[नोट- आज यानी 10 अप्रैल को महावीर जयंती है। देशभर में महावीर जयंती मनाई जा रही है। हर साल चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को महावीर जयंती मनाई जाती है। ऐसे शुभ अवसर पर पढ़िए डॉ लेखक डॉ जयप्रकाश तिवारी जी का विश्लेषात्मक लेख।]
महावीर स्वामी जैनधर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे। इनका जन्म 599 ईसा पूर्व में भारत वर्ष के बिहार प्रांत (विदेह प्रदेश) के कुंडपुर (कुंडलपुर) नगर में हुआ था। कुंडपुर विदेह प्रदेश की राजधानी वैशाली के निकट बसा हुआ था। किंतु इसे आग्रह कहें या दुराग्रह, इस देश के अनेक महापुरुषों की जन्म स्थली के बारे में इतिहासकारों और आध्यात्मिक विद्वानों ने इसे विवाद का वस्तु बना दिया। अभी तक यह मतभेद पूर्णतया समाप्त नहीं हुआ है। डॉ. राजेंद्र कुमार बंसल ने अपने शोधपूर्ण निबंध “सही कुंडपुर कहां: समाधान खोजते प्रश्नों की समीक्षा” में इस तथ्य का बहुत ही सूक्ष्मता से अध्ययन किया है और कुंडपुर या कुंडलपुर को ही जन्म स्थान माना है। किंतु विवाद इस बात पर अभी भी है कि कुंडपुर या कुंडलपुर कहां स्थित है?
इसी प्रकार का भ्रम कतिपय विद्वानों द्वारा संत महाकवि तुलसीदास जी की जन्म स्थली के बारे में भी यदाकदा उठाया जाता ही रहा है। भारतीय महापुरुषों की जन्म स्थली को सर्वाधिक विवादित ईसाई मिशनरियों और पाश्चात्य इतिहासकारों ने ऐतिहासिक, आध्यात्मिक साक्ष्यों को तोड़ मरोड़कर बनाया है और इसके पीछे उनका दुराग्रह है, इसे नकारा नहीं जा सकता। उनके लिखे इतिहास को पढ़कर भारतीय जनमानस आज भी अपने महापुरुषों की जन्म स्थली को लेकर यदि भ्रमित है तो इसे दुर्भाग्य ही कहना पड़ेगा।
विदेह प्रदेश के लिच्छिवी नरेश सिद्धार्थ और रानी त्रिशाला ने एक होनहार बालक को जिसदिन जन्म दिया, वह चैत्र सुदी त्रयोदस का पावन पवित्र दिन था, वही दिन “महवीर जयंती” के नाम से सुप्रसिद्ध है। इस बालक का नाम बड़े लाड प्यार से “वर्द्धमान” रखा गया। वर्द्धमान बाल्यकाल से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी और अत्यंत मेधावी और समस्या समाधान में निपुण थे। जनश्रुति है कि संजय और विजय नामक मुनि-युगल एक असामान्य और अत्यंत जटिल प्रश्न लेकर 12 वर्षीय बर्धमान के पास गए। उन्होंने तत्काल उसका समाधान कर दिया। उत्तर से संतुष्ट होकर मुनियों ने उनका नाम “सन्मति” रख दिया। आगे चलकर उनका नाम वीर, अतिवीर और महावीर भी पड़ गया।
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उन्हें वीतरागी देखकर उनके माता पिता ने उनको विवाह बंधन में बांधने का प्रयास किया। किंतु जिसका मन कहीं और रमा हुआ हो, वह किसी बंधन में कहां बंधने वाला था। वह तो जगत को बंधन मुक्त कराने आया था, स्वयं किसी बंधन में बंधने नहीं। महावीर ने युवावस्था में ही राजसिक वैभव, सत्ता सुख का परित्याग कर दिया और निर्ग्रंथ होकर जंगलों और कंदराओं में एकांतवास कर तपश्चर्या करने लगे। वे इस भौतिक काया को तपाने लगे, ग्रीष्म काल में गर्म शिलाओं पर, वर्षा ऋतु में वृक्षों के नीचे और शरद ऋतु ने नदी तट पर तपोस्थली बनाया। उनका मुख्य उद्देश्य तप द्वारा आत्मिक शक्ति को विकसित करना था।
उन्होंने जैन धर्म दर्शन को परिपुष्ट किया तथा “स्यादवाद” और “अनेकांतवाद” नामक दो महत्वपूर्ण दार्शनिक दृष्टि दार्शनिक जगत को दिया तथा “त्रिरत्न” को सर्वोच्च आचार के रूप में स्थापित किया। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का सिद्धांत आज भी विश्व दर्शन का केंद्रीय तत्व बना हुआ है। ऐसे संत महापुरुष, प्रखर दार्शनिक और आध्यात्मिक पथ प्रदर्शक को उनके जन्म जयंती पर कोटिश: नमन और वंदन।

डॉ जयप्रकाश तिवारी (94533 91020)
बलिया, उत्तर प्रदेश
