जयंती पर विशेष : जनता के कथाकार थे मुंशी प्रेमचंद

31 जुलाई यानी आज मुंशी प्रेमचंद की जयंती है। ऐसे महान साहित्यकार को याद करना हमारा कर्तव्य बनता है। प्रेमचंद की उपन्यास एक से अधिक उनकी कहानियों में सामयिकता के अनेक चित्र भरे पड़े हैं। दहेज प्रथा और अनमेल विवाह के सजीव चित्रण निर्मला उपन्यास और कुसुम ,उद्दार आदि कहानियों के माध्यम से विश्व के सम्मुख आए हैं।

प्रेमचंद किसानों को शोषण और दमन से बचाना चाहते थे। देश की मुक्ति में नारी और दलित के साथ-साथ किसानों की मुक्ति भी थी। जिस के संबंध में प्रेमचंद ने दूसरे अंक में स्वराज्य से किसका हित होगा सिर्फ एक टिप्पणी में लिखा।

प्रेमचंद ने धार्मिक कुरीतियों पर कुठाराघात करते हुए उन्हें तोड़ने का प्रयास किया है। गोदान उपन्यास अपने शीर्षक से धार्मिक अनुष्ठान का प्रतीक होते हुए भी एक तीखा व्यंग्य है।

धर्म के नाम पर होने वाले अत्याचार और गरीब जनता का शोषण उनकी कई उपन्यासों में आया है विशेषकर गोदान उपन्यास के अंत में वे बताते हैं कि शोषण के सारे साधन भले ही पीछे रह जाए धर्म मनुष्य के अंतिम क्षणों का भी दोहन करता है।

‘महाजनी सभ्यता’ लेख में प्रेमचंद का भी मत है कि धन से अधिक धर्म शोषण की सीमा है। किंतु धर्म मूल्य और विश्वास का दोहन करता है। धर्म और ईश्वर के प्रति अनपढ़ एवं ग्रामीण जनता के मनोभावों का प्रेमचंद ने बडी गहनता से अभिव्यक्त किया है। प्रेमचंद हिंदी कथा साहित्य के सम्राट माने जाते हैं। प्रेमचंद ने सामाजिक उपन्यासों की रचना की जिनके द्वारा समाज में राष्ट्रीय चेतना डालना चाहते थे। प्रेमचंद की रचनाओं में जहां संघर्ष और पराजय है वहां जीवन की अदम्य साहस और आशा का प्रबल है।

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प्रेमचंद अपने जीवन काल में ही उपन्यास सम्राट बन गए। प्रेमचंद ने भाषा को एक ऐसा रूप प्रदान किया जो जनजीवन की भाषा मानी जाती हिंदुस्तानी भाषा रूप को जन भाषा में रूपांतरित किया। प्रेमचंद का समय हिंदी उर्दू के मिले-जुले रूप का समय था, जिसे हिंदुस्तानी कहा जाता था। प्रेमचंद ने अपनी रचना और लेखों के द्वारा इसी भाषा का समर्थन किया यह जनता की भाषा थी और प्रेमचंद जनता के लेखक थे।

प्रस्तावना
हिंदी उपन्यास और कहानी साहित्य के युग निर्माता उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का जन्म मुंशी अजायब लाल,आनंद देवी के गर्भ 31 जुलाई 1880 को काशी स्थित लमही नामक गाँव में हुआ। प्रेमचंद का असली नाम ‘धनपत राय’ था।ताऊ ने ‘नवाबराय’ नाम से पुकारा।

प्रेमचंद जब सात वर्ष के हुए तब उनकी मांँ का देहांत हो गया। इसके पश्चात उनके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया पिता का स्नेह प्राप्त होने पर भी प्रेमचंद का जीवन कष्टमय हो उठा।विमाता निष्ठुर एवं कर्कश थीं। पिता डाकखाने में नौकरी के कारण, वे दिन भर घर से बाहर होते और बालक प्रेमचंद विमाता के शासन में।

प्रेमचंद मांँ के अभाव की अनुभूति इतनी गहराई से करते थे कि ‘कर्मभूमि’ उपन्यास में मांँ के महत्व को चंद्रकांँत के मुख से निम्नलिखित शब्दों में कहलवाया है- “बचपन वह उम्र है जब इंसान को मोहब्बत की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है, उस वक्त पौधे को पूरी खुराक मिल जाए तो जिंदगी भर के लिए उसकी जड़े मजबूत हो जाती हैं। मेरी मांँ के देहांत के बाद मेरी रूह को खुराक नहीं मिलेगी वहीं भूख मेरी जिंदगी है।”

प्रेमचंद ने आठ साल तक फारसी पढी़, फिर अंग्रेजी शुरू की।सन् 1898में ट्यूशन पढा़ते हुए मैट्रिक पास किया और नौकरी करते हुए बी.ए पास की। मेधावी होने के कारण उन्होंने इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण होने के बाद, वे ‘सब डिप्टी इंस्पेक्टर’ के पद पर नियुक्त हुए। अस्वस्थ होने के कारण इस नौकरी को छोड़ कर वे बस्ती राजकीय विद्यालय में अध्यापक हो गये। यहां से उनका स्थानांतरण गोरखपुर हो गया।

असहयोग आंदोलन में नौकरी से त्यागपत्र देने के पश्चात प्रेमचंद अपने गांव चले आए और साहित्य सृजन में लग गये।

विवाह
पारिवारिक जीवन की दृष्टि से प्रेमचंद का जीवन विविध विषमताओं में पला था। इसका परिणाम है कि पहला विवाह असफल था और 1906में फागुन में प्रेमचंद का दूसरा विवाह मुंशी देवी प्रसाद की बाल विधवा कन्या शिवरानी देवी से हो गया। उनके दो पुत्र थे-श्रीपत रायऔर अमृत राय ।

व्यक्तित्व
प्रेमचंद का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, सादा और सहज किंतु असाधारण था। प्रेमचंद के सुपुत्र श्री अमृत राय प्रेमचंद की इसी आसाधारणता को रेखांकित करते हैं- “प्रेमचंद की सरलता सहज है। उसमें कुछ तो इस देश की पुरानी मिट्टी का संस्कार है, कुछ उसका नैसर्गिक शील है, संकोच है, कुछ उसकी गहरी जीवन दृष्टि है और कुछ उसका सच्चा आत्म गौरव है, जो किसी तरह के आत्म प्रदर्शन या विज्ञापन को उसके नजदीक घटिया बना देता है।”

व्यापक विचार धारा रखने वाले प्रेमचंद जी अत्यंत सहृदय व्यक्ति थे।दूसरों के दु:खों के प्रति सहानुभूति तथा संवेदनशील थे। वे स्वयं कहते थे कि ”मेरा जीवन सपाट, समतल मैदान है, जिसमें कहीं-कहीं गढे़ तो हैं पर टीलों, पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों और खंडहरों का स्थान नहीं है।”अर्थात प्रेमचंद अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना करने पर भी वे अपने जीवन को बहुत ही सामान्य समझते थे। वे अत्यंत सामान्य व्यक्ति के असामान्य रचनाकार थे।

साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परिवेश
प्रेमचंद की रचनाओं से तो भारत की अधिकांश जनता परिचित है। प्रत्येक साहित्यकार अपनी युग की परिस्थितियों और समस्याओं से प्रभावित होता है।वह उन परिस्थितियों एवं समस्याओं का चित्रण अपने साहित्य में करता है। प्रेमचंद की विचारधारा यू किन परिस्थितियों से प्रेरित और प्रभावित थी। प्रेमचंद के साहित्य का उचित मूल्यांकन करने के लिए उनकी समसामयिक परिस्थितियों का अध्ययन करना आवश्यक है। प्रेमचंद की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना,नारी विषयक दृष्टिकोण, दलित विमर्श और मुख्य रूप से किसानों के प्रति प्रेम पूर्ण दृष्टिकोण का चित्रण है। प्रेमचंद्र का जीवन आरंभ से अंत तक संघर्ष में रहा। प्रेमचंद ने सामाजिक परिस्थितियों और समस्याओं का वर्णन देश में व्याप्त दहेज प्रथा, विधवा विवाह, बंदूक, मजदूर ,शराबबंदी, जातिवाद ,हरिजनों का शोषण, शादी विवाह, मृत्यु भोज आदि में होने वाली फिजूलखर्ची को अपनी कथा साहित्य में माध्यम से चित्रित किया है।

सन् 1901में लिटरेरी जिंदगी शुरू की। प्रेमचंद में पढ़ने का बेहद चाव था। प्रेमचंद ने तिलिस्मे होशरूबा के कई खंड केवल दो वर्ष में ही पढ़ लिए थे। तिलिस्मे होशरूबा का एक-एक खंड लगभग 2000 पृष्ठ का था। इस पुस्तक के लेखक फौजी थे, जिन्होंने सम्राट अकबर के मनोरंजन हेतु अपनी कल्पना को शब्दबद्ध किया था। इस पुस्तक को प्रेमचंद ने केवल 13 वर्ष की आयु में ही पढ़ लिया था। प्रेमचंद ने एक स्थानीय बुक्सेलर के यहां से मौलाना शाह, पंडित रतनशाह सरशाह, मिर्जा रुसवा, मौलवी मोहम्मद अली आदि की उर्दू कथा पुस्तकें, नवल किशोर प्रेस से निकले पुराणों के उर्दू अनुवाद और रेनॉल्ड के उपन्यासों के अनुवाद को पढ़ा।

यह स्वाभाविक था कि प्रेमचंद पर स्वतंत्रता की भावना वातावरण का प्रभाव पड़े। इसके परिणाम स्वरूप प्रेमचंद ने नरमदल और गरम दल में गरमदल के विचारों का समर्थन किया। सन् 1908 में उनकी उर्दू में लिखी कहानियों का संग्रह ‘सोजे वतन’ जब्त हुआ। राष्ट्रप्रेम संबंधी कहानियों के इस संग्रह को देखकर गौरांग प्रभुओं का मन क्षुब्ध हो उठा और उन पर पाबंदी लगाई गई कि वे आगे इस प्रकार की रचनाएँ नहीं करेंगे ।उसी क्षण प्रेमचंद ने ‘धनपत राय’, और ‘नवाब राय’ नामों का परित्याग किया और एक नया नाम रख लिया वही प्रेमचंद।

प्रेमचंद ने सर्वप्रथम उर्दू में लिखना प्रारंभ किया था ।उनकी 1900 से 1906 की रचनाएँ ‘रूठी रानी’ (ऐतिहासिक उपन्यास), ‘किसान’, वरदान और प्रतिज्ञा है। ‘इसरारे मुहब्बत’ आवाजें खल्क पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशित हुआ था।

‘सेवासदन’ प्रेमचंद का हिंदी में लिखा पहला उपन्यास है जो सन 1916 में प्रकाशित हुआ। इसके पूर्व उर्दू में ‘असरारे मआविद’ उर्फ ‘देवस्थान रहस्य’ 1903 से 1905, ‘हम खुर्म हमसवाब'(1906), किसान(1908), जलवए ईसार(1912)आदि उपन्यास लिख चुके थे। ‘हम खुर्मा हमसवाब’ का हिंदी रूपांतर स्वयं प्रेमचंद ने किया था जो सन 1907 में ‘प्रेमा’ अर्थात् दो सखियों का विवाह शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।उनका तीसरा उपन्यास ‘जलवए ईसार’ हिंदी में वरदान शीर्षक से 1916 में प्रकाशित हुआ था। प्रेमचंद को हिंदी में प्रतिष्ठा दिलानेवाले उपन्यास ‘सेवासदन’ पहले उर्दू में ‘बाजार-ए-हुस्न’ से लिखा गया। प्रेमचंद के उपन्यास साहित्य को उनकी प्रवृत्तियों के आधार पर मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त किया जाता है- सामाजिक और राजनैतिक। सामाजिक वर्ग के अंतर्गत ‘वरदान’, ‘सेवा सदन’, ‘प्रतिज्ञा’, ‘निर्मला’, ‘गबन’ आते हैं, राजनैतिक वर्ग के अंतर्गत ‘प्रेमाश्रय’, ‘रंगभूमि’, ‘कायाकल्प’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ आते हैं।

रचनाएँ
प्रेमचंद ने लगभग एक दर्जन ग्रंथ,300कहानियाँ लिखीं।
प्रेमचंद की रचनाओं को 7 श्रेणियों में बांँटा जाता है।

  1. संपादित ग्रंथ- मनमोदक, गल्प समुच्चय, गल्प रत्न।
    2.अनूदित ग्रंथ-‘आनातोले’ कृत ‘थामस’ का अनुवाद ‘अहंकार’,इलियट कृत ‘साइलस मारनर’ का अनुवाद’सुखदास’,नाटक के रूप में ‘चांदी की डिबिया’,’हड़ताल’,’न्याय’और ‘सृष्टि का आरंभ’ को विशेष ख्याति प्राप्त है। टालस्टाय की कहानियों का भी अनुवाद किया तथा ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ पुस्तक को भी प्रस्तुत किया ।रतन नाथ सरशार कृत ‘फिसानये आजा़द’ का अनुवाद उन्होंने ‘आजाद कथा’ नाम से अनुवाद किया।
  2. जीवनी साहित्य- महात्मा शेष सादी, राम चर्चा,कलम- तलवार, न्याय, दुर्गादास।
    4.निबंध संग्रह-स्वराज्य के फायदे, कुछ विचार,साहित्य का उद्देश्य
    5.नाटक- संग्राम,कर्बला, प्रेम की वेदी,चंद्रहार ।
    6.कहानी संग्रह- सप्त सरोज, नवनिधि, प्रेम-पूर्णिमा, प्रेम- पचीसी, प्रेम-प्रसून, प्रेम-प्रतिमा, प्रेम-द्वादशी, अग्नि समाधि, समय यात्रा,सप्त-सुमन,प्रेम-सरोवर, प्रेरणा, नवजीवन, कुत्ते की कहानी, मानसरोवर 8भाग, कफन, जंगल की कहानियां, पाँचफूल
    7.उपन्यास- प्रेमा,वरदान, सेवासदन,प्रेमाश्रय, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा,गबन, कर्म भूमि, गोदान, दुर्गादास, मंगलसूत्र(अपूर्ण)।
    प्रेमचंद की उपन्यास एक से अधिक उनकी कहानियों में सामयिकता के अनेक चित्र भरे पड़े हैं। दहेज प्रथा और अनमोल विवाह के सजीव चित्रण निर्मला उपन्यास और कुसुम उद्दार आदि कहानियों के माध्यम से विश्व के सम्मुख आए हैं।

प्रेमचंद किसानों को शोषण और दमन से बचाना चाहते थे। देश की मुक्ति में नारी और दलित के साथ-साथ किसानों की मुक्ति भी थी। जिस के संबंध में प्रेमचंद ने दूसरे अंक में स्वराज्य से किसका हित होगा सिर्फ एक टिप्पणी में लिखा।

प्रेमचंद ने धार्मिक कुरीतियों पर कुठाराघात करते हुए उन्हें तोड़ने का प्रयास किया है। गोदान उपन्यास अपने शीर्षक से धार्मिक अनुष्ठान का प्रतीक होते हुए भी एक तीखा व्यंग्य है।

धर्म के नाम पर होने वाले अत्याचार और गरीब जनता का शोषण उनकी कई उपन्यासों में आया है विशेषकर गोदान उपन्यास के अंत में वे बताते हैं कि शोषण के सारे साधन भले ही पीछे रह जाए धर्म मनुष्य के अंतिम क्षणों का भी दोहन करता है।

‘महाजनी सभ्यता’ लेख में प्रेमचंद का भी मत है कि धन से अधिक धर्म शोषण की सीमा है। किंतु धर्म मूल्य और विश्वास का दोहन करता है। धर्म और ईश्वर के प्रति अनपढ़ एवं ग्रामीण जनता के मनोभावों का प्रेमचंद ने बडी गहनता से अभिव्यक्त किया है। प्रेमचंद हिंदी कथा साहित्य के सम्राट माने जाते हैं। प्रेमचंद ने सामाजिक उपन्यासों की रचना की जिनके द्वारा समाज में राष्ट्रीय चेतना डालना चाहते थे। प्रेमचंद की रचनाओं में जहां संघर्ष और पराजय है वहां जीवन की अदम्य साहस और आशा का प्रबल है।

प्रेमचंद अपने जीवन काल में ही उपन्यास सम्राट बन गए। प्रेमचंद ने भाषा को एक ऐसा रूप प्रदान किया जो जनजीवन की भाषा मानी जाती हिंदुस्तानी भाषा रूप को जन भाषा में रूपांतरित किया। प्रेमचंद का समय हिंदी उर्दू के मिले-जुले रूप का समय था, जिसे हिंदुस्तानी कहा जाता था। प्रेमचंद ने अपनी रचना और लेखों के द्वारा इसी भाषा का समर्थन किया यह जनता की भाषा थी और प्रेमचंद जनता के लेखक थे।

प्रेमचंद की रचना दृष्टि में उनकी राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक प्रतिबद्धता,नारी के प्रति सहानुभूति पूर्ण दृष्टिकोण, मध्यवर्गीय जीवन के अनुभव, किसानों और मजदूरों से प्रतिबद्धता, दलितों से सहानुभूति और सांप्रदायिक एकता की पक्षधरता स्पष्ट दिखाई देती है। प्रिंस ने अपने समय के तथ्यों को रचना के स्तर पर सत्य बनाकर प्रस्तुत किया।

साहित्य की विशेषताएँ
यह स्वाभाविक था कि प्रेमचंद पर स्वतंत्रता की भावना वातावरण का प्रभाव पड़े। इसके परिणाम स्वरूप प्रेमचंद ने नरमदल और गरम दल में गरमदल के विचारों का समर्थन किया। सन् 1908 में उनकी उर्दू में लिखी कहानियों का संग्रह ‘सोजे वतन’ जब्त हुआ। राष्ट्रप्रेम संबंधी कहानियों के इस संग्रह को देखकर गौरांग प्रभुओं का मन क्षुब्ध हो उठा और उन पर पाबंदी लगाई गई कि वे आगे इस प्रकार की रचनाएँ नहीं करेंगे ।उसी क्षण प्रेमचंद ने ‘धनपत राय’, और ‘नवाब राय’ नामों का परित्याग किया और एक नया नाम रख लिया वही प्रेमचंद।

प्रेमचंद ने सर्वप्रथम उर्दू में लिखना प्रारंभ किया था ।उनकी 1900 से 1906 की रचनाएँ ‘रूठी रानी’ (ऐतिहासिक उपन्यास), ‘किसान’, वरदान और प्रतिज्ञा है। ‘इसरारे मुहब्बत’ आवाजें खल्क पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशित हुआ था।

‘सेवासदन’ प्रेमचंद का हिंदी में लिखा पहला उपन्यास है जो सन 1916 में प्रकाशित हुआ। इसके पूर्व उर्दू में ‘असरारे मआविद’ उर्फ ‘देवस्थान रहस्य’ 1903 से 1905, ‘हम खुर्म हमसवाब'(1906), किसान(1908), जलवए ईसार(1912)आदि उपन्यास लिख चुके थे। ‘हम खुर्मा हमसवाब’ का हिंदी रूपांतर स्वयं प्रेमचंद ने किया था जो सन 1907 में ‘प्रेमा’ अर्थात् दो सखियों का विवाह शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।उनका तीसरा उपन्यास ‘जलवए ईसार’ हिंदी में वरदान शीर्षक से 1916 में प्रकाशित हुआ था। प्रेमचंद को हिंदी में प्रतिष्ठा दिलानेवाले उपन्यास ‘सेवासदन’ पहले उर्दू में ‘बाजार-ए-हुस्न’ से लिखा गया। प्रेमचंद के उपन्यास साहित्य को उनकी प्रवृत्तियों के आधार पर मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त किया जाता है- सामाजिक और राजनैतिक। सामाजिक वर्ग के अंतर्गत ‘वरदान’, ‘सेवा सदन’, ‘प्रतिज्ञा’, ‘निर्मला’, ‘गबन’ आते हैं, राजनैतिक वर्ग के अंतर्गत ‘प्रेमाश्रय’, ‘रंगभूमि’, ‘कायाकल्प’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ आते हैं।

कहानियों से संबंधित
प्रेमचंद की कहानियों में राष्ट्र के निर्माण की चिंता कई रूपों में व्यक्त हुई है।प्रेमचंद देश की आजादी को दलितों की आजादी और मुक्ति से जोड़कर देखते हैं।

प्रेमचंद की प्रसिद्ध और चर्चित कहानी ‘ठाकुर का कुआँ’ में प्रेमचंद ने दलितों के पानी पीने की समस्या को केंद्र में रखकर भारतीय परिवेश में दलितों की स्थिति का मार्मिक चित्रण किया है।

मुलिया नामक एक दलित स्त्री के स्वाभिमान, आत्मसम्मान और सौंदर्य को घासवाली कहानी का विषय बनाया है प्रेमचंद ने।

‘पूस की रात’ एक गरीब और दलित किसान की कहानी है,जो पूस की रात में अपने खेतों की रक्षा करने जाता है, परंतु उसकी रक्षा नहीं कर पाता और एक तरह से जानबूझकर अपने खेतों को नीलगायों से नष्ट होने देता। इसमें साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी व्यवस्था का खिलाफ विरोध दर्ज किया गया है।

प्रेमचंद की कहानियों की यह खासियत है कि उसका एक विषय नहीं होता और मुख्य विषय के अलावा तथाकथित कौन विषय भी खास महत्वपूर्ण होता है और कभी-कभी तो गांव लगने वाला विषय ही प्रमुख होता है।

‘ईदगाह’ में भारतीय संस्कृति के रास्ते में सरोबर भारतीय त्योहार ईद का जितना जीवंत, खुशनुमा, चुलबुला और उमंगों से परिपूर्ण चित्र प्रेमचंद ने खींचा है, वह दुर्लभ है।

‘बड़े भाई साहब’ दो भाइयों की कथा है।बच्चों के व्यक्तित्व के विकास और शिक्षा पद्धति के बारे में प्रेमचंद ने जो विचार एक शताब्दी पूर्व व्यक्त किए थे ,उसे आज एक बार फिर सही माना जा रहा है। इसमें ज्ञान विज्ञान की जानकारी के साथ बुनियादी ज्ञान को भी महत्व दिया गया है।

आदर्शोन्मुख यथार्थवाद
प्रेमचंद की विचारधारा में बराबर आदर्श और यथार्थ का समन्वय रहा है।उन्होंने स्वयं ऐसे दृष्टिकोण को ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ कहा है। ‘सेवा सदन’, ‘रंगभूमि’, ‘गबन’,कर्मभूमि’, प्रेमाश्रय’,’गोदान’ आदि सभी उपन्यासों में यह आदर्शोन्मुख यथार्थवादी विचारधारा सक्रिय रही है, जिसके कारण कथावस्तु और चरित्रों का विकास एक विशेष दिशा में होता है।

रूढियों का विरोध
प्रेमचंद की उपन्यास एक से अधिक उनकी कहानियों में सामयिकता के अनेक चित्र भरे पड़े हैं। दहेज प्रथा और अनमोल विवाह के सजीव चित्रण निर्मला उपन्यास और कुसुम उद्दार आदि कहानियों के माध्यम से विश्व के सम्मुख आए हैं।

प्रेमचंद किसानों को शोषण और दमन से बचाना चाहते थे। देश की मुक्ति में नारी और दलित के साथ-साथ किसानों की मुक्ति भी थी। जिस के संबंध में प्रेमचंद ने दूसरे अंक में स्वराज्य से किसका हित होगा सिर्फ एक टिप्पणी में लिखा।

प्रेमचंद ने धार्मिक कुरीतियों पर कुठाराघात करते हुए उन्हें तोड़ने का प्रयास किया है। गोदान उपन्यास अपने शीर्षक से धार्मिक अनुष्ठान का प्रतीक होते हुए भी एक तीखा व्यंग्य है।

धर्म के नाम पर होने वाले अत्याचार और गरीब जनता का शोषण उनकी कई उपन्यासों में आया है विशेषकर गोदान उपन्यास के अंत में वे बताते हैं कि शोषण के सारे साधन भले ही पीछे रह जाए धर्म मनुष्य के अंतिम क्षणों का भी दोहन करता है।

‘महाजनी सभ्यता’ लेख में प्रेमचंद का भी मत है कि धन से अधिक धर्म शोषण की सीमा है। किंतु धर्म मूल्य और विश्वास का दोहन करता है। धर्म और ईश्वर के प्रति अनपढ़ एवं ग्रामीण जनता के मनोभावों का प्रेमचंद ने बडी गहनता से अभिव्यक्त किया है। प्रेमचंद हिंदी कथा साहित्य के सम्राट माने जाते हैं। प्रेमचंद ने सामाजिक उपन्यासों की रचना की जिनके द्वारा समाज में राष्ट्रीय चेतना डालना चाहते थे। प्रेमचंद की रचनाओं में जहां संघर्ष और पराजय है वहां जीवन की अदम्य साहस और आशा का प्रबल है।

भाषा-शैली
प्रेमचंद अपने जीवन काल में ही उपन्यास सम्राट बन गए। प्रेमचंद ने भाषा को एक ऐसा रूप प्रदान किया जो जनजीवन की भाषा मानी जाती हिंदुस्तानी भाषा रूप को जन भाषा में रूपांतरित किया। प्रेमचंद का समय हिंदी उर्दू के मिले-जुले रूप का समय था, जिसे हिंदुस्तानी कहा जाता था। प्रेमचंद ने अपनी रचना और लेखों के द्वारा इसी भाषा का समर्थन किया यह जनता की भाषा थी और प्रेमचंद जनता के लेखक थे।

प्रेमचंद की रचना दृष्टि में उनकी राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक प्रतिबद्धता,नारी के प्रति सहानुभूति पूर्ण दृष्टिकोण, मध्यवर्गीय जीवन के अनुभव, किसानों और मजदूरों से प्रतिबद्धता, दलितों से सहानुभूति और सांप्रदायिक एकता की पक्षधरता स्पष्ट दिखाई देती है। प्रेमचंद ने अपने समय के तथ्यों को रचना के स्तर पर सत्य बनाकर प्रस्तुत किया।

उपसंहार
प्रेमचंद ने हिंदी साहत्य में ‘कलम का सिपाही’ बनकर अंतिम तक कई अद्भुत कृतियाँ लिखी हैं।तब से लेकर आज तक हिंदी साहित्य में ना ही उनके जैसा कोई हुआ और ना ही कोई और होगा। ऐसे महान हिंदी ‘उपन्यास सम्राट’ का निधन 8 अक्तूबर, 1936को जलोदर रोग से हुआ।

– कमलेकर नागेश्वर राव (9848493223)

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