बहुत … बीमार… है… मां… आज मां के पास बैठा…हूं। बहुत निकट, उससे एकदम सट कर। मन ने प्रश्न किया, तो क्या एक दिन मां मर जायेगी? क्या मां फिर नजर नहीं आएगी?… ना जाने कैसे मां ने मन की ध्वनिहीन बातें सुन लिया? वह धीरे से… फुसफुसाई…, बहुत ही धीमी मंद आवाज आई… “मां मरती नहीं…”, “हां, मां कभी मरती नहीं मेरे बेटे!”
तब किया था वादा मैंने मां से, करूँगा पूरी तेरी अंतिम इच्छा। हो गयी खुश मां स्नेह से बोली- तो ले चल अब “गंगाघाट” मुझे, वहीं लूंगी मैं राहत की श्वांस। गंगा जी पर है मेरा सुदृढ़ अटूट विश्वास। कैसे समझाऊं मां को अब? मां! यह तेरे जमाने की नहीं, यह मेरे ज़माने की गंगा है।

यह हरिद्वार की नहीं कानपुर महानगर की गंगा है। जो थी कभी पवित्र तारण नदी अब किसी नाले से भी अधिक गंदा है। मां! कैसे झोक दूं तुझे इस सड़ती-बदबूदार सी नाली में, बिगड़ जायेगी तेरी बीमारी। अब वह जीवनदायी, प्राण प्रदायिनी नहीं रही, जीवन हरणी, संकट भरणी है।
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जानता हूं विश्वास नहीं होगा उसे, हो भी कैसे? पूजती जो आयी है इसकी निर्मलता को, पवित्रता को, उसे मिला है उसी जल में संतोष-परितोष, कितने लंबे इलाज के बाद इस कोमा से महीनों बाद तो आज आया है उसे होश।
कैसे उसे ले चलूं? कैसे छोड़ दूं? वादा इतनी जल्दी कैसे तोड़ दूं? मां ने मांगा भी तो क्या मांगा? कितना सस्ता एक सौदा मांगा? कितना महंगा यह सौदा मांगा। कैसे कह दूं मां से असमर्थ हूं मैं? कैसे कह दूं, बदल गयी अब गंगा? कहीं खो न दे वह होश फिर अपना? क्या होगा, टूटा जो उसका सपना? कितना धन हुआ खर्च इसके शोधन पर, पवन गंगा फिर भी रही एक सपना का सपना।
बीमारी मां की बिगड़ती गई… और एकदिन मां ने इस भौतिक शरीर को छोड़ दिया। याद मां की सतत आती रही, हंसाती रही, कभी रुलाती रही। मां ने बिलकुल ठीक कहा था- “मां मरती नहीं… मां मर नहीं सकती”। … देख रहा हूं उसे…, प्रकृति में, शून्य में… विलीन होते हुए… आज… मां, अब शरीर नहीं है.., रूप नहीं है, … स्वरुप नहीं है…, आकृति… नहीं है। मां, अब केवल शब्द… नहीं हैं, ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ के बंधन को वह तोड़ चुकी है…, क्षर से अब अक्षर हो चुकी है।
अब तो… अब… तो… मां, एक सम्पूर्ण अभिव्यक्ति है… मां, एक जिम्मेदारी है, एक दायित्व है। मां ही पृथ्वी के रूप में उत्पादक है, नदी और जल रूप में पोषक है। मेघ रूप में वर्षा है, पुष्प रूप सुगंध है, झरना रूप प्रवाह, नदी, सागर है, पिक, पपीहा रूप में गान है। राग-रूप-प्यार- दुलार है, और डांट रूप निर्माण है। रोटी रूप में भोजन है वह, श्वेद रूप में श्रम है। थल रूप ठोस वही, तरल रूप में बहता जल है। स्वप्न रूप में लक्ष्य वही है, साहस रूप में गति है। प्रेरक वही, प्रेरणा वही, सन्मार्ग रूप प्रगति है।
मां अब वैयक्तिक आत्मा नहीं… विश्वात्मा है…, परमात्मा है…। मां को इसी रूप में निहारना है, …माँ तो दे चुकी, उसको जो कुछ भी देना था। सन्मार्ग दिखाने आयी थी, नाता तो एक बहाना था। अब हमको पथ पर चलना है, जो कुछ उसने अबतक सिखलाया, सब काम वही अब करना है। हे प्रकृति रूपी मां! हे विश्व रूपी मां!! हे व्यष्टि रूपी मां!! है सृष्टि रूपी मां!! है समष्टि रूपी मां!! तुम्हे सादर नमन! बारम्बार नमन!! कोटिशः नमन!!!

डॉ जयप्रकाश तिवारी
भरसर, बलिया, उत्तर प्रदेश
