‘रामायण के महत्वपूर्ण पात्र’ विषय पर एक लंबी परिचर्चा, पढ़ें इन वक्ताओं के विचार

लखनऊ (उत्तर प्रदेश) : अथर्व इंडिया अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान के तत्वाधान में संवाद कार्यक्रम में रामायण के महत्वपूर्ण पात्र विषय पर एक लंबी परिचर्चा डॉ जयप्रकाश तिवारी की अध्यक्षता में संपन्न हुई। वक्ताओं को अपनी मनपसंद पात्र चयन का अधिकार था और गूगल फॉर्म के माध्यम से वक्ता और पात्र/चरित्र का चयन कर अपना वैशिष्ट्य पूर्ण वक्तत्व रखने का अवसर दिया गया। कुछ वक्ताओं के वक्तव्य अत्यंत उच्चकोटि और शोध परक श्रेणी के थे।

डॉ करुणा पांडेय का “मंदोदरी” पर, डॉ सीमा सरकार का “भगवान शिव” पर, दीपांशु गौतम का “रावण” पर, सरोज शर्मा का “उर्मिला” पर, हेम का “मांडवी” पर, डॉ वीणा वादिनी का “विश्रवा” पर, मनोरमा सिंह का “सुलोचना” पर, डॉ पिंकी श्रीवास्तव का “दशरथ” पर, श्रेयांशी शतरूपा का “भरत” पर, सुप्रीति जी का “शूर्पणखा” पर वक्तव्य इसी कोटि के थे। अन्य वक्ताओं ने अच्छी सामग्री एकत्रित की थी किंतु लिपि बद्ध न होने के कारण निर्धारित समय में उस रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाए जितना श्रम और परिश्रम किया था।

ऐसे वक्ताओं से अनुरोध किया गया है कि की वे अपने वक्तव्य लिखित रूप में उपलब्ध करा दें जिससे उनका उचित उपयोग किया जा सके। वक्ताओं की संख्या अधिक थी और कार्यक्रम 11 बजे से प्रारम्भ होकर 2 बजे संपन्न होना था, वह 4 बजे तक चला। कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ जयप्रकाश तिवारी ने सभी वक्ताओं की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम की सबसे अच्छी बात यह रही कि वक्ताओं के चिंतन और आजीविका का क्षेत्र चाहे जो भी रहा हो, सभी ने अपनी संस्कृति और रामायण के पात्रों को समझने में अपने श्रम और समय दोनों का उपयोग किया। इस प्रवृत्ति की सराहना की जानी चाहिए। संवाद कार्यक्रम जनता को अपनी संस्कृति को समझने की ओर उन्मुख कर रहा है, यह संस्थान की सफलता है। जिज्ञासुओं को एक मंच देना संस्कृति की अनुपम सेवा है जिसे अथर्व इंडिया अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान के निदेशक डॉ वी बी पांडेय जी और पूरी टीम बधाई की पात्र है।

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रामायण की विषय वस्तु पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए कार्यक्रम अध्यक्ष ने कहा कि भारतीय संस्कृति का मुख्य उद्देश्य समाज में श्रेयस और प्रेयस, सुख और शांति की स्थापना के दिव्य सूत्र स्थापित हैं। दर्शन और उपनिषद ग्रंथों में यह सूत्र में, प्रतीक और बिंब रूप में है। समाज के लिए कठिन होने पर विभिन्न पौराणिक ग्रंथों में कथा, कहानी के माध्यम से तथा महाकाव्यों में ऐतिहासिक चरित्रों के कथानक से उन्हीं समाजोत्थान के दिव्य सूत्रों का प्रस्फुटन किया गया है। इन सूत्रों और चरित्रों का उद्देश्य दिव्य समाज की स्थापना और सामाजिक बुराइयों पर अच्छाइयों की जीत, दुर्गुणों पर सद्गुणों का विजय दिखाकर सभ्य, सुसंस्कृत समाज का सृजन है। रामायण की कथा का अपना एक पूरा दर्शन है।

एक शांत क्षेत्र (अयोध्या = अ+युद्ध) में अशांति से प्रारम्भ होकर चक्रमण, परिभ्रमण करते हुए, सभी प्रकार की अनित्य को परास्त करते हुए, अयोध्या को पुनः एक शांत नगरी के रूप में स्थापित करने का यदि समाज दर्शन है तो दशो इंद्रियों के शासक दशरथ का अपनी रानियों के रूप में कौशल्या (सत्व, ज्ञान शक्ति), कैकेई (रज, इच्छा शक्ति), सुमित्रा (तमस, सेवा, क्रिया शक्ति) में सामंजस्य शांति की अवस्था में चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ( राम, लक्ष्मण, भारत, शत्रुघ्न) की प्राप्ति है। तीनों गुणों में असंतुलन अशांति उत्पन्न करता है। यह रामायण की आध्यातिक कथा है।

इस प्रकार रामायण का अपना एक सुदृढ़ मनोविज्ञान भी है। आज आवश्यकता है कि रामायण और रामकथा की व्याख्या बहुआयामी और विविध संदर्भों में हों। संस्थान के निदेशक डॉ वी बी पांडेय ने इस प्रकार के कार्यक्रम निरंतर चलाए जाने की बात कही और अगले माह महाभारत के महत्वपूर्ण पात्र पर “संवाद” कार्यक्रम आयोजित करने और सभी प्रतिभागियों से लिखित वक्तव्य प्रस्तुत करने का आग्रह किया। इसके बाद उपस्थित सभी प्रतिभागियों को इस कार्यक्रम में भागीदारी सुनिश्चित करने पर हार्दिक आभार ज्ञापन कर कार्यक्रम को सम्पन्न किया गया।

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