व्यक्ति ‘योग’ को निरंतर साधना के रूप में अपनाने में सक्षम हो जाता है तब स्वाभाविक रूप में ही उसके मन, वचन, कर्म तीनों में गंभीरता, ठहराव, सृजनात्मकता और अवश्य ही शांतिपूर्ण चिंतन क्षमता दृष्टिगोचर होने लगता है। कई बार ऐसे प्रश्न मन में उठने लगते हैं कि क्या ‘योग’ करने के लिए सात्विक भोजन करना आवश्यक है? क्या ब्रम्ह्चारी ही ‘योग’ कर सकते है? क्या ‘योग’ विशेष आयु वर्ग के लिए है? इन सब प्रश्नों का सरल भाषा में उत्तर यही है कि ‘योग’ व्यक्ति से उसका समय, एकाग्र मन, लगन, योग पर विश्वास और परिश्रम माँगता है। बाकी ‘योग’ अपने शिष्य को स्वयं ही अपने ढंग से निखारता है, सँवारता है, उसे संतुलित जीवनशैली प्रदान करता है।
मनुष्य अपने जीवन में 4 लक्ष्यों को लेकर चलता है- 1. धर्म, 2. अर्थ, 3. काम 4. मोक्ष। ‘योग’ मनुष्य को इन चारों लक्ष्यों को संतुलित रूप में भोगकर मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने की शक्ति प्रदान करता है। इसलिए ‘योग’ को केवल व्यायाम न समझकर उसे जीवन को पूर्णता प्रदान करनेवाली साधना के रूप में अपनाने की आवश्यकता है।

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी
हैदराबाद, संपर्क – 96032 24007
