क्या 31 मार्च तक गणपति आत्मसमर्पण करते हैं या नया धमाका, पढ़ें ‘दिशा’ संपादक का विश्लेषात्मक लेख

पूरा देश जिस पल का इंतज़ार कर रहा था कि आखिरकार वह समय आ ही गया है। शनिवार को शाम 4 बजे खबर आई कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के सामने बड़े पैमाने पर माओवादी आत्मसमर्पण करने वाले हैं। जैसे ही यह खबर मीडिया में आई तो कयास लगाये जाने लगे कि मुख्यमंत्री की उपस्थिति में वरिष्ठ माओवादी नेता गणपति भी जरूर होंगे। लेकिन जब देखा गया, तो 130 विभिन्न स्तर के माओवादियों ने 124 विभिन्न प्रकार के हथियारों के साथ आत्मसमर्पण किया। हालांकि, उनमें गणपति नहीं थे। कोंडपल्ली सीतारामय्या के बाद इतनी प्रसिद्धि पाने वाले उस कामरेड को जल्द से जल्द जीवन की मुख्यधारा में लौटने की रेवंत रेड्डी ने अपील की है। उन्होंने कहा कि अगर वे आते हैं, तो उनकी जान की सुरक्षा की जाएगी और उनके स्वास्थ्य का इलाज भी कराया जाएगा।

ये सब बिना जवाब के सवाल हैं

तो आखिर सवाल उठता है कि सभी को इंतजार करवाने वाले माओवादी पार्टी के पूर्व सचिव गणपति उर्फ मुप्पाला लक्ष्मणराव ने आत्मसमर्पण क्यों नहीं किया? सच में वो कहाँ हैं? क्या वो नेपाल में हैं? या भारत में ही कहीं छिपे हैं? क्या कुछ मीडिया की तरह तेलंगाना एसआईबी को उसकी जानकारी मिल गई है? क्या वह उनकी हिरासत में हैं और आत्मसमर्पण के लिए राजी करने में देरी हो रही हैं? क्या इसी कारण अमेरिका में रहने वाले उसके बेटे से “पिताजी, एक बार दिखाई दीजिए” कहकर ऑडियो जारी करवाया गया? या फिर उनके बारे में आने वाली खबरें महज मीडिया की काल्पनिक हैं? क्या वह नेपाल में या किसी और देश में छिपे हुए हैं? या भारत के किसी बड़े शहर में या छोटे से कस्बे में हैं? क्या अमित शाह द्वारा दी गई डेडलाइन 2026 मार्च 31 तक वह चुप रहेंगे और उसके बाद सच का खुलासा करेंगे? ये सब बिना जवाब के सवाल हैं।

कोंडपल्ली सीतारामय्या और गणपति की प्रसिद्धि

आत्मसमर्पण सभा में मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा कि कोंडपल्ली सीतारामय्या को जितनी प्रसिद्धि मिली थी, उससे भी ज्यादा प्रसिद्धि गणपति ने पाई है। बीएड तक की पढ़ाई करके सरकारी अध्यापक के रूप में काम करने वाले गणपति एक महान बुद्धिजीवी है। उन्होंने जमीनी स्तर पर एक एरिया सेंट्रल ऑर्गनाइजर के रूप में काम किया और जगित्याल जैत्रयात्रा में किसानों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। भारत में क्रांतिकारी आंदोलन वाले सभी राज्यों और क्षेत्रों में घूमने का अनुभव गणपति को है।

Also Read-

एकीकृत माओवादी पार्टी का निर्माण

श्रीकाकुलम में नक्सली आंदोलन के कमजोर होने के बाद क्रांतिकारी शक्तियां निराशा में डूब गई थी। ऐसे समय में मुख्य रूप से आपातकाल के बाद तेलंगाना में आंदोलन को पुनर्जीवित कर पीपुल्स वॉर पार्टी की स्थापना करके चलाने वाले महान नेता कोंडापल्ली सीतारामय्या थे। फिर भी ढलती उम्र और स्वास्थ्य के बिगड़ जाने के कारण कोंडापल्ली सीतारामय्या का आंदोलन से दूर हो गये। राजनीतिक संतुलन खो जाते देख गणपति ने नेतृत्व संभाला और आंदोलन को 18 राज्यों तक फैलाया। साथ ही एकीकृत माओवादी पार्टी का निर्माण किया। उसके नेतृत्व में ही पीएलजीए का गठन हुआ। दक्षिण बस्तर, अबूझमाड़, सरंडा जैसे क्षेत्रों में गेरिल्ला संगठन बनाये गये। जिला स्तर पर माओवादी की जनतन सरकारें बनी और शासन किये। कोंडापल्ली सीताराय्या से भी ज्यादा जमीनीस्तर का अनुभव, लोगों की चेतना को समझने और आचरण को सिद्धांत से जोड़ने की क्षमता गणपति में हैं।

अद्भुत होगा यदि गणपति आत्मसमर्पण करते

ऐसा महान नेता गणपति… सोनू और देवजी जैसे सरकार के सामने आत्मसमर्पण करते है तो सच में इतिहास में एक अद्भुत ही होगा। अगर गणपति को इस बात का पता चलता कि बदलते सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक हालात में लंबे समय तक सशस्त्र संघर्ष मुमकिन नहीं है या आंदोलन व्यूह रचना में पिछड़ा है, यदि यह बात सीसी जान चुकी होती तो 2018 में पूरी पार्टी की स्ट्रेटेजी और टैक्टिक्स बदलने की कोशिश कर पाते। जैसा कि अब सोनू के कहने के अनुसार माओवादी पार्टी को लीगल बना दिया गया होता और कानून के दायरे में आंदोलन को निर्मित कर पाते। सीसी सीधे केंद्र सरकार से बातचीत करती और नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों की तरह शांति समझौता करके मुख्यधारा में शामिल हो जाते। तब कई नेता और साथी मारे जाने और फिर हथियारों के साथ और बिना हथियारों के सामूहिक आत्मसमर्पण नहीं होते।

Also Read-

गणपति की राय क्या थी?

केंद्रीय समिति के महासचिव गणपति को 2018 में स्वास्थ्य कारणों से विश्राम दिया गया और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के इंचार्ज बासवराजू को सचिव नियुक्त करने इसके पीछे क्या हुआ होगा? इस विषय को लेकर भी कई कयास लगाए जा रहे हैं। विश्लेषकों का कहना है कि पीपुल्स वॉर पार्टी के साथ एमसीसी के विलय के बाद सैन्य को प्राथमिकता मिली और राजनीतिक और पार्टी निर्माण दूसरे स्थान पर आ गया है। माना जा रहा है कि एमसीसी वर्ग के समर्थन से ही बासवराजू की नियुक्ति हुई थी। आत्मसमर्पण करने वाले सोनू ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा है कि, “2024 नवंबर में तीन पोलिटब्यूरो सदस्यों से मुलाकात हुई थी, तब मैंने पंथ (सिद्धांत) परिवर्तन के बारे में बहस की थी।” हालांकि, बासवराजू ने इसका विरोध किया और गणपति चुप रह गये। मतलब गणपति की राय क्या थी? क्या गणपति को लगता था कि दीर्घकालिक सशस्त्र संघर्ष विफल हो गया है? या वो पुरानी लाइन पर कायम है?

आंदोलन से दूर गणपति

सचिव पद से हटने के बाद गणपति पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के इंचार्ज हैं। वो अमृत नाम से कई बयान भी जारी किए हैं। इसका मतलब है कि उनका दंडकारण्य, तेलंगाना, झारखंड, एओबी जैसे कई आंदोलन क्षेत्रों से सीधा संपर्क टूट गया है। मध्य भारत के आंदोलन को बासवराजू ही देखते आ रहे है। ऐसे में आत्मसमर्पण करने वाले कार्यकर्ताओं से गणपति का पता लगाना असंभव है। उनके व्यक्तिगत स्टाफ और कोरियर को छोड़कर किसी और को उनके बारे में जानकारी नहीं होगी। फिर भी तेलंगाना पुलिस की हिरासत में गणपति होने की खबर पर विश्वास किया जा सकता है।

राजिरेड्डी और देवजी के आत्मसमर्पण की वजह से ही अफरातफरी?

हालांकि, सोनू और आशन्ना के हथियारों के साथ आत्मसमर्पण करने के बाद उन्हें द्रोही करार दिया गया और मीडिया को बयान जारी किया गया। बयान जारी करने वाले सदस्यों में सीसी सदस्यों में गणपति को छोड़कर सभी (चंद्रन्ना, सुजताक्का, मल्ला राजीरेड्डी, देवजी अन्य) ने हाल ही में आत्मसमर्पण कर दिया है और तेलंगाना के मुख्यमंत्री से मिले हैं। इससे गणपति के आत्मसमर्पण की ख़बरें मीडिया में आ गये हैं। लोगों ने इस पर यकीन कर लिया। पुराने रास्ते पर ही संघर्ष जारी रखने की बात करने वाले आत्मसमर्पण करने से यह संकेत मिले हैं कि पूरी पार्टी अब कानूनी रास्ते पर आ गई है। नतीजतन, तेलुगु दैनिक ‘दिशा” समेत सभी प्रमुख मीडिया ने गणपति के आत्मसमर्पण की ख़बर को प्रकाशित किया है।

क्या 31 मार्च तक गणपति का आत्मसमर्पण पक्का है?

अधिकतर नागरिक समाज का मानना ​​है कि अमित शाह की डेडलाइन 31 तारीख तक गणपति समेत बाकी सभी माओवादी नेता और सदस्य आत्मसमर्पण कर देंगे। यह भी कहा जा रहा है कि इस महीने के आखिर तक गणपति के आत्मसमर्पण पक्का हैं। नरेंद्र मोदी सरकार भी देश में गणपति के आत्मसमर्पण करने पर ही माओवाद का दौर खत्म करने की योजना बनाई है। अब देखना है कि भविष्य में क्या होने वाला है? क्या गणपति आत्मसमर्पण करते है? या सब कुछ शांत होने के बाद गणपति कोई हड़कंप बयान के साथ नया धमाका करने वाले है? यह तो वक्त ही बताएगा।

– दूडम मार्केंडेया
संपादक तेलुगु दैनिक ‘दिशा’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

Recent Comments

    Archives

    Categories

    Meta

    'तेलंगाना समाचार' में आपके विज्ञापन के लिए संपर्क करें

    X